उत्तराखंड

*उत्तराखंड की लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का संवाहक है मुखौटा नृत्य*

देव भूमि जे के न्यूज (जय कुमार तिवारी)ऋषिकेश। श्री देव सुमन विश्वविद्यालय परिसर ऋषिकेश के अंग्रेजी विभाग की ओर से सोमवार को उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति एवं…

देव भूमि जे के न्यूज (जय कुमार तिवारी)ऋषिकेश। श्री देव सुमन विश्वविद्यालय परिसर ऋषिकेश के अंग्रेजी विभाग की ओर से सोमवार को उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति एवं पारंपरिक विरासत को केंद्र में रखते हुए ‘उत्तराखंड का मुखौटा नृत्य परंपरा’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में शिक्षाविदों, साहित्यकारों एवं शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड की लोक परंपराओं के महत्व, उनके वैज्ञानिक आधार और संरक्षण की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए।

कार्यशाला का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अम्बरीश कुमार महाजन ने किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में विज्ञान और तकनीकी के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा एवं लोक संस्कृति का ज्ञान और उनका संरक्षण भी बेहद आवश्यक है। हमारी लोक परंपराएं केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं हैं, बल्कि इनमें पीढ़ियों से संचित ज्ञान, अनुभव और जीवन दर्शन भी समाहित है। उन्होंने ऐसी कार्यशालाओं को भारतीय संस्कृति और परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।

इस अवसर पर कार्यशाला संयोजक प्रो. हेमन्त कुमार शुक्ला द्वारा संपादित विभागीय न्यूज़लेटर ‘होराइजन’ का विमोचन भी किया गया।

कार्यशाला के मुख्य वक्ता प्रो. डीआर पुरोहित ने उत्तराखंड की लोक परंपराओं की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं अपने भीतर विज्ञान सम्मत सिद्धांतों को समेटे हुए हजारों वर्षों से जीवित हैं। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित लोक परंपराओं में मुखौटा नृत्य की विशिष्ट शैली का महत्वपूर्ण स्थान है। यह परंपरा गढ़वाल से लेकर कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित रही है। मुखौटा नृत्य के माध्यम से लोक आस्था, धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने कहा कि इन परंपराओं का अध्ययन और दस्तावेजीकरण समय की आवश्यकता है।

कार्यशाला में आमंत्रित अतिथि एवं मेरठ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष तथा उपन्यासकार प्रो. विकास शर्मा ने रचनात्मक लेखन के महत्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि रचनात्मक लेखन ज्ञान की सीमाओं को नया विस्तार प्रदान करता है। अपने उपन्यास ‘ऑल हर फायरस’ की चर्चा करते हुए उन्होंने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी पढ़ने और लिखने की आदत को विकसित करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि एक अच्छे रचनाकार के भीतर संवेदनशीलता होना आवश्यक है, क्योंकि संवेदनशीलता ही उसकी रचनात्मकता को सार्थक दिशा प्रदान करती है।

परिसर निदेशक प्रो. महावीर रावत ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में अकादमिक वातावरण को मजबूत बनाने के लिए इस प्रकार की ज्ञानवर्धक कार्यशालाओं का निरंतर आयोजन किया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थियों को विषय विशेषज्ञों के अनुभवों से सीखने और शोध के नए अवसर प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

कार्यशाला संयोजक प्रो. हेमन्त कुमार शुक्ला ने बताया कि मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा शोध प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्र-छात्राओं में उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कलाओं एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार कुकरेती ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अंग्रेजी विभाग पश्चिमी साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं पर शोध करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

कार्यशाला का संचालन डॉ. पारुल मिश्रा ने किया। इस अवसर पर प्रो. वीके श्रीवास्तव, प्रो. परवेज अहमद, प्रो. राकेश जोशी, डॉ. सुनील प्रसाद, डॉ. दर्शन सिंह नेगी, प्री सीएस नेगी सहित शोध छात्र दीपशिखा, इशिता, शालिनी, हिमांशु एवं अन्य विद्यार्थी उपस्थित रहे।

Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1
Discussion

0 Comments

Join the conversation

Share your view on this story. Your email address will not be published.