उत्तराखंड

नवजात की जिंदगी बचाने में ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे अहम, समय पर ऑक्सीजन और CPAP से बच सकती है जान.

देवभूमि जे के न्यूज, डोईवाला। नवजात शिशु के जन्म के बाद शुरुआती एक घंटा उसके जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान सांस लेने में परेशानी…

नवजात की जिंदगी बचाने में ‘गोल्डन ऑवर’ सबसे अहम, समय पर ऑक्सीजन और CPAP से बच सकती है जान.

देवभूमि जे के न्यूज, डोईवाला। नवजात शिशु के जन्म के बाद शुरुआती एक घंटा उसके जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान सांस लेने में परेशानी की सही समय पर पहचान, सुरक्षित मात्रा में ऑक्सीजन की उपलब्धता और जरूरत पड़ने पर CPAP जैसी श्वसन सहायता कई गंभीर जटिलताओं को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हिम्स जौलीग्रांट (हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) के नियोनेटोलॉजी विभाग की ओर से उत्तराखंड नियोनेटोलॉजी सोसायटी के तत्वावधान में उत्तराखंड नियोकॉन-2026 के तहत नवजात शिशुओं के लिए ऑक्सीजन सपोर्ट एवं CPAP विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई।

स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय (एसआरएचयू) के स्किल्स एंड सिमुलेशन सेंटर में आयोजित कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशुओं में श्वसन संबंधी समस्याओं की समय रहते पहचान, ऑक्सीजन थेरेपी के सुरक्षित उपयोग और प्रभावी श्वसन प्रबंधन के संबंध में चिकित्सकों एवं नर्सिंग स्टाफ के व्यावहारिक कौशल को मजबूत करना रहा।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए एसआरएचयू के प्रति कुलपति डॉ. ए.के. देवराड़ी ने कहा कि नवजात मृत्यु दर को कम करने में प्रभावी श्वसन प्रबंधन की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि जानकारी के अभाव में कई बार नवजात को आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन दे दी जाती है, जबकि कुछ मामलों में सही समय पर CPAP जैसी आवश्यक श्वसन सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसी परिस्थितियों को दूर करने के लिए नियमित प्रशिक्षण बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य केवल चिकित्सकीय जानकारी देना नहीं, बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों को ऐसी परिस्थितियों में सही और त्वरित निर्णय लेने के लिए तैयार करना है, ताकि उत्तराखंड के किसी भी हिस्से में कोई नवजात केवल समय पर उचित श्वसन सहायता नहीं मिलने के कारण अपनी जान न गंवाए।

पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ के डॉ. प्रवीण कुमार ने नवजात शिशुओं में सांस की तकलीफ की समय पर पहचान और उसके उचित प्रबंधन को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जन्म के बाद का पहला घंटा ‘गोल्डन ऑवर’ होता है और इस अवधि में लिया गया सही चिकित्सकीय निर्णय नवजात के जीवन के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। उन्होंने रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस की पहचान, सुरक्षित ऑक्सीजन उपयोग और समय पर उचित श्वसन सहायता उपलब्ध कराने के सिद्धांतों पर विस्तार से जानकारी दी।

नियोनेटोलॉजी विभाग के डॉ. चिन्मय चेतन ने बताया कि कार्यशाला को पूरी तरह हैंड्स-ऑन और प्रैक्टिकल आधारित रखा गया, ताकि प्रतिभागी वास्तविक परिस्थितियों में श्वसन संबंधी समस्याओं का बेहतर प्रबंधन कर सकें। कार्यशाला में 38 डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने हिस्सा लिया।

विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को नवजात शिशुओं में श्वसन संकट की पहचान, ऑक्सीजन थेरेपी, CPAP के उचित उपयोग और आधुनिक श्वसन प्रबंधन तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न चिकित्सकीय परिस्थितियों में सही प्रक्रिया अपनाने और समय पर निर्णय लेने का अभ्यास भी कराया गया।

कार्यशाला में इंटरैक्टिव लेक्चर, ओपन डिस्कशन और व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ प्रतिभागियों के ज्ञान का आकलन करने के लिए Kahoot के माध्यम से पोस्ट-टेस्ट भी आयोजित किया गया। विशेषज्ञों ने सुरक्षित ऑक्सीजन उपयोग तथा जरूरतमंद नवजात को समय पर प्रभावी श्वसन सहायता उपलब्ध कराने से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रतिभागियों के साथ चर्चा की।

कार्यशाला के सफल आयोजन में डॉ. पूनम सिंह, डॉ. भाग्यश्री पी.आर., डॉ. दीक्षा गुप्ता, डॉ. तल्हा रहमान, डॉ. रवलीन कौर, डॉ. नरेंद्र शर्मा एवं अंबिका नेगी ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया।

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