देव भूमि जे के न्यूज,हरिद्वार, 30 अक्टूबर। भारतीय ज्ञान परंपरा, वेद-वेदांग, संस्कृत, दर्शन और सनातन धर्म के मूल स्वरूप के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में देशभर के प्रमुख संतों, धर्माचार्यों, संस्कृत विद्वानों, शिक्षाविदों और विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित विभूतियों ने भाग लिया।
योगऋषि स्वामी रामदेव के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन तथा आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में आयोजित इस सम्मेलन का प्रमुख केंद्र सनातन शास्त्र शुद्धिकरण अभियान रहा। सम्मेलन में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिकता, मूल पांडुलिपियों के संरक्षण, प्रक्षिप्त अंशों के शास्त्रीय परीक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करने पर व्यापक विमर्श हुआ।
सम्मेलन में जगद्गुरु शंकराचार्य, कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती, मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास, गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद, स्वामी माधवप्रिय, महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानंद, स्वामी सतुआ बाबा, कैवल्य पीठाधीश्वर स्वामी अविचलदास, स्वामी भागवत स्वरूप, संत सुधांशु महाराज, पुंडरीक गोस्वामी, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, स्वामी परमात्मानंद, नाथ संप्रदाय के स्वामी निर्मलानंद सहित अनेक संतों का सान्निध्य रहा।
इसके अलावा विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, आरएसएस के रामलाल सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भी सम्मेलन में सहभागिता की।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था, शासन और व्यवहार सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। वहीं कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद ने कहा कि वेद वाणी अमर है और उसके मूल में निहित सत्य एवं समग्रता को समाज के सामने लाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में विचार आत्मा से निकलता है, एआई से नहीं। शास्त्रों की व्याख्या में सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि अर्थ का अनर्थ न हो।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि सनातन की यात्रा प्रतिरोध की नहीं, बल्कि शोध की यात्रा है। यह बदले की नहीं, बदलाव की यात्रा है। सनातन पूरे विश्व के कल्याण और सभी को जोड़ने का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि वेद हमारे राष्ट्र का संविधान भी हैं और समाधान भी। आज आवश्यकता है कि समाज को जागृत कर अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि आक्षेप भी सनातन नहीं है और प्रक्षिप्त अंश भी सनातन नहीं हैं।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि वेदों और शास्त्रों में यदि प्रक्षिप्त अंश हैं तो उनका शास्त्रीय परीक्षण आवश्यक है, जिससे वेदों का विशुद्ध स्वरूप सामने आ सके। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को वास्तविक ज्ञान और विवेक से जोड़ने पर भी बल दिया।
स्वामी माधवप्रिय ने कहा कि केवल प्रवचन देने या प्रक्षिप्त अंशों पर चर्चा करने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि व्यवहार में भी इसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे एआई के गुलाम नहीं, बल्कि उसके कुशल उपयोगकर्ता और मार्गदर्शक बनें। भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए संस्कृत के विद्वानों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
वर्चुअल माध्यम से जुड़े स्वामी गोविंददेव गिरि ने शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों के परीक्षण और उनके निर्धारण के लिए एक समिति गठित करने की आवश्यकता बताई। वहीं स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि भारतीय संस्कृति, संस्कार और शास्त्रीय परंपराओं को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संत समाज को एकजुट होकर कार्य करना होगा।
मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास ने संत समाज से एक मंच और एक विचार के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं में पवित्र दृष्टि, शुद्ध आहार और शुद्ध विचार विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। विश्व जागृति मिशन के संत सुधांशु महाराज ने भी सनातन ग्रंथों के प्रामाणिक अध्ययन, संरक्षण और संशोधन को समय की आवश्यकता बताया।
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मनुस्मृति सहित प्राचीन ग्रंथों की मूल प्रतियों को भारत में उपलब्ध कराने और उनके प्रामाणिक अध्ययन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ और मीमांसा भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
पुंडरीक गोस्वामी ने आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान के समन्वय की आवश्यकता बताते हुए सनातन शास्त्रों पर आधारित एआई मॉड्यूल तैयार करने का सुझाव दिया, जिससे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से भी शास्त्रों की प्रामाणिक व्याख्या प्रस्तुत की जा सके।
स्वामी परमात्मानंद ने सनातन परंपरा को व्यक्ति केंद्रित बनाने के बजाय वेद केंद्रित रखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने शास्त्रों के प्रामाणिक अध्ययन और संरक्षण के लिए डिजिटल पोर्टल तैयार करने का सुझाव दिया। नाथ संप्रदाय के स्वामी निर्मलानंद ने युवा पीढ़ी को धर्म और शास्त्रों के वास्तविक स्वरूप से जोड़ने पर बल दिया।
विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों की पहचान और वेद विरुद्ध सामग्री के शास्त्रीय परीक्षण की आवश्यकता बताई। आरएसएस के रामलाल ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति विश्व में सुख-शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
सम्मेलन में पूज्य संतों और विद्वानों के मार्गदर्शन में एक घोषणापत्र तैयार करने की दिशा में भी विचार-विमर्श हुआ। इसके साथ ही देश-विदेश में उपलब्ध प्राचीन मूल पांडुलिपियों को एकत्रित करने, उनका वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय परीक्षण कराने और प्रामाणिक पाठों को संरक्षित करने का आह्वान किया गया।
सम्मेलन का महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की विरासत मानकर नहीं, बल्कि वर्तमान शिक्षा, शोध, तकनीक और भविष्य के निर्माण का आधार बनाकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता, मूल ग्रंथों का संरक्षण और नई पीढ़ी तक वैदिक ज्ञान पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित यह सम्मेलन भारतीय प्राच्यविद्या के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।







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