उत्तराखंड

*परमार्थ निकेतन में चार दिवसीय आठवें ओशो मेगा कैंप का समापन, देश-विदेश के साधकों ने की ध्यान और आत्मचेतना की साधना*

देव भूमि जे के न्यूज,ऋषिकेश, 2 नवंबर। हिमालय की पावन तलहटी में मां गंगा के दिव्य तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में 30 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026…

देव भूमि जे के न्यूज,ऋषिकेश, 2 नवंबर। हिमालय की पावन तलहटी में मां गंगा के दिव्य तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में 30 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक आयोजित चार दिवसीय आठवें ओशो मेगा कैंप का समापन हुआ। परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य एवं आशीर्वाद तथा नेपाल के काठमांडू स्थित ओशो तपोवन इंटरनेशनल कम्यून के संस्थापक स्वामी आनंद अरुण के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर में देश-विदेश के साधकों ने ध्यान, मौन, आत्मनिरीक्षण और अंतर्चेतना की साधना की।

शिविर के दौरान विश्व के विभिन्न देशों से पहुंचे साधकों ने परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक वातावरण और मां गंगा के पावन तट पर ध्यान एवं आत्मचिंतन के माध्यम से आंतरिक शांति का अनुभव किया। इस अवसर पर स्वामी आनंद अरुण ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती को नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित ओशो तपोवन इंटरनेशनल कम्यून पधारने के लिए स्नेहपूर्वक आमंत्रित किया।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक यात्रा बाहरी उपलब्धियों से भीतर की अनुभूति तक की यात्रा है। संसार में व्यक्ति निरंतर कुछ पाने, कुछ बनने और कुछ सिद्ध करने की दौड़ में लगा रहता है, लेकिन जीवन का वास्तविक आनंद स्वयं को जानने और अपने भीतर विद्यमान शांति से जुड़ने में है।

उन्होंने कहा कि ध्यान जीवन को पूर्ण जागरूकता के साथ जीने की कला है। जब व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं का साक्षी बनना सीख जाता है, तब उसके भीतर स्पष्टता और संतुलन का विकास होता है। ध्यान हमें स्वयं से जोड़ता है और जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तभी वह परिवार, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि के साथ संवेदनशील एवं समरस संबंध स्थापित कर पाता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत की ऋषि परंपरा ने सदैव आत्मानुभूति को जीवन का परम लक्ष्य माना है। उपनिषदों का ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः’ संदेश मनुष्य को अपने भीतर उतरने, स्वयं को जानने और जीवन के गहन सत्य को अनुभव करने की प्रेरणा देता है। योग, ध्यान और साधना की विभिन्न पद्धतियां अंततः आंतरिक चेतना की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं।

शिविर के मार्गदर्शक स्वामी आनंद अरुण ने साधकों को ओशो की ध्यान परंपरा, सक्रिय ध्यान, मौन और साक्षीभाव की विभिन्न विधियों से परिचित कराया। शिविर के दौरान आयोजित ध्यान सत्रों, प्रवचनों और आत्मचिंतन के माध्यम से प्रतिभागियों को अपनी आंतरिक संभावनाओं को पहचानने तथा दैनिक जीवन में जागरूकता विकसित करने का अवसर मिला।

स्वामी आनंद अरुण ने कहा कि परमार्थ निकेतन का दिव्य वातावरण इस साधना यात्रा को और अधिक अर्थपूर्ण बनाता है। एक ओर हिमालय की दिव्यता, दूसरी ओर मां गंगा की अविरल धारा और प्राचीन भारतीय ऋषि परंपरा की आध्यात्मिक चेतना साधकों को बाहरी कोलाहल से ऊपर उठकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देती है। यहां ध्यान केवल व्यक्तिगत अभ्यास नहीं, बल्कि प्रकृति, चेतना और समस्त अस्तित्व के साथ एकात्मता अनुभव करने का माध्यम बन जाता है।

उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन में योग और ध्यान की विभिन्न परंपराओं का संगम भारतीय अध्यात्म की उदारता और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है। भारत की आध्यात्मिक विरासत किसी एक पद्धति, मत अथवा मार्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि ज्ञान, भक्ति, कर्म और योग की अनेक धाराओं ने सदैव मानवता को आत्मोन्नति का मार्ग दिखाया है।

चार दिवसीय शिविर के समापन पर साधकों ने इस आयोजन को आत्मचिंतन, आंतरिक शांति और जीवन को अधिक जागरूकता के साथ जीने की दिशा में महत्वपूर्ण अनुभव बताया।

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