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*दीपावली : प्रकाश की सनातन परंपरा, प्रदूषण की समसामयिक विडंबना एवं आत्मजागरण का दिव्य आह्वान*

देवभूमि JK News | दीपावली विशेष आलेख शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥ भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल एक लौकिक उत्सव अथवा ऋतुजन्य उल्लास का अवसर नहीं,…

देवभूमि JK News | दीपावली विशेष आलेख

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥

भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल एक लौकिक उत्सव अथवा ऋतुजन्य उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि सनातन जीवनदर्शन की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति, सांस्कृतिक चेतना का महापर्व तथा मानव जीवन को प्रकाश, पवित्रता, समृद्धि एवं सदाचार से अभिसिंचित करने वाला दिव्य पर्व है। यह पर्व मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, अविद्या से विद्या की ओर, असत्य से सत्य की ओर तथा संकीर्ण स्वार्थ से व्यापक लोकमंगल की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।

भारतीय ऋषि-मनीषियों ने जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूपी चतुर्विध पुरुषार्थों के समन्वय का माध्यम माना है। इसी जीवनदृष्टि की अनुपम अभिव्यक्ति दीपावली में दिखाई देती है। हमारी सनातन परंपरा में दीप केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, पवित्रता, सात्त्विकता एवं आत्मचेतना का प्रतीक है।

दीपक की छोटी-सी ज्योति हमें यह संदेश देती है कि जीवन की सार्थकता केवल स्वयं प्रकाशित होने में नहीं, बल्कि अपने प्रकाश से दूसरों के जीवन को भी आलोकित करने में है।

किन्तु वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में आत्ममंथन की आवश्यकता है। जिस दीपोत्सव का मूल उद्देश्य अंतःकरण की शुद्धि, देवपूजन, दीपदान, स्वच्छता, सदाचार, परस्पर सौहार्द एवं लोककल्याण रहा है, कहीं उसका स्वरूप ध्वनि-विस्फोट, वायुप्रदूषण, अनियंत्रित उपभोग एवं भौतिक प्रदर्शन तक सीमित तो नहीं होता जा रहा है?

एक ओर मिट्टी के दीपक की सात्त्विक ज्योति है, दूसरी ओर आतिशबाजी से उत्पन्न धुआं एवं ध्वनि प्रदूषण। एक ओर मां लक्ष्मी एवं भगवान नारायण का मंगलमय स्मरण है, दूसरी ओर धन-वैभव के प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा।

अतः आवश्यकता है कि हम दीपावली का अवलोकन केवल उत्सव की दृष्टि से नहीं, बल्कि उसके शास्त्रीय, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक आयामों के माध्यम से करें।

### शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य : दीपावली का मूल स्वरूप

दीपावली शब्द दो पदों के समन्वय से बना है—दीप और आवली। दीप अर्थात प्रकाश प्रदान करने वाला दीपक तथा आवली अर्थात पंक्ति अथवा श्रृंखला। इस प्रकार दीपावली का शाब्दिक अर्थ है दीपकों की पंक्ति अथवा प्रकाश की श्रृंखला।

सनातन धर्म में कार्तिक मास का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व है। पद्मपुराण, स्कंदपुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में कार्तिक मास के स्नान, दीपदान, विष्णुपूजन एवं उपासना का विशेष माहात्म्य वर्णित है।

कार्तिक मास में देवालयों, तुलसी-वृंदावन, पवित्र नदियों, सरोवरों एवं देवस्थानों में दीप प्रज्वलित करने की परंपरा रही है। दीपदान का वास्तविक आध्यात्मिक अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपने जीवन में ज्ञान, धर्म, करुणा एवं सदाचार की ज्योति प्रज्वलित करे।

दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥

यह श्लोक दीप की ज्योति को परमात्मा के स्वरूप से जोड़ते हुए अंतःकरण की शुद्धि एवं अज्ञान के निवारण की प्रार्थना करता है।

### दीपावली के पांच पर्व : जीवन के पांच दिव्य आयाम

दीपावली सामान्यतः पांच प्रमुख पर्वों की श्रृंखला के रूप में मनाई जाती है। इन सभी पर्वों में भारतीय जीवनदर्शन के महत्त्वपूर्ण आयाम समाहित हैं।

धनतेरस : आरोग्य और समृद्धि का संदेश

धनतेरस भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य एवं आयुर्वेद की दिव्य परंपरा से जुड़ा है। समुद्र मंथन से अमृत कलश धारण किए भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का स्मरण इस दिन किया जाता है।

