मित्रों ! जीवन एक उत्सव है। जीवन एक बार मिला है। जीवन होली है, जीवन रोज दीपावली है। जीवन अपने आप में एक दिव्य और भव्य आयोजन है। इसलिए जीवन में उन सभी रंगों का समावेश होना चाहिए, जो हमें भीतर से प्रसन्न करते हैं। खुशी कोई ऐसी चीज नहीं है जो बाजार में जाकर खरीदी जा सके। खुशी तो हमारे अपने अंतर्मन में बैठी हुई है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उसे पहचानें, उसे बाहर निकालें और अपने जीवन को उत्सव बना दें।
जिंदगी को रोज होली बनाइए, रोज दीपावली बनाइए। अपने सपनों को सतरंगी रंगों से सजाइए और फिर उन्हीं रंगों में स्वयं भी रंग जाइए। यही जीवन का फलसफा है और यही जीवन जीने का एक सुंदर सूत्र भी है।
जीवन के इस उत्सव को आनंद के साथ जीने के लिए हमें उस अमर वाक्य का अनुसरण करना चाहिए—“चरैवेति, चरैवेति।” अर्थात चलते रहो, आगे बढ़ते रहो। एक जगह बैठे रहना जीवन नहीं है। जीवन स्वयं एक यात्रा है और इस यात्रा को चलते-चलते ही पूरा करना चाहिए।
इस धरती पर परमात्मा ने कितनी अद्भुत चित्रकारी कर रखी है। कहीं ऊंचे-ऊंचे पहाड़ हैं, कहीं कल-कल करती नदियां हैं, कहीं अथाह समुद्र है, कहीं घने जंगल हैं, कहीं पशु-पक्षियों का संसार है और कहीं मनुष्य ने हजारों वर्षों में अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं से ऐसे रंग भर दिए हैं कि पृथ्वी का प्रत्येक कोना अपने आप में एक कहानी बन गया है।
हमें उस कहानी को पढ़ना है। घर से निकलना है, मोहल्ले में घूमना है, मोहल्ले से गांव, गांव से कस्बे, कस्बे से शहर, शहर से महानगर, महानगर से देश और देश से विदेश तक जाना है। प्रकृति की इस चित्रकारी को देखना है, समझना है, महसूस करना है और अपने भीतर उतारना है।
ऐसा नहीं है कि हम घूम-फिर नहीं सकते। पहले मन में सपना पैदा होना चाहिए। सपना देखिए। सपने को मन में सजाइए। परमात्मा जब मन में कोई सपना पैदा करते हैं तो उसे पूरा करने का अवसर भी किसी न किसी रूप में सामने आता है।
मैं भी ऐसे ही सपने संजोता रहता हूं। जब कभी उन सपनों को साकार करने का अवसर आता है तो निकल पड़ता हूं—देश और विदेश की अनदेखी जगहों को देखने। हर यात्रा के बाद मेरा विश्वास और मजबूत होता है कि प्रकृति ने हमारे लिए इस धरती पर कितना अनमोल खजाना रख छोड़ा है। हमारे आने से बहुत पहले ही परमात्मा ने देखने, सुनने, चखने, पीने, महसूस करने और स्पर्श करने के लिए असंख्य अनुभव इस धरती पर सजा दिए हैं। हमें बस घर से बाहर निकलकर उन्हें महसूस करना है।
वियतनाम की मेरी यह यात्रा भी इसी सोच की एक कड़ी थी।
दरअसल इस यात्रा का पहला सपना 26 जून 2026 को पूरा होना था। मन में विचार था कि वियतनाम की यात्रा के दौरान 28 जून को अपनी शादी की सालगिरह भी वहीं मनाऊंगा। तैयारियां थीं, उत्साह था और मन में विदेश यात्रा के अनेक सपने सज चुके थे। लेकिन ऐन समय पर जयपुर कीे एक यात्रा कंपनी ने यात्रा स्थगित कर दी। बताया गया कि यात्रा बाद में आयोजित की जाएगी। बार-बार अनुरोध करने के बावजूद जब यात्रा आगे नहीं बढ़ी तो मन को निराशा हुई, लेकिन मैंने यात्रा का सपना छोड़ा नहीं।
इसी बीच ऋषिकेश रेलवे रोड स्थित सूरी इंटरप्राइजेज के संस्थापक सुरेश सूरी जी ने सलाह दी कि पुराने रेलवे स्टेशन के पास स्थित श्री शिव शंकर यात्रा कंपनी से संपर्क किया जाए। उन्होंने बताया कि यात्रा कंपनी के संचालक देवव्रत अग्रवाल को यात्राओं के संचालन का वर्षों का अनुभव है। मैंने उनसे संपर्क किया। उन्होंने बताया कि 18 सितंबर 2026 को वियतनाम की यात्रा आयोजित की जा रही है।
बस, फिर क्या था। एक बार टूट चुका सपना फिर से जुड़ गया। मैंने और मेरी पत्नी रंजू तिवारी ने यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।
18 सितंबर की सुबह लगभग चार बजे ऋषिकेश से दिल्ली एयरपोर्ट के लिए कार में बैठे तो अभी आसमान में पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ था। ऋषिकेश पीछे छूट रहा था और मन में वियतनाम की तस्वीरें बनने लगी थीं। दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर यात्रा दल के बाकी साथी भी धीरे-धीरे एकत्रित होने लगे।
