देवभूमि जेके न्यूज, ऋषिकेश, 11 अक्टूबर। हिमालय की पावन गोद और माँ गंगा के निर्मल तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ हुआ। माँ आदिशक्ति की आराधना, विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन, मंत्रोच्चार और विश्वकल्याण की मंगलकामनाओं के बीच गंगा तट का वातावरण भक्तिमय हो उठा। इस अवसर पर माँ भगवती से समस्त विश्व में शांति, सद्भाव, सुख-समृद्धि और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना की गई।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस और नवरात्रि के पावन संयोग पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने बालिकाओं के सम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का संदेश देते हुए कहा कि **कन्याओं को जिमाएँ भी और जमाएँ भी।** अर्थात बेटियों को केवल पूजने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दें, उनके सपनों को उड़ान दें, उनकी अलग पहचान बनाएं और उन्हें समाज में सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि शारदीय नवरात्रि केवल शक्ति की उपासना का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को पहचानने, आत्मशुद्धि करने और जीवन को श्रेष्ठ बनाने का महापर्व है। माँ दुर्गा की आराधना हमें अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। जब व्यक्ति अपने भीतर की दिव्यता को पहचानता है, तब उसका जीवन श्रद्धा, साहस, करुणा और सद्कर्मों से आलोकित होने लगता है।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में शक्ति को सृष्टि का मूल आधार माना गया है। माँ आदिशक्ति सृजन, संरक्षण, साहस, करुणा और परिवर्तन की दिव्य चेतना हैं। नवरात्रि हमें इस चेतना से जुड़ने और इसे अपने विचारों, व्यवहार तथा कर्मों में उतारने का अवसर प्रदान करती है। माँ भगवती की आराधना का वास्तविक उद्देश्य जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने श्रीदुर्गासप्तशती का उल्लेख करते हुए कहा कि देवी माहात्म्य में माँ दुर्गा के महिषासुरमर्दिनी स्वरूप के माध्यम से अधर्म, अहंकार और आसुरी प्रवृत्तियों पर धर्म तथा दिव्य शक्ति की विजय का संदेश दिया गया है। नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है। माँ शैलपुत्री दृढ़ता और श्रद्धा, माँ ब्रह्मचारिणी तप एवं साधना, माँ चंद्रघंटा साहस, माँ कूष्मांडा सृजनशक्ति, माँ स्कंदमाता वात्सल्य, माँ कात्यायनी शक्ति, माँ कालरात्रि निर्भयता, माँ महागौरी पवित्रता और माँ सिद्धिदात्री सिद्धि एवं पूर्णता की प्रेरणा देती हैं।
उन्होंने कहा कि नवरात्रि की साधना तभी सार्थक होगी, जब उसका प्रभाव हमारे आचरण और सामाजिक व्यवहार में दिखाई देगा। माँ दुर्गा की उपासना के साथ प्रत्येक बेटी को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए। प्रत्येक नारी को समान गरिमा प्राप्त हो तथा समाज के वंचित और जरूरतमंद लोगों तक सहयोग एवं करुणा पहुंचे। भक्ति का वास्तविक स्वरूप सेवा, सद्भाव और संवेदनशीलता में प्रकट होता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि व्रत का अर्थ केवल आहार का संयम नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार की शुद्धि भी है। जप के साथ आत्मचिंतन, उपासना के साथ सदाचार और भक्ति के साथ सेवा का समन्वय ही नवरात्रि की साधना को पूर्णता प्रदान करता है। जब मन निर्मल, वाणी मधुर और कर्म परोपकार से युक्त होते हैं, तब जीवन स्वयं माँ भगवती के चरणों में अर्पित पुष्प बन जाता है।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के संदर्भ में उन्होंने समाज से आह्वान किया कि बेटियों को समान अवसर उपलब्ध कराना, उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, आत्मनिर्भर बनाना और उनके निर्णयों का सम्मान करना सामूहिक जिम्मेदारी है। बेटियों को केवल आशीर्वाद ही नहीं, बल्कि आगे बढ़ने के लिए आवश्यक संसाधन, विश्वास और स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। जब बालिकाएं शिक्षित, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनेंगी, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र का भविष्य अधिक सशक्त होगा।
परमार्थ निकेतन से दिया गया यह संदेश नवरात्रि की आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी रेखांकित करता है। माँ भगवती सभी के जीवन में शक्ति, शांति और सद्बुद्धि का संचार करें, प्रत्येक हृदय में करुणा जागृत हो, हर घर में मंगल हो तथा संपूर्ण विश्व में प्रेम, एकता और सद्भाव की अविरल धारा प्रवाहित होती रहे।







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