आयुर्वेद भारतीय ज्ञानपरंपरा का अनुपम विज्ञान है, जिसमें शरीर, मन एवं आत्मा के संतुलित स्वास्थ्य पर बल दिया गया है।

चरक संहिता में स्वास्थ्य की परिभाषा देते हुए कहा गया है—

समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥

अर्थात जिसके दोष, अग्नि, धातु एवं मल की क्रियाएं संतुलित हों तथा आत्मा, इंद्रियां एवं मन प्रसन्न हों, वही स्वस्थ कहलाता है।

इस पर्व का संदेश है कि आरोग्य जीवन की सबसे बड़ी संपदाओं में से एक है।

नरक चतुर्दशी : अंतःकरण की शुद्धि

नरक चतुर्दशी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक परंपरा से जुड़ी है। इसे छोटी दीपावली एवं रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है।

इस दिन अभ्यंग स्नान, स्वच्छता एवं दीपदान का विधान है। इसका आध्यात्मिक संदेश मनुष्य के भीतर विद्यमान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य जैसे विकारों के नाश से जुड़ा है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

अर्थात काम, क्रोध एवं लोभ आत्मा के पतन के तीन प्रमुख द्वार हैं। इसलिए मनुष्य को इनका त्याग करना चाहिए।

दीपावली एवं महालक्ष्मी पूजन : धर्मसम्मत समृद्धि

कार्तिक अमावस्या को महालक्ष्मी पूजन का विशेष विधान है। सनातन परंपरा में मां लक्ष्मी केवल धन की अधिष्ठात्री देवी नहीं, बल्कि ऐश्वर्य, सौभाग्य, समृद्धि, सौंदर्य, कीर्ति एवं मंगल की अधिष्ठात्री शक्ति हैं।

लक्ष्मी पूजन का वास्तविक अभिप्राय केवल धन की कामना करना नहीं, बल्कि धन का धर्मसम्मत अर्जन और लोककल्याण में उसका सदुपयोग करना भी है।

गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट : प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धनधारण लीला का स्मरण किया जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित यह लीला प्रकृति, गौवंश, कृषि, अन्न एवं पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥

यह श्लोक प्रकृति, वर्षा, अन्न एवं जीवसृष्टि के परस्पर संबंध को स्पष्ट करता है।

भैया दूज : पारिवारिक स्नेह का पर्व

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भैया दूज भाई-बहन के पवित्र स्नेह, पारिवारिक आत्मीयता एवं परस्पर मंगलकामना का प्रतीक है। यम एवं यमुना की पौराणिक कथा इस पर्व की धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है।

इस प्रकार दीपावली के पांच पर्व आरोग्य, आत्मशुद्धि, समृद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता तथा पारिवारिक सद्भाव का संदेश देते हैं।

### भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन और दीपोत्सव की सांस्कृतिक चेतना

भारतीय जनमानस में दीपावली का सबसे भावपूर्ण संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन से है।

चौदह वर्ष के वनवास एवं रावण वध के पश्चात जब भगवान श्रीराम, माता सीता एवं भ्राता लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तब संपूर्ण अयोध्या नगरी हर्ष एवं उल्लास से भर उठी।

उत्तर भारतीय लोकपरंपरा में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन को दीपोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा विशेष रूप से प्रतिष्ठित है।

श्रीराम का अयोध्या आगमन केवल एक राजकुमार की वापसी नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, न्याय, सत्य एवं लोककल्याण की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रतीक है।

भगवान श्रीराम का संपूर्ण जीवन धर्ममय आचरण, मर्यादा, त्याग, करुणा एवं लोकहित की प्रेरणा देता है। अतः दीपावली हमें अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र में धर्म, न्याय, मर्यादा एवं सद्भाव की प्रतिष्ठा करने का संकल्प लेने की प्रेरणा देती है।

### विभिन्न धार्मिक परंपराओं में दीपावली का महत्त्व

दीपावली भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता का भी महत्त्वपूर्ण पर्व है।

जैन परंपरा में कार्तिक अमावस्या को भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर दीप प्रज्वलित करके ज्ञानज्योति एवं निर्वाण की स्मृति का उत्सव मनाया जाता है।

सिख परंपरा में दीपावली का संबंध छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की ग्वालियर दुर्ग से मुक्ति एवं अमृतसर आगमन की स्मृति में मनाए जाने वाले बंदी छोड़ दिवस से है।

इस प्रकार दीपावली भारतीय समाज की विभिन्न धार्मिक परंपराओं एवं सांस्कृतिक स्मृतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला पर्व है।

### आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य : दीप और मानव जीवन का संबंध

उपनिषदों में मानव जीवन की सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रार्थना व्यक्त की गई है—