कुल 28 लोग इस यात्रा में हमारे साथ थे—राजेश्वरी, विजय कुमार मित्तल, गौरी शंकर गुप्ता, संगीता गुप्ता, अमर सिंह राजपुरोहित, अशोक कुमार घई, सुमन घई, अथर्व अग्रवाल, शिल्पा अग्रवाल, ओम प्रकाश बंसल, शशि बंसल, सागर बंसल, शिखा बांगा, अंजू अग्रवाल, धर्मेंद्र अग्रवाल, बीना अग्रवाल, सपना गोयल, अनिल कुमार गोयल, जसवंत सिंह कैन, कमलेश कैन, युवान सिंह कैन, प्रतिमा जोशी, अंशु जोशी, रचना कुमारी, मैं स्वयं जयकुमार तिवारी, पत्नी रंजू तिवारी, प्रदीप कुमार शर्मा और रेखा शर्मा।
इनमें कई लोग आपस में पहले से परिचित थे और कई पहली बार मिले थे। लेकिन यात्रा की खूबसूरती यही होती है कि सफर शुरू होते ही अपरिचित चेहरे धीरे-धीरे परिचित होने लगते हैं और कुछ ही दिनों में वही लोग अपने जैसे लगने लगते हैं।
लगभग दोपहर एक बजे हम विमान में सवार हुए। दिल्ली की धरती धीरे-धीरे नीचे छूटती गई और हम बादलों के ऊपर पहुंच गए। कुछ घंटों बाद वियतनाम की धरती दिखाई देने लगी। भारतीय समय के अनुसार लगभग साढ़े छह बजे हम पहुंचे, जबकि वियतनाम में उस समय लगभग आठ बजे थे। वियतनाम भारत से डेढ़ घंटे आगे है।
एयरपोर्ट से बाहर निकले तो हमारी यात्रा कंपनी की ओर से एक वोल्वो बस तैयार थी। 28 लोगों का पूरा दल बस में सवार हुआ और वियतनाम की धरती पर हमारा पहला सामूहिक सफर शुरू हुआ। रास्ते में रोशनी से जगमगाता शहर दिखाई दे रहा था। हम हो ची मिन्ह सिटी में थे, जिसे कभी साइगॉन के नाम से जाना जाता था।
रात में हम बनारस होटल/रेस्टोरेंट पहुंचे। विदेश की धरती पर भारतीय भोजन की खुशबू ने थकान काफी कम कर दी। भोजन किया और फिर होटल में जाकर विश्राम किया। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन अगले दिन के कार्यक्रम को लेकर उत्साहित था।
19 सितंबर की सुबह लगभग आठ बजे होटल में नाश्ता किया। नाश्ते के बाद करीब साढ़े आठ बजे हम कू ची सुरंगों की ओर रवाना हुए। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। ऊंची इमारतों की जगह हरियाली, छोटे घर और ग्रामीण वियतनाम के दृश्य सामने आने लगे।
लगभग साढ़े दस बजे हम कू ची सुरंगों पहुंचे।
कू ची को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में देखना उसके महत्व को छोटा कर देना होगा। यह वियतनाम के युद्ध इतिहास की एक जीवित स्मृति है। जमीन के नीचे बनाई गई सुरंगों का विशाल नेटवर्क कभी युद्ध के कठिन समय में रहने, आने-जाने, छिपने, संचार और विभिन्न आवश्यकताओं के लिए इस्तेमाल किया गया था। बाहर से देखने पर घनी हरियाली और सामान्य जमीन दिखाई देती है, लेकिन उसी जमीन के नीचे एक पूरा भूमिगत संसार मौजूद था।
हम सुरंगों के संकरे रास्तों से गुजरे। कहीं छोटे-छोटे कमरे थे, कहीं भूमिगत रास्ते और कहीं ऐसी व्यवस्थाएं दिखाई दीं जिनसे अंदाजा होता था कि कठिन परिस्थितियों में लोगों ने किस तरह जीवन को व्यवस्थित किया होगा। कुछ जगहों पर सुरंग इतनी संकरी थीं कि उनमें प्रवेश करते समय अपने शरीर को सिकोड़ना पड़ता था।
कू ची की सबसे बड़ी सीख यही लगी कि इतिहास केवल किताब के पन्नों पर नहीं रहता। कभी-कभी इतिहास जमीन के नीचे भी सांस लेता है। वहां खड़े होकर युद्ध की कठिनाइयों और उस समय के लोगों के जीवन की कल्पना करना मन को भीतर तक छू गया।
कू ची का भ्रमण पूरा करने के बाद लगभग एक बजे हम हल्दी रेस्टोरेंट पहुंचे। सुबह से लगातार घूमने के बाद भोजन सभी के लिए बहुत जरूरी था। भोजन की मेज पर चर्चा भी कू ची की सुरंगों को लेकर ही होती रही। किसी को सुरंगों की बनावट आश्चर्यचकित कर रही थी, किसी को युद्धकालीन जीवन की कल्पना विचलित कर रही थी।
भोजन के बाद करीब साढ़े तीन बजे हम वापस हो ची मिन्ह सिटी पहुंचे। कुछ ही घंटों में दृश्य फिर बदल गया। जिस सुबह हम इतिहास के भीतर उतर गए थे, अब हम एक आधुनिक महानगर के बीच थे।
शाम लगभग साढ़े छह बजे हम वॉकिंग स्ट्रीट पहुंचे। सड़क रोशनी से जगमगा रही थी। दुकानों, खान-पान के स्थानों, कैफे और पर्यटकों की भीड़ के बीच शहर का आधुनिक चेहरा सामने था। कू ची की गंभीरता और वॉकिंग स्ट्रीट की चहल-पहल—एक ही दिन में वियतनाम के दो बिल्कुल अलग रूप हमारे सामने थे।
