देव भूमि जे के न्यूज,ऋषिकेश, 3 नवंबर। परमार्थ निकेतन भारतीय ऋषि परम्परा, योग, वेद, वेदान्त और सनातन जीवनदर्शन का वैश्विक केंद्र बनकर विश्वभर के साधकों को भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान से जोड़ रहा है। विभिन्न देशों से आने वाले जिज्ञासु, विद्यार्थी और आध्यात्मिक साधक यहां भारतीय संस्कृति और जीवनशैली को केवल जान ही नहीं रहे, बल्कि योग, ध्यान, साधना और सेवा के माध्यम से उसे अपने जीवन में आत्मसात भी कर रहे हैं।
परमार्थ निकेतन का शांत और आध्यात्मिक वातावरण साधना, स्वाध्याय, योग, सत्संग और सेवा की समृद्ध भारतीय परम्परा का जीवंत उदाहरण है। यहां प्रातःकालीन योग एवं ध्यान, वेद मंत्रों का उच्चारण, आध्यात्मिक चर्चाएं, सत्संग और मां गंगा की आरती साधकों को भारतीय अध्यात्म की गहराई से परिचित कराती हैं।
परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य और मार्गदर्शन में देश-विदेश से आने वाले साधक अध्यात्म के वास्तविक स्वरूप को समझ रहे हैं। स्वामी जी का संदेश है कि आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों की पवित्रता, व्यवहार में विनम्रता, मन में करुणा और कर्मों में सेवा का भाव ही वास्तविक आध्यात्मिक जीवन का आधार है।
वेदों और उपनिषदों के ज्ञान के माध्यम से साधक जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर चिंतन करते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः और आत्मवत् सर्वभूतेषु जैसे सनातन विचारों के माध्यम से संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की भारतीय परम्परा से परिचित होते हैं।
साध्वी भगवती सरस्वती के मार्गदर्शन में विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय साधक वेदान्त, ध्यान, आत्मचिंतन और आंतरिक रूपांतरण की यात्रा को समझ रहे हैं। विभिन्न देशों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आए जिज्ञासुओं को आत्मा, चेतना, मन, अहंकार, शांति और जीवन के उद्देश्य जैसे गहन विषयों को सरल एवं व्यावहारिक रूप में समझने का अवसर मिल रहा है।
परमार्थ निकेतन की विशेषता है कि यहां प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक जीवन के बीच सुंदर समन्वय दिखाई देता है। विभिन्न भाषाओं, देशों और संस्कृतियों के लोग एक आध्यात्मिक परिवार के रूप में योग, ध्यान, सत्संग और सेवा गतिविधियों में सहभागी बनते हैं। मां गंगा के तट पर होने वाली आरती प्रकृति, जीवन और परम चेतना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अनूठा अनुभव प्रदान करती है।
यहां आध्यात्मिक शिक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण, नदियों की स्वच्छता, जैव विविधता, सादगी, शाकाहार, करुणा और निःस्वार्थ सेवा जैसे विषयों पर भी विशेष जोर दिया जाता है। भारतीय ऋषि परम्परा में अध्यात्म और प्रकृति, आत्मकल्याण और लोककल्याण को सदैव एक-दूसरे का पूरक माना गया है।
आज विश्व मानसिक तनाव, सामाजिक असंतुलन, संघर्ष और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित योग, ध्यान, वेदान्त और समग्र जीवनदर्शन की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। परमार्थ निकेतन से जुड़ने वाले साधक यहां से केवल आध्यात्मिक अनुभव लेकर नहीं लौटते, बल्कि ऐसी जीवनदृष्टि भी लेकर जाते हैं, जो उन्हें स्वयं, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि से जोड़ती है।
विश्व वन हेल्थ दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने संदेश दिया कि मानव स्वास्थ्य, पशु-पक्षियों का स्वास्थ्य और प्रकृति का स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जंगल सुरक्षित रहेंगे, जैव विविधता संरक्षित होगी और पर्यावरण का संतुलन बना रहेगा, तभी जीवन स्वस्थ और सुरक्षित रह सकेगा।
उन्होंने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि एक स्वस्थ पृथ्वी ही सभी के स्वस्थ भविष्य का आधार है।
परमार्थ निकेतन से प्रवाहित हो रही योग, अध्यात्म, वेद और वेदान्त की यह ज्ञानगंगा किसी देश, भाषा या संस्कृति की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता को शांति, सद्भाव, करुणा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दे रही है।







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