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय॥

(बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28)

अर्थात हे परमात्मा! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलिए।

यह मंत्र दीपोत्सव के संपूर्ण आध्यात्मिक दर्शन को अपने भीतर समाहित किए हुए है।

यहां अंधकार का अभिप्राय केवल प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि अविद्या, अविवेक, मोह, अहंकार एवं स्वार्थ की वह अवस्था है, जिसमें मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप एवं जीवन के उद्देश्य को भूल जाता है।

दीप का प्रकाश ज्ञान एवं विवेक का प्रतीक है। जिस प्रकार दीपक के प्रज्वलित होते ही अंधकार दूर होने लगता है, उसी प्रकार ज्ञान एवं आत्मबोध से अज्ञान का क्षय होता है।

दीपक के विभिन्न अवयवों को मानव जीवन से प्रतीकात्मक रूप में जोड़ा जा सकता है। मिट्टी का पात्र शरीर का प्रतीक है, तेल अथवा घी हमारे संस्कार एवं साधना का, सूती बाती अंतःचेतना की और अग्नि ज्ञान एवं परमात्मचेतना का प्रतीक है।

जिस प्रकार दीपक में इन सभी तत्वों का समन्वय आवश्यक है, उसी प्रकार मानव जीवन में शरीर, संस्कार, साधना एवं ज्ञान का संतुलन आवश्यक है।

### लक्ष्मी पूजन का वास्तविक अर्थ : धन के साथ विद्या और विवेक भी आवश्यक

महालक्ष्मी की उपासना को केवल धनार्जन की कामना तक सीमित कर देना भारतीय दर्शन की व्यापकता को संकुचित करना है।

लोकप्रचलित अष्टलक्ष्मी परंपरा में मां लक्ष्मी के आठ स्वरूप बताए गए हैं—

* आदिलक्ष्मी

* धनलक्ष्मी

* धान्यलक्ष्मी

* गजलक्ष्मी

* संतानलक्ष्मी

* धैर्यलक्ष्मी अथवा वीरलक्ष्मी

* विजयलक्ष्मी

* विद्यालक्ष्मी

इन स्वरूपों का आध्यात्मिक संकेत है कि वास्तविक समृद्धि केवल धन की उपलब्धता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अन्न, ज्ञान, साहस, धैर्य, संतान, विजय एवं आध्यात्मिक संपन्नता का समन्वित स्वरूप है।

भारतीय ज्ञानपरंपरा में विद्या को सर्वोच्च संपदाओं में स्थान दिया गया है—

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥

अर्थात विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है और न ही इसे बांटा जा सकता है। यह खर्च करने पर भी निरंतर बढ़ता रहता है।

इसलिए दीपावली पर केवल धन-संपदा की वृद्धि ही नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, सदाचार एवं धर्मबुद्धि की अभिवृद्धि का संकल्प भी लेना चाहिए।

### सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य : परंपरागत दीपावली से वर्तमान स्वरूप तक

भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल व्यक्तिगत उल्लास का पर्व नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, ग्राम्य अर्थव्यवस्था, लोककला, पारिवारिक आत्मीयता एवं सामाजिक सहभागिता का महापर्व रही है।

परंपरागत भारतीय जीवन में दीपावली से पहले घरों की लिपाई-पुताई, आंगन की स्वच्छता एवं गृहसज्जा का विशेष प्रचलन रहा है। गोबर एवं मिट्टी से आंगन की लिपाई, द्वार पर आम्रपल्लव एवं धान की बालियों से वंदनवार, प्राकृतिक रंगों से रंगोली तथा घरों में पारंपरिक पकवानों की तैयारी हमारी लोकसंस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं।

मिट्टी के दीपकों को तेल अथवा घी से प्रज्वलित करके घर, आंगन, देवालय एवं तुलसी वृंदावन को प्रकाशित किया जाता था।

इस अवसर पर कुम्हार, हलवाई, किसान, कारीगर, बुनकर एवं स्थानीय शिल्पकारों को आजीविका के विशेष अवसर मिलते थे।

वर्तमान समय में दीपावली के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं। मिट्टी के दीपकों की अपेक्षा कृत्रिम विद्युत झालरों एवं प्लास्टिक आधारित सजावट का प्रचलन बढ़ा है। स्थानीय कुम्हारों के उत्पादों की अपेक्षा बड़े बाजारों में निर्मित सजावटी वस्तुओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

आधुनिक साधनों का उपयोग अपने आप में अनुचित नहीं है, लेकिन जब आधुनिकता हमारी सांस्कृतिक जड़ों, स्थानीय आजीविका एवं पारिवारिक आत्मीयता को प्रभावित करने लगे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।