रात आठ बजे बनारस रेस्टोरेंट में भोजन किया। बनारस होटल में उत्तराखंड ऋषिकेश गुमानी वाला, खदरी के दो लोग मिले उनसे परिचय हुआ और दोनों में अपार प्रसन्नता हुई, अपने शहर के यहां दो लोगों से मुलाकात हुई। के दिनभर की थकान के बावजूद सभी के चेहरे पर संतोष था। लगभग नौ बजे होटल लौट आए।
20 सितंबर को यात्रा ने अपना रुख समुद्र की ओर कर लिया। नाश्ते के बाद हम एयरपोर्ट पहुंचे और हो ची मिन्ह सिटी से फु क्वोक के लिए विमान में सवार हुए। लगभग 10:35 बजे उड़ान रवाना हुई और करीब 11:35 बजे हम फु क्वोक पहुंचे।
फु क्वोक वियतनाम के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक द्वीप है और अपने समुद्र तटों, नीले पानी, हरियाली और पर्यटन गतिविधियों के लिए जाना जाता है। हो ची मिन्ह सिटी की भीड़ से निकलकर जब हम यहां पहुंचे तो वातावरण बिल्कुल बदल चुका था। सामने समुद्र था, हवा में नमी और आसपास हरियाली।
होटल पहुंचकर चेक-इन किया गया। भोजन किया और कुछ समय विश्राम के बाद आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण किया। यात्रा अब इतिहास से निकलकर प्रकृति और समुद्र के रंग में प्रवेश कर चुकी थी।
21 सितंबर को फु क्वोक में हमारी यात्रा का सबसे रोमांचक हिस्सा सामने आया। सुबह नाश्ते के बाद हम साओ बीच पहुंचे। सफेद रेत और नीले समुद्र का दृश्य ऐसा था जैसे किसी चित्रकार ने समुद्र के किनारे सफेद रंग की चादर बिछा दी हो।
समुद्र के ऊपर केबल कार, चार द्वीपों की सैर और तेज स्टीमर की रोमांचक वापसी
वियतनाम यात्रा के दौरान 21 सितंबर 2026 का दिन हमारे लिए बेहद रोमांचक और यादगार रहा। इस दिन हमें फु क्वोक के खूबसूरत हॉन थॉम द्वीप की यात्रा का अवसर मिला। यह यात्रा केवल किसी पर्यटन स्थल को देखने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें समुद्र, द्वीप, केबल कार, स्टीमर, समुद्री जीवन, स्वादिष्ट भोजन और रोमांच—सबका अद्भुत संगम देखने को मिला।
सुबह हम अपने निर्धारित स्थान से बस द्वारा हॉन थॉम केबल कार स्टेशन की ओर रवाना हुए। वहां पहुंचने के बाद समुद्र के ऊपर से गुजरने वाली केबल कार में सवार हुए। जैसे ही केबल कार ने जमीन से ऊपर उठकर समुद्र की ओर अपना सफर शुरू किया, रोमांच और उत्सुकता दोनों बढ़ने लगीं।
ऊंचाई से नीचे देखने पर चारों ओर फैला नीला समुद्र, समुद्र में बिखरे छोटे-छोटे द्वीप, चलती हुई नावें और दूर तक दिखाई देता क्षितिज मन को मोह लेने वाला दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी चित्र में प्रवेश कर गए हों। समुद्र के ऊपर से गुजरती केबल कार से फु क्वोक के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने का अनुभव हमारे लिए अविस्मरणीय रहा।
हॉन थॉम पहुंचने के बाद हमने वहां के मनोरंजन और प्राकृतिक वातावरण का आनंद लिया। वहां आसमान में झूले जैसी रोमांचक सवारी पर बैठकर आसपास के समुद्री क्षेत्र और प्राकृतिक दृश्यों को ऊपर से देखने का अवसर भी मिला। ऊंचाई से समुद्र और आसपास का क्षेत्र देखने पर पूरा दृश्य और भी आकर्षक नजर आया।
इसके बाद सामूहिक रूप से दोपहर के भोजन की व्यवस्था की गई। जिस स्थान पर भोजन कराया गया, वहां हजारों लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। भोजन की इतनी विशाल और विविध व्यवस्था देखकर हम सभी प्रभावित हुए। वहां शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों प्रकार के अनेक व्यंजन उपलब्ध थे। सभी लोगों ने अपनी पसंद और खान-पान के अनुसार भोजन किया। इतने बड़े समूह के बीच व्यवस्थित ढंग से भोजन करना भी इस यात्रा का एक अलग अनुभव रहा।
भोजन के बाद हमारी यात्रा का अगला चरण और भी रोमांचक था। वापसी के लिए हम केबल कार से नहीं, बल्कि तेज स्टीमर से लौटे। स्टीमर से वापस आते हुए हमें समुद्र के बीच से गुजरने और रास्ते में लगभग चार द्वीपों के आसपास के समुद्री दृश्यों को देखने का अवसर मिला।
तेज गति से समुद्र की लहरों को चीरता हुआ स्टीमर आगे बढ़ रहा था और चारों ओर केवल समुद्र ही समुद्र दिखाई दे रहा था। कभी लहरें तेज होतीं तो कभी समुद्र शांत दिखाई देता। समुद्र के बीच से गुजरते हुए चारों ओर के द्वीपों को देखना अपने आप में रोमांचकारी अनुभव था। इस सफर ने हमें समुद्री यात्रा का एक अलग ही आनंद दिया।
इस यात्रा के दौरान हमें समुद्री जीवन और समुद्र के भीतर रहने वाले जीवों के बारे में भी जानकारी दी गई। समुद्र के अंदर पाए जाने वाले जीवों और उनके प्राकृतिक निवास से संबंधित वीडियो दिखाए गए। वीडियो के माध्यम से यह समझने का अवसर मिला कि समुद्र की सतह के नीचे भी एक विशाल और अद्भुत दुनिया मौजूद है, जो सामान्य रूप से हमारी आंखों से दिखाई नहीं देती।
यात्रा के दौरान कई लोगों ने अपने कैमरों और मोबाइल फोन से समुद्र, द्वीपों, स्टीमर और आसपास के प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें खींचीं। कुछ पर्यटकों के लिए समुद्र के नीचे जाकर समुद्री जीवन को करीब से देखने और उसके साथ तस्वीरें खिंचवाने की सुविधा भी थी। वहां फोटोग्राफर भी मौजूद थे और बताया गया कि जो लोग समुद्र के नीचे जाकर इस अनुभव का आनंद लेना चाहते हैं, वे जा सकते हैं।
हालांकि हमारे समूह में से कोई भी साथी समुद्र के नीचे जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसलिए हमने समुद्र के भीतर जाकर उस अनुभव को लेने के बजाय वहां दिखाई गई वीडियो के माध्यम से ही समुद्री जीवन को देखा और उसी से संतोष का अनुभव किया। कभी-कभी किसी स्थान को प्रत्यक्ष देखने के बजाय उसके बारे में दिखाई गई जानकारी और वीडियो भी उस दुनिया की कल्पना को हमारे सामने जीवंत कर देती है।
तेज स्टीमर से यात्रा करते हुए आखिरकार हम उस स्थान पर पहुंच गए जहां हमारी बस खड़ी थी। सभी यात्री क्रम से बस में सवार हुए और दिनभर की रोमांचक यात्रा की यादों को अपने साथ लेकर वापस लौट चले।
इस पूरे दिन में हमने फु क्वोक के समुद्री जीवन का एक अलग रूप देखा। सुबह समुद्र के ऊपर से केबल कार की यात्रा, फिर हॉन थॉम में मनोरंजन और आसमानी झूले का रोमांच, हजारों लोगों के बीच सामूहिक भोजन, समुद्र और द्वीपों के बीच तेज स्टीमर की वापसी, चार द्वीपों के आसपास के मनोहारी दृश्य और समुद्र के भीतर बसे जीव-जगत की जानकारी—इन सभी अनुभवों ने इस दिन को हमारी वियतनाम यात्रा का एक विशेष अध्याय बना दिया।
यह यात्रा हमें यह महसूस कराती रही कि समुद्र केवल पानी का विशाल विस्तार नहीं है। उसकी सतह के ऊपर द्वीपों और नावों की अपनी दुनिया है और उसके नीचे असंख्य जीवों का अपना संसार। एक ही दिन में इन दोनों दुनियाओं की झलक मिलना हमारे लिए वास्तव में अद्भुत अनुभव रहा।
बस जब वापस अपने गंतव्य की ओर बढ़ी तो शरीर में दिनभर की थकान जरूर थी, लेकिन मन में समुद्र के नीले विस्तार, केबल कार से दिखाई दिए नजारे, स्टीमर की तेज रफ्तार और हॉन थॉम की खूबसूरत यादें थीं। कैमरों में कैद तस्वीरों के साथ-साथ यह यात्रा हमारे मन में भी हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
21 सितंबर 2026 का यह दिन हमारे लिए केवल फु क्वोक की यात्रा नहीं, बल्कि समुद्र के ऊपर, समुद्र के बीच और समुद्र के भीतर बसे जीवन को महसूस करने वाली एक अविस्मरणीय यात्रा बन गया।
साथियों के साथ समुद्र किनारे घूमना, तस्वीरें खिंचवाना और कुछ समय प्रकृति के बीच बिताना बहुत आनंददायक रहा। इसके बाद हम हॉन थॉम की ओर बढ़े। यहां समुद्र के ऊपर चलने वाली लंबी केबल कार यात्रा अपने आप में एक अलग अनुभव थी।
केबल कार जब समुद्र के ऊपर से गुजर रही थी तो नीचे नीला पानी और दूर-दूर तक फैले द्वीप दिखाई दे रहे थे। ऊपर से देखने पर समुद्र का विस्तार और भी विराट लगता है। उस क्षण लगा कि धरती कितनी बड़ी है और हम कितने छोटे हैं।
स्टीमर आगे बढ़ता गया और फुकुओका शहर की ऊँची इमारतें, पुल तथा बंदरगाह धीरे-धीरे पीछे छूट गए। चारों ओर नीला समुद्र और ऊपर खुला आकाश दिखाई दे रहा था। कभी-कभी समुद्री पक्षी स्टीमर के साथ उड़ते, जिससे यात्रा और भी रोमांचक लगती।
पहले द्वीप पर हमें हरे-भरे पहाड़ और शांत समुद्र-तट दिखाई दिए। दूसरे द्वीप पर रंग-बिरंगे घर और स्थानीय लोगों की सरल जीवनशैली ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। तीसरे द्वीप पर समुद्र की ऊँची लहरें चट्टानों से टकरा रही थीं। उनकी गूँज प्रकृति की शक्ति का अनुभव करा रही थी। चौथे द्वीप पर सूर्यास्त का दृश्य सबसे मनमोहक था। आकाश लाल, नारंगी और सुनहरे रंगों से भर गया था। हमारी वापसी स्टीमर की सैर के साथ हुई,वापसी के समय हमारे मन में खुशी और रोमांच की मिली-जुली भावनाएँ थीं। समुद्र की लहरें, द्वीपों की प्राकृतिक सुंदरता और स्टीमर की तेज़ गति ने इस यात्रा को यादगार बना दिया। यह यात्रा हमें सिखाती है कि प्रकृति के बीच बिताया गया समय मन को शांति और नई ऊर्जा प्रदान करता है।
शाम को किस ब्रिज क्षेत्र पहुंचे। समुद्र और आधुनिक स्थापत्य का सुंदर मेल वहां दिखाई देता है। इसके बाद नाइट मार्केट गए। रंगीन रोशनी, दुकानें, स्थानीय सामान और खान-पान की खुशबू ने शाम को और रंगीन बना दिया। रात में होटल लौटकर भोजन और विश्राम किया।
22 सितंबर को फु क्वोक से दा नांग की ओर प्रस्थान हुआ। लगभग 9:35 बजे हमने उड़ान भरी और करीब 11:20 बजे दा नांग पहुंचे।दा नांग मध्य वियतनाम का महत्वपूर्ण शहर है। एक तरफ समुद्र, दूसरी तरफ पहाड़ और बीच में आधुनिक शहर—इस भौगोलिक स्थिति ने इसे पर्यटन के लिए विशेष बना दिया है। यहां पहुंचकर हम अपने होटल Mường Thanh Luxury Song Han Hotel पहुंचे।
होटल में चेक-इन के बाद भोजन और विश्राम किया। होटल में मिलने वाला नाश्ता भी अपने आप में वियतनामी भोजन संस्कृति से परिचय कराने वाला था। चावल से बने अलग-अलग व्यंजन, सब्जियां, सूप, स्टिर-फ्राइड सब्जियां, स्टिकी राइस और मांसाहारी व्यंजन स्थानीय खान-पान की विविधता दिखा रहे थे। मैं खाने के जो व्यंजन लगे हुए थे जो भोजन थे उन पर लगे स्टीकरों को गूगल से सर्च करके लगातार देख रहा था कि कहीं यह मांसाहारी तो नहीं है और तभी उसे व्यंजन को चक रहा था। क्योंकि होटल में बड़े ही सुंदर ढंग से बीफ को सजा कर रखा था जो पहचान में नहीं आ रही थी कि शाकाहारी है या मांसाहारी है उसके नीचे लगे टैग जो वियतनामी भाषा में थे उसको अनुवादित कर मैं समझ पा रहा था यह शाकाहारी है या मांसाहारी है।हम भारत से आए हमारे दल के लिए यह स्वाद की एक नई दुनिया थी।
इसके बाद हम होई आन के लिए निकले।
होई आन दा नांग से अलग एक दूसरी ही दुनिया जैसा लगा। यह प्राचीन नगर सदियों से व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। कभी यहां समुद्री व्यापार के कारण अलग-अलग देशों के व्यापारी आते थे। इसी वजह से इसकी वास्तुकला और संस्कृति में वियतनामी परंपरा के साथ बाहरी संस्कृतियों का प्रभाव भी दिखाई देता है।
पुरानी पीली इमारतें, लकड़ी के घर, संकरी गलियां और रंग-बिरंगी लालटेनें होई आन को विशिष्ट बनाती हैं।
इसके बाद हमें नारियल वन क्षेत्र में बास्केट बोट की सवारी का अवसर मिला। गोलाकार नाव में बैठकर पानी के बीच नारियल के पेड़ों के बीच घूमना बहुत मजेदार रहा। हमारे दल के कई लोग इस अनुभव को लेकर विशेष रूप से उत्साहित थे। सभी लोगों ने गोल-गोल नाव में घूमते हुए और हिंदी गाने का आनंद लेते हुए अपनी अपनी फोटो तस्वीर बना रहे थे। अपने-अपने मोबाइल में कैद कर रहे थे। इसके साथ ही वहां पर एक फोटोग्राफर भी था जो विभिन्न क्रियाकलापों की फोटो अपने कमरे में कैद कर रहा था और जिसको चाहिए उसे बनाकर आपको हाथ दे रहा था, वहां गोल नाव चलाने वाली अधिकांश महिलाएं थीं जिनका रवैया बहुत ही सकारात्मक और हंसमुख था और वह गोल-गोल नाव चला रही थी और सभी का मनोरंजन अपनी मौन भाषा से कर रही थी। हिंदी फिल्मों के गाने चलाकर गोल नाव में घूमने और चारों तरफ नारियल के पेड़ देखने का अनुभव बेजोड़ रहा। लगभग 2 घंटे तक नारियल से बने गोला में घूमने के बाद हमारी वापसी हुई
शाम होते-होते होई आन की लालटेनें जल उठीं। दिन में दिखाई देने वाला पुराना शहर रात में एक अलग ही रूप ले चुका था। रोशनी से सजी गलियों में घूमते हुए ऐसा लगता था जैसे किसी पुराने चित्र में प्रवेश कर गए हों।
भोजन के बाद हम दा नांग लौटे और होटल में विश्राम किया।
23 सितंबर हमारी यात्रा का एक और यादगार दिन था। सुबह नाश्ते के बाद हम बा ना हिल्स की ओर रवाना हुए।
बा ना हिल्स दा नांग के पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र में स्थित पर्यटन स्थल है। समुद्र तट से अचानक ऊंचे पहाड़ों की ओर बढ़ते हुए मौसम और वातावरण दोनों बदलने लगते हैं। जैसे-जैसे वाहन ऊपर चढ़ता गया, नीचे शहर और आसपास की धरती छोटी होती गई और सामने बादल, पहाड़ तथा हरियाली दिखाई देने लगी।
इसके बाद केबल कार की यात्रा शुरू हुई। पहाड़ों और जंगलों के ऊपर से गुजरती केबल कार में बैठना रोमांचकारी था। नीचे घने जंगल और दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दे रहे थे।
ऊपर पहुंचकर सबसे प्रसिद्ध आकर्षण गोल्डन ब्रिज हमारा इंतजार कर रहा था। विशाल पत्थर जैसे हाथों के आकार के सहारों पर बना यह पुल पहाड़ और बादलों के बीच बेहद आकर्षक दिखाई देता है। 28 यात्रियों के हमारे दल ने यहां जमकर तस्वीरें खिंचवाईं।
इसके बाद पहाड़ पर स्थित विशाल बुद्ध प्रतिमा के दर्शन किए। चारों तरफ पहाड़ी शांति, हरियाली और ऊंचाई पर स्थित विशाल प्रतिमा का दृश्य मन में अलग तरह की शांति पैदा कर रहा था।
उसे पहाड़ पर स्वर्ग जैसा दृश्य प्रस्तुत किया गया था जगह-जगह पार्क थे उसमें लगे फुल मनमोहक और लुभावने लग रहे थे, हल्की हल्की बारिश हो रही थी चारों तरफ बादल छाए हुए थे और बादलों के बीच में घूमना अपने आप में रोमांच पैदा कर रहा था। पूरे पहाड़ पर रंग-बिरंगे फूल पार्क और विभिन्न कलाकृतियां बनी हुई थी करीना से सजी हुई थी।
इसके बाद फ्रेंच विलेज पहुंचे। यूरोपीय शैली की इमारतें, सड़कें और पहाड़ी वातावरण देखकर ऐसा लगा जैसे वियतनाम के भीतर अचानक यूरोप का कोई छोटा-सा नगर सामने आ गया हो। उसी जगह पर हमने बियर की फैक्ट्री भी अच्छी किस प्रकार से बियर बनता है हमारी एक टिकट पर या तो आलू से बने फ्रेंचाइजी या एक बियर लगभग दो गिलास प्रत्येक व्यक्ति को दी जा रही थी। बहुत बड़े हॉल में लोग ताजा बीयर बैठकर पी रहे थे। फिर आया मनोरंजन का समय। Fantasy Park में झूलों और विभिन्न मनोरंजन गतिविधियों का आनंद लिया। कुछ क्षणों के लिए यह भूल गए कि हम सब अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से कितनी दूर आ चुके हैं। वहां हर व्यक्ति के चेहरे पर वही खुशी थी जो बचपन में किसी मेले के झूले पर बैठते समय होती थी।फिर हम केवल कर से वापस आए। नीचे आकर एक छोटा सा मार्केट बना हुआ था वहां कुछ लोगों ने खरीदारी की और बस में सवार होकर शाम को दा नांग वापस लौटे। होटल में भोजन किया और विश्राम किया।
24 सितंबर को दा नांग के कुछ प्रमुख क्षेत्रों का भ्रमण किया गया। माई खे बीच, हान नदी और ड्रैगन ब्रिज जैसे स्थानों ने शहर की भौगोलिक और आधुनिक पहचान को सामने रखा। दा नांग की खासियत यही है कि यहां समुद्र, नदी, पहाड़ और आधुनिक शहरी जीवन एक-दूसरे के बहुत करीब दिखाई देते हैं।
शाम को लगभग 7:25 बजे हमने दा नांग से हनोई के लिए उड़ान भरी और करीब 8:50 बजे हनोई पहुंचे।
हनोई वियतनाम की राजधानी है और इसका इतिहास लगभग एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह शहर वियतनाम के राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। होटल पहुंचकर भोजन किया और विश्राम किया।
25 सितंबर की सुबह नाश्ते के बाद हम हालोंग बे के लिए रवाना हुए।
जैसे-जैसे बस हनोई से दूर जाती गई, शहर की भीड़ पीछे छूटती गई। ग्रामीण क्षेत्र, खेत और छोटे कस्बे दिखाई देते रहे। फिर अचानक समुद्र का विस्तार सामने आया।
हालोंग बे का दृश्य देखकर कुछ क्षण के लिए सभी की निगाहें ठहर गईं।समुद्र के नीले पानी के बीच सैकड़ों चूना-पत्थर की ऊंची-ऊंची प्राकृतिक संरचनाएं खड़ी हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार ने समुद्र के विशाल कैनवास पर एक-एक करके पहाड़ों की आकृतियां बना दी हों।
इन चट्टानी द्वीपों का निर्माण करोड़ों वर्षों में प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाओं से हुआ है। समुद्र और चूना-पत्थर के लंबे समय तक चले क्षरण ने इन्हें ऐसी आकृतियां दी हैं जो दूर से किसी मूर्ति जैसी दिखाई देती हैं।
तीन मंजिला क्रुज पर सवार होकर हमारी टीम समुद्र के बीच गए। चारों ओर पानी, ऊपर खुला आकाश और बीच-बीच में विशाल चट्टानी द्वीप—यह दृश्य लंबे समय तक आंखों में बसा रहने वाला था। क्रूज में चारों तरफ से कुर्सियां लगी हुई थी और बीच में हमारे सभी लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था थी भोजन में हर प्रकार के व्यंजन थे शाकाहारी मांसाहारी एवं वियतनामी व्यंजन टेबलों पर पूर्व से गए थे जिसे जो मन में आया अपनी भूख के अनुसार भोजन का आनंद लिया उसके बाद हम क्रूज की छत पर शाम का लुभावना मौसम और डूबते हुए सूर्य को देखने का एक अलग ही रोमांच था। हमारे साथियों ने वहां हिंदी गाने पर ठुमके लगाए फोटो खींचे और हमारी वापसी हुई।
आपको बता दें कि नाव पर सामूहिक भोजन किया गया। समुद्र के बीच अपने 28 साथियों के साथ भोजन करना यात्रा की सबसे आत्मीय स्मृतियों में शामिल हो गया।
दिनभर प्रकृति को देखने के बाद हम शाम को हनोई लौटे।
26 सितंबर यात्रा का अंतिम दिन था।
सुबह नाश्ते के बाद हनोई के प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण किया। सबसे पहले हो ची मिन्ह परिसर और उसके आसपास के महत्वपूर्ण स्थलों को देखा। इसके बाद वन पिलर पगोडा और प्रेसिडेंशियल पैलेस क्षेत्र का भ्रमण किया।
हनोई में साहित्य मंदिर का अनुभव भी महत्वपूर्ण रहा। यह वियतनाम की प्राचीन शिक्षा और विद्या परंपरा से जुड़ा स्थल है। यहां पहुंचकर यह महसूस हुआ कि किसी देश को केवल उसकी सड़कें, बाजार और पर्यटन स्थल देखकर नहीं समझा जा सकता। उसकी शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और इतिहास को समझना भी उतना ही जरूरी है।
इसके बाद पुराने शहर और बाजारों में घूमे। स्थानीय वस्तुओं, स्मृति-चिह्नों, कपड़ों और वियतनामी कॉफी की खरीदारी की। सभी मित्रों ने यहां पर जमकर खरीदारी की अपने प्रिय जनों के लिए जिसको जो समझ में आया खरीदा और पैकिंग कराकर अपने-अपने हिसाब से उसे अपने साथ लिया और हम निकल पड़े हनोई में ट्रेन का रोमांच देखने के लिए, हमें हनोई की ट्रेन स्ट्रीट के आसपास का जीवन भी देखने का अवसर मिला।वियतनाम की राजधानी हनोई की यात्रा में ट्रेन स्ट्रीट का अनुभव अपने आप में एक अलग रोमांच समेटे हुए है। शहर की संकरी गलियों के बीच बिछी रेलवे पटरी और उसके दोनों ओर बेहद करीब बने छोटे-छोटे कैफे इस स्थान को अनोखी पहचान देते हैं।
पटरी के किनारे बने कैफे में लोग आराम से बैठकर कॉफी, चाय, ठंडे पेय, बियर और नाश्ते का आनंद लेते दिखाई देते हैं। कुछ ही क्षणों में वातावरण का रंग बदल जाता है। जैसे ही ट्रेन के आने का समय होता है, कैफे संचालक लोगों को सुरक्षित दूरी पर रहने के लिए कहते हैं और दुकानों का सामान भी पटरी से पीछे कर दिया जाता है।
इसके बाद दूर से ट्रेन की आवाज सुनाई देती है। धीरे-धीरे बढ़ती हुई ट्रेन जब बेहद करीब से गुजरती है तो उसके पहियों की आवाज, इंजन की गड़गड़ाहट और यात्रियों की उत्सुकता मिलकर रोमांच पैदा कर देती है। दो मंज़िला ट्रेन का पास से गुजरना तो इस अनुभव को और भी खास बना देता है। कुछ ही सेकंड में ट्रेन सामने से गुजरती हुई आगे निकल जाती है और फिर वही संकरी गली सामान्य जीवन में लौट आती है।
हनोई की इस ट्रेन स्ट्रीट में सबसे खास बात यह है कि यहां रेलवे और रोजमर्रा की जिंदगी एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई देते हैं। कहीं लोग कॉफी की चुस्की लेते नजर आते हैं, कहीं नाश्ता करते हुए बातचीत करते हैं और कहीं पर्यटक ट्रेन के गुजरने के रोमांच को अपने कैमरे में कैद करते दिखाई देते हैं।
यह अनुभव केवल ट्रेन देखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हनोई के स्थानीय जीवन, संस्कृति और शहर की अनूठी जीवनशैली को करीब से महसूस करने का अवसर भी देता है। पटरी के किनारे बैठकर ट्रेन के गुजरने का इंतजार करना और फिर उसके कुछ ही दूरी से गुजर जाने का दृश्य लंबे समय तक याद रहता है।
अब यात्रा का अंतिम समय आ चुका था।
18 सितंबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर जब हम 28 लोग पहली बार मिले थे तो अधिकांश एक-दूसरे के लिए अपरिचित थे। लेकिन नौ दिनों में साथ उड़ते-उड़ते, बस में बैठते-बैठते, एक साथ नाश्ता और भोजन करते, समुद्र देखते, पहाड़ चढ़ते, झूले झूलते, तस्वीरें खिंचवाते और एक-दूसरे का ध्यान रखते-रखते कब यह समूह एक परिवार जैसा हो गया, पता ही नहीं चला।
विदा लेने का समय आया तो सभी ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं। कुछ तस्वीरें आखिरी बार खिंचवाई गईं। हंसी-मजाक के बीच कहीं न कहीं मन में यह भी था कि यह साथ अब रोज नहीं मिलेगा।
वियतनाम से वापसी की उड़ान ने जब इस यात्रा को समाप्ति की ओर पहुंचाया तो मन में पिछले नौ दिनों की पूरी कहानी चलचित्र की तरह घूमने लगी।
18 सितंबर की सुबह चार बजे ऋषिकेश से निकले थे।
दिल्ली पहुंचे।
28 साथियों से मिले।
दोपहर की उड़ान पकड़ी।
हो ची मिन्ह पहुंचे।
बनारस में भोजन किया।
19 सितंबर को कू ची की सुरंगों में इतिहास के भीतर उतरे।
हल्दी रेस्टोरेंट में भोजन किया।
वॉकिंग स्ट्रीट की रोशनी देखी।
बनारस रेस्टोरेंट में भोजन किया।
20 सितंबर को समुद्र की ओर उड़ चले।
फु क्वोक पहुंचे।
21 सितंबर को साओ बीच देखा।
हॉन थॉम की समुद्र के ऊपर चलती केबल कार में बैठे।
झूले झूले।
किस ब्रिज और नाइट मार्केट देखा।
22 सितंबर को दा नांग पहुंचे।
होई आन की पुरानी गलियों में घूमे।
बास्केट बोट की सवारी की।
23 सितंबर को बा ना हिल्स के बादलों के बीच पहुंचे।
गोल्डन ब्रिज देखा।
विशाल बुद्ध प्रतिमा के दर्शन किए।
फ्रेंच विलेज देखा।
झूलों और मनोरंजन का आनंद लिया।
24 सितंबर को दा नांग की समुद्र और नदी की सुंदरता देखी।
फिर हनोई पहुंचे।
25 सितंबर को हालोंग बे के समुद्र में उतरे।
प्रकृति की विराटता को देखा।
26 सितंबर को हनोई के इतिहास और संस्कृति को जाना।
और फिर विदाई का समय आ गया।
दिल्ली पहुंचकर सभी साथी अपने-अपने गंतव्य की ओर चले गए। मैं और रंजू तिवारी दिल्ली एयरपोर्ट से कार द्वारा ऋषिकेश के लिए निकल पड़े।
दिल्ली की भीड़ पीछे छूटती गई और ऋषिकेश की ओर बढ़ते हुए मन में केवल एक ही भाव था—यात्रा समाप्त नहीं हुई है, केवल एक अध्याय पूरा हुआ है।
क्योंकि जीवन की असली सुंदरता शायद इसी में है कि हम एक यात्रा से लौटते हैं तो अगली यात्रा का सपना हमारे भीतर जन्म ले चुका होता है।
कू ची ने इतिहास की कठिनाइयां दिखाईं।
फु क्वोक ने समुद्र की विशालता दिखाई।
साओ बीच ने प्रकृति का सौंदर्य दिखाया।
हॉन थॉम ने रोमांच दिया।
होई आन ने संस्कृति की खुशबू दी।
बास्केट बोट ने बचपन लौटा दिया।
बा ना हिल्स ने बादलों तक पहुंचाया।
गोल्डन ब्रिज ने मानव कल्पना की शक्ति दिखाई।
विशाल बुद्ध प्रतिमा ने मन में शांति जगाई।
फ्रेंच विलेज ने स्थापत्य की विविधता दिखाई।
दा नांग ने समुद्र, नदी और शहर का संगम दिखाया।
हालोंग बे ने प्रकृति की करोड़ों वर्ष पुरानी रचना के सामने हमें छोटा होने का एहसास कराया।
और हनोई ने इतिहास, शिक्षा और संस्कृति से परिचित कराया।
लेकिन इन सबके ऊपर इस यात्रा ने एक और चीज दी—साथ चलने का आनंद।
28 लोग थे, अलग-अलग शहरों और अलग-अलग जीवन से आए थे, लेकिन नौ दिनों के सफर ने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया।
यही यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
स्थान पीछे छूट जाते हैं, होटल पीछे छूट जाते हैं, बसें और विमान पीछे छूट जाते हैं, बाजार और सड़कें पीछे छूट जाती हैं, लेकिन जो स्मृतियां मन में बस जाती हैं, वे जीवनभर साथ चलती हैं।
इसलिए जिंदगी को रोकिए मत।
सपना देखिए।
सपने को पूरा करने का प्रयास कीजिए।
घर से बाहर निकलिए।
दुनिया देखिए।
प्रकृति को महसूस कीजिए।
लोगों से मिलिए।
नई संस्कृति समझिए।
और हर यात्रा से अपने भीतर कुछ नया लेकर लौटिए।
क्योंकि जीवन सचमुच एक उत्सव है।
जीवन होली है—इसे रंगों से भरिए।
जीवन दीपावली है—इसे रोशनी से भरिए।
जीवन एक यात्रा है—इसे चलते हुए पूरा कीजिए।
और जब तक सांस है, मन में नए सपने सजाते रहिए।
चरैवेति… चरैवेति…
चलते रहिए।
देखते रहिए।
सीखते रहिए।
मुस्कुराते रहिए।
और जिंदगी को हर दिन एक नया उत्सव बनाते रहिए।
-जयकुमार तिवारी ऋषिकेश उत्तराखंड
मो-9411361877







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