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प्रयागराज रामलीला उत्कृष्टता सम्मान 2026: श्रीरामकथा के साधकों को समर्पित संस्कृति, संस्कार और सामाजिक चेतना का महोत्सव.

देव भूमि जे के न्यूज,प्रयागराज, 27 अक्टूबर। तीर्थराज प्रयागराज की पावन धरती पर श्रीरामकथा, भारतीय संस्कृति, लोकपरंपराओं और सामाजिक चेतना को समर्पित ‘प्रयागराज रामलीला उत्कृष्टता सम्मान 2026’ का…

देव भूमि जे के न्यूज,प्रयागराज, 27 अक्टूबर।

तीर्थराज प्रयागराज की पावन धरती पर श्रीरामकथा, भारतीय संस्कृति, लोकपरंपराओं और सामाजिक चेतना को समर्पित ‘प्रयागराज रामलीला उत्कृष्टता सम्मान 2026’ का आयोजन परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, नैनी में नुक्कड़ नाट्य अभिनय संस्थान, प्रयागराज द्वारा किया गया। आयोजन का उद्देश्य श्रीरामलीला की समृद्ध परंपरा को जीवंत बनाए रखने वाले कलाकारों, साधकों, आयोजकों और संस्कृति के संवाहकों के योगदान को सम्मान देना तथा नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना रहा।

कार्यक्रम में परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का सान्निध्य प्राप्त हुआ। प्रयागराज के महापौर गणेश केसरवानी सहित न्यायमूर्ति अरुण टंडन, नगर आयुक्त प्रयागराज, सीलम साई तेजा तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति का उल्लेख किया गया। इस अवसर पर रामलीला की परंपरा, श्रीरामकथा के आदर्शों और भारतीय समाज में सांस्कृतिक आयोजनों की भूमिका पर विचार व्यक्त किए गए।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि श्रीरामकथा भारतीय संस्कृति की ऐसी जीवनधारा है, जो सदियों से समाज को मर्यादा, करुणा, त्याग, सेवा, कर्तव्य और आदर्श जीवन की प्रेरणा देती आ रही है। रामलीला के मंच पर प्रस्तुत होने वाले प्रसंग केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, सामाजिक उत्तरदायित्वों और नैतिक मूल्यों के जीवंत उदाहरण हैं।

उन्होंने श्रीराम के मर्यादित आचरण, माता सीता की गरिमा, लक्ष्मण के समर्पण, भरत के त्याग और हनुमान की सेवाभावना का उल्लेख करते हुए कहा कि ये आदर्श आज भी जीवन की चुनौतियों के बीच सही मार्ग चुनने की प्रेरणा देते हैं। श्रीरामकथा का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होता है, जब उसके मूल्यों को व्यवहार और जीवनशैली में अपनाया जाए।

समारोह में आस्था, स्वच्छता, संस्कृति, समर्पण और परंपरा के आपसी संबंधों पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं के संदेश में यह विचार प्रमुख रहा कि भारतीय संस्कृति में पवित्रता का अर्थ केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों की निर्मलता, व्यवहार की शुचिता, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्थलों के प्रति जिम्मेदारी भी इसका अभिन्न हिस्सा हैं। तीर्थराज प्रयागराज जैसी आध्यात्मिक महत्ता वाली भूमि पर स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का विशेष महत्व है।

कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप आचरण में दिखाई देता है। जनकल्याण, लोकसेवा, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और समाज के प्रत्येक वर्ग के प्रति सम्मान भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं। इस दृष्टि से रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और नैतिक शिक्षा का भी प्रभावी माध्यम है।

नुक्कड़ नाट्य अभिनय संस्थान की ओर से आयोजित यह समारोह लोकनाट्य और रामलीला से जुड़े प्रयासों को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया। तेजी से बदलती जीवनशैली और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच लोककलाओं का संरक्षण तथा उन्हें समकालीन सामाजिक सरोकारों से जोड़ना आवश्यक है। रामलीला जैसी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, सामाजिक जिम्मेदारियों और मानवीय मूल्यों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, नैनी में आयोजित इस समारोह ने प्रयागराज की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी रेखांकित किया। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम की परंपरा से जुड़ी यह धरती सदियों से ज्ञान, साधना, साहित्य और संस्कृति की प्रेरणास्थली रही है। ऐसी पावन भूमि पर श्रीरामकथा के साधकों के योगदान को सम्मानित करना भारतीय परंपराओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर बना।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश रहा कि श्रीराम के आदर्शों को जीवन में धारण करना, सेवा को साधना बनाना, प्रकृति का सम्मान करना और समाज में प्रेम एवं समरसता का विस्तार करना ही संस्कृति की सच्ची अभिव्यक्ति है। परंपराओं का संरक्षण तभी सार्थक है, जब वे वर्तमान समाज को दिशा दें और आने वाली पीढ़ियों को संस्कार प्रदान करें।

इस अवसर पर डॉ. पुष्पेंद्र, संतोष गुप्ता, माधव, परेश सहित प्रयागराज, नैनी और आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालु उपस्थित रहे। समारोह ने रामलीला की परंपरा से जुड़े कलाकारों और संस्कृति के साधकों के योगदान को रेखांकित करते हुए भारतीय सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और जीवन-मूल्यों के संरक्षण का संदेश दिया।

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