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वियतनाम यात्रा-वृत्तांत : जीवन एक उत्सव है, चलते रहिए और दुनिया को महसूस करते रहिए!

देव भूमि जे के न्यूज (जय कुमार तिवारी) मित्रों! जीवन एक उत्सव है। जीवन एक बार मिला है। जीवन होली है, जीवन रोज दीपावली है। जीवन अपने आप…

वियतनाम यात्रा-वृत्तांत : जीवन एक उत्सव है, चलते रहिए और दुनिया को महसूस करते रहिए!


देव भूमि जे के न्यूज (जय कुमार तिवारी)
वियतनाम यात्रा-वृत्तांत : जीवन एक उत्सव है, चलते रहिए और दुनिया को महसूस करते रहिए!

मित्रों! जीवन एक उत्सव है। जीवन एक बार मिला है। जीवन होली है, जीवन रोज दीपावली है। जीवन अपने आप में एक दिव्य और भव्य आयोजन है। इसलिए जीवन में उन सभी रंगों का समावेश होना चाहिए, जो हमें भीतर से प्रसन्न करते हैं। खुशी कोई ऐसी चीज नहीं है, जो बाजार में जाकर खरीदी जा सके। खुशी तो हमारे अपने अंतर्मन में बैठी हुई है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उसे पहचानें, उसे बाहर निकालें और अपने जीवन को उत्सव बना दें।

जिंदगी को रोज होली बनाइए, रोज दीपावली बनाइए। अपने सपनों को सतरंगी रंगों से सजाइए और फिर उन्हीं रंगों में स्वयं भी रंग जाइए। यही जीवन का फलसफा है और यही जीवन जीने का एक सुंदर सूत्र भी है।

जीवन के इस उत्सव को आनंद के साथ जीने के लिए हमें उस अमर वाक्य का अनुसरण करना चाहिए—“चरैवेति, चरैवेति।” अर्थात चलते रहो, आगे बढ़ते रहो। एक जगह बैठे रहना जीवन नहीं है। जीवन स्वयं एक यात्रा है और इस यात्रा को चलते-चलते ही पूरा करना चाहिए।

इस धरती पर परमात्मा ने कितनी अद्भुत चित्रकारी कर रखी है। कहीं ऊंचे-ऊंचे पहाड़ हैं, कहीं कल-कल करती नदियां हैं, कहीं अथाह समुद्र है, कहीं घने जंगल हैं, कहीं पशु-पक्षियों का संसार है और कहीं मनुष्य ने हजारों वर्षों में अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं से ऐसे रंग भर दिए हैं कि पृथ्वी का प्रत्येक कोना अपने आप में एक कहानी बन गया है।

हमें उस कहानी को पढ़ना है। घर से निकलना है, मोहल्ले में घूमना है, मोहल्ले से गांव, गांव से कस्बे, कस्बे से शहर, शहर से महानगर, महानगर से देश और देश से विदेश तक जाना है। प्रकृति की इस चित्रकारी को देखना है, समझना है, महसूस करना है और अपने भीतर उतारना है।

ऐसा नहीं है कि हम घूम-फिर नहीं सकते। पहले मन में सपना पैदा होना चाहिए। सपना देखिए। सपने को मन में सजाइए। परमात्मा जब मन में कोई सपना पैदा करते हैं तो उसे पूरा करने का अवसर भी किसी न किसी रूप में सामने आता है।

मैं भी ऐसे ही सपने संजोता रहता हूं। जब कभी उन सपनों को साकार करने का अवसर आता है तो निकल पड़ता हूं—देश और विदेश की अनदेखी जगहों को देखने। हर यात्रा के बाद मेरा विश्वास और मजबूत होता है कि प्रकृति ने हमारे लिए इस धरती पर कितना अनमोल खजाना रख छोड़ा है। हमारे आने से बहुत पहले ही परमात्मा ने देखने, सुनने, चखने, पीने, महसूस करने और स्पर्श करने के लिए असंख्य अनुभव इस धरती पर सजा दिए हैं। हमें बस घर से बाहर निकलकर उन्हें महसूस करना है।

वियतनाम की मेरी यह यात्रा भी इसी सोच की एक कड़ी थी।

दरअसल इस यात्रा का पहला सपना 26 जून 2026 को पूरा होना था। मन में विचार था कि वियतनाम की यात्रा के दौरान 28 जून को अपनी शादी की सालगिरह भी वहीं मनाऊंगा। तैयारियां थीं, उत्साह था और मन में विदेश यात्रा के अनेक सपने सज चुके थे। लेकिन ऐन समय पर जयपुर की एक यात्रा कंपनी ने यात्रा स्थगित कर दी। बताया गया कि यात्रा बाद में आयोजित की जाएगी। बार-बार अनुरोध करने के बावजूद जब यात्रा आगे नहीं बढ़ी तो मन को निराशा हुई, लेकिन मैंने यात्रा का सपना छोड़ा नहीं।

इसी बीच ऋषिकेश रेलवे रोड स्थित सूरी इंटरप्राइजेज के संस्थापक सुरेश सूरी जी ने सलाह दी कि पुराने रेलवे स्टेशन के पास स्थित श्री शिव शंकर यात्रा कंपनी से संपर्क किया जाए। उन्होंने बताया कि यात्रा कंपनी के संचालक देवव्रत अग्रवाल को यात्राओं के संचालन का वर्षों का अनुभव है। मैंने उनसे संपर्क किया। उन्होंने बताया कि 18 सितंबर 2026 को वियतनाम की यात्रा आयोजित की जा रही है। बस, फिर क्या था। एक बार टूट चुका सपना फिर से जुड़ गया। मैंने और मेरी पत्नी रंजू तिवारी ने यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।

18 सितंबर : ऋषिकेश से वियतनाम की ओर

18 सितंबर की सुबह लगभग चार बजे ऋषिकेश से दिल्ली एयरपोर्ट के लिए कार में बैठे तो अभी आसमान में पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ था। ऋषिकेश पीछे छूट रहा था और मन में वियतनाम की तस्वीरें बनने लगी थीं। दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर यात्रा दल के बाकी साथी भी धीरे-धीरे एकत्रित होने लगे।

हमारी टीम में कुल 28 यात्री थे—राजेश्वरी, विजय कुमार मित्तल, गौरी शंकर गुप्ता, संगीता गुप्ता, अमर सिंह राजपुरोहित, अशोक कुमार घई, सुमन घई, अथर्व अग्रवाल, शिल्पा अग्रवाल, ओम प्रकाश बंसल, शशि बंसल, सागर बंसल, शिखा बांगा, अंजू अग्रवाल, धर्मेंद्र अग्रवाल, बीना अग्रवाल, सपना गोयल, अनिल कुमार गोयल, जसवंत सिंह कैन, कमलेश कैन, युवान सिंह कैन, प्रतिमा जोशी, अंशु जोशी, रचना कुमारी, मैं स्वयं जयकुमार तिवारी, पत्नी रंजू तिवारी, प्रदीप कुमार शर्मा और रेखा शर्मा।

इनमें कई लोग आपस में पहले से परिचित थे और कई पहली बार मिले थे। लेकिन यात्रा की खूबसूरती यही होती है कि सफर शुरू होते ही अपरिचित चेहरे धीरे-धीरे परिचित होने लगते हैं और कुछ ही दिनों में वही लोग अपने जैसे लगने लगते हैं।

लगभग दोपहर एक बजे हम एयर इंडिया के विमान में सवार हुए। दिल्ली की धरती धीरे-धीरे नीचे छूटती गई और हम बादलों के ऊपर पहुंच गए। कुछ घंटों बाद वियतनाम की धरती दिखाई देने लगी। वहां पहुंचने के बाद हमारी यात्रा का पहला पड़ाव हो ची मिन्ह सिटी था, जिसे कभी साइगॉन के नाम से जाना जाता था।

एयरपोर्ट से बाहर निकले तो हमारी यात्रा कंपनी की ओर से एक वोल्वो बस तैयार थी। 28 लोगों का पूरा दल बस में सवार हुआ और वियतनाम की धरती पर हमारा पहला सामूहिक सफर शुरू हुआ। रास्ते में रोशनी से जगमगाता शहर दिखाई दे रहा था।

रात में हम बनारस होटल/रेस्टोरेंट पहुंचे। विदेश की धरती पर भारतीय भोजन की खुशबू ने थकान काफी कम कर दी। भोजन किया और फिर होटल जाकर विश्राम किया। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन अगले दिन के कार्यक्रम को लेकर उत्साहित था।

19 सितंबर : कू ची सुरंगों से हो ची मिन्ह सिटी तक

19 सितंबर की सुबह लगभग आठ बजे होटल में नाश्ता किया। नाश्ते के बाद करीब साढ़े आठ बजे हम कू ची सुरंगों की ओर रवाना हुए। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। ऊंची इमारतों की जगह हरियाली, छोटे घर और ग्रामीण वियतनाम के दृश्य सामने आने लगे।

लगभग साढ़े दस बजे हम कू ची सुरंगों पहुंचे।

कू ची को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में देखना उसके महत्व को छोटा कर देना होगा। यह वियतनाम के युद्ध इतिहास की एक जीवित स्मृति है। जमीन के नीचे बनाई गई सुरंगों का विशाल नेटवर्क युद्ध के कठिन समय में रहने, आने-जाने, छिपने, संचार और विभिन्न आवश्यकताओं के लिए इस्तेमाल किया गया था।

बाहर से देखने पर घनी हरियाली और सामान्य जमीन दिखाई देती