दीपावली पर जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र एवं आवश्यक सामग्री प्रदान करना हमारी सामाजिक परंपरा रही है। आज भी इस भावना को जीवित रखना समय की आवश्यकता है।

### वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य : पर्यावरणीय चेतना और स्वच्छता

भारतीय पर्व-परंपराओं में ऋतुचक्र, स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पर्यावरण के अनेक व्यावहारिक पक्ष समाहित हैं।

दीपावली सामान्यतः वर्षा ऋतु की समाप्ति एवं शीत ऋतु के आरंभिक संक्रमण काल में आती है। वर्षा के पश्चात घरों, आंगनों एवं आसपास के क्षेत्रों में नमी, काई, धूल एवं गंदगी एकत्र हो सकती है।

ऐसी स्थिति में घरों की स्वच्छता, वस्त्रों को धूप में सुखाना, जलस्रोतों की सफाई तथा आवासीय क्षेत्रों का सुव्यवस्थित रखरखाव स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

मिट्टी के दीपक में तेल अथवा घी डालकर सूती बाती प्रज्वलित की जाती है। इस दहन प्रक्रिया से प्रकाश एवं ऊष्मा उत्पन्न होती है। हालांकि किसी भी दहन प्रक्रिया में ऑक्सीजन का उपयोग होता है और कुछ दहन-उत्पाद भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए दीपकों का प्रयोग पर्याप्त वायुसंचार वाले स्थान पर करना उचित है।

भारतीय परंपरा में नीम की पत्तियों, धूपन सामग्री एवं सुगंधित वनस्पतियों का उपयोग भी होता रहा है। हालांकि किसी भी पारंपरिक धूपन को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के अनुसार सुरक्षित एवं प्रभावी मान लेना उचित नहीं है। स्वच्छता के साथ सुरक्षित और पर्यावरणानुकूल उपाय अपनाना आवश्यक है।

### आतिशबाजी : प्रकाशोत्सव से प्रदूषण तक की चुनौती

दीपावली के वर्तमान स्वरूप पर विचार करते समय आतिशबाजी का विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

भारतीय दीपोत्सव का मूल सांस्कृतिक आधार दीपदान, देवपूजन, मंगलाचरण एवं प्रकाशोत्सव है। वर्तमान समय में आतिशबाजी उत्सव की एक प्रचलित अभिव्यक्ति बन गई है, लेकिन इसके अनियंत्रित उपयोग से वायु एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।

पटाखों से निकलने वाला धुआं, सूक्ष्म कण एवं विभिन्न रासायनिक पदार्थ वायु की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। तेज आवाज बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों तथा पशु-पक्षियों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

इसलिए दीपावली को उल्लासपूर्वक मनाने के साथ पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं सामाजिक जिम्मेदारी का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

मिट्टी के दीपक जलाना, स्थानीय कुम्हारों से खरीदारी करना, जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना, स्वच्छता बनाए रखना तथा अनावश्यक आतिशबाजी से बचना दीपावली की मूल भावना के अधिक अनुकूल है।

### निष्कर्ष : बाहरी दीपों के साथ अंतर्मन को भी प्रकाशित करें

दीपावली केवल घरों को सजाने, दीप जलाने एवं मिठाइयां बांटने का पर्व नहीं है। यह स्वयं के भीतर झांकने, अपनी कमियों को पहचानने तथा जीवन को श्रेष्ठ बनाने का अवसर है।

यदि हमारे घरों में हजारों दीपक जल रहे हों, लेकिन हमारे विचारों में द्वेष, व्यवहार में अहंकार, समाज में भेदभाव और जीवन में स्वार्थ का अंधकार बना रहे, तो दीपोत्सव की वास्तविक सार्थकता अधूरी रह जाएगी।

आइए, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि अपने अंतःकरण में ज्ञान का दीप जलाएंगे, परिवार में प्रेम एवं सद्भाव बढ़ाएंगे, समाज में सेवा एवं सहयोग की भावना विकसित करेंगे, प्रकृति की रक्षा करेंगे तथा अपनी सनातन सांस्कृतिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे।

वास्तविक दीपावली वही है, जिसमें घर के साथ मन भी प्रकाशित हो, धन के साथ धर्म भी प्रतिष्ठित हो और व्यक्तिगत सुख के साथ लोकमंगल का भाव भी जागृत हो।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

लेखक परिचय

डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय धर्माधिकारी एवं शास्त्रचिंतक मुख्य न्यासी, श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास एवं गुरुकुल मंदिर सेवा योजना प्रमुख, जम्मू-कश्मीर प्रांत।

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