देव भूमि जे के न्यूज ऋषिकेश, 29 अक्टूबर।**
परमार्थ निकेतन में आयोजित पांच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन आध्यात्मिक चेतना, आत्मचिंतन और आत्मबोध की प्रेरणादायी अनुभूति के साथ हुआ। इस कोर्स के माध्यम से प्रतिभागियों को योग और वेदान्त के गहन सिद्धांतों को समझने तथा उन्हें दैनिक जीवन में अपनाने का अवसर मिला। गंगा तट की शांतिमयी आध्यात्मिक वातावरण और भारतीय ऋषि परंपरा के सान्निध्य में साधकों ने योग, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को अधिक सजग, संतुलित और शांतिमय बनाने की दिशा में अभ्यास किया।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक परंपरा के अंतर्गत साधकों ने पूज्य डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती से भेंट कर विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त कीं और उनके समाधान प्राप्त किए। इस संवाद ने प्रतिभागियों को वेदान्त की शिक्षाओं को गहराई से समझने और उन्हें अपने व्यवहार तथा जीवनशैली से जोड़ने की प्रेरणा दी।
साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि वेदान्त हमें जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन को उसकी वास्तविकता में समझना सिखाता है। जब मनुष्य स्वयं को जानने की यात्रा आरंभ करता है, तब उसके भीतर उठने वाले प्रश्नों, विचारों और भावनाओं को समझने की दृष्टि विकसित होती है। वेदान्त का उद्देश्य केवल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना है, जिससे विचारों में स्पष्टता, व्यवहार में करुणा और जीवन में शांति का विकास हो सके।
उन्होंने बताया कि अपने वास्तविक स्वरूप को समझने से जीवन को देखने का दृष्टिकोण बदलने लगता है। मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और परिस्थितियों से आगे बढ़कर अपने भीतर की चेतना को समझने का प्रयास करता है। यही आत्मचिंतन उसे अधिक विवेकपूर्ण, संवेदनशील और उत्तरदायी जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
वेदान्त भारतीय ऋषि परंपरा का वह ज्ञान है, जो मनुष्य को अपने अस्तित्व और जीवन के उद्देश्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। मैं कौन हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, वास्तविक सुख और शांति कहां है तथा परिस्थितियों के बदलने पर मन विचलित क्यों हो जाता है—ऐसे प्रश्नों पर चिंतन वेदान्त की अध्ययन यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उपनिषदों का महावाक्य ‘तत्त्वमसि’, अर्थात ‘वह तुम हो’, आत्मबोध की इसी संभावना की ओर संकेत करता है। वेदान्त की शिक्षा मनुष्य को संसार से विमुख होने के बजाय जागरूकता, करुणा, विवेक और उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
पांच दिवसीय कोर्स में योग और वेदान्त के समन्वय पर भी विशेष ध्यान दिया गया। योग अनुशासन, एकाग्रता, संतुलन और साधना की दिशा प्रदान करता है, जबकि वेदान्त अपने अस्तित्व की गहराई को समझने की दृष्टि विकसित करता है। ध्यान के माध्यम से मन को समझने और आत्मचिंतन के जरिए अपने विचारों तथा व्यवहार का अवलोकन करने का अभ्यास साधकों की आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
परमार्थ निकेतन में आयोजित यह कोर्स भारतीय ज्ञान परंपरा की उस भावना को सामने लाता है, जिसमें ज्ञान को व्यवहार, साधना को अनुभव और आध्यात्मिकता को मानवता की सेवा से जोड़ने पर बल दिया जाता है। कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों के लिए आत्मचिंतन, आंतरिक परिपक्वता और जीवन को अधिक सार्थक बनाने की प्रेरणा के साथ हुआ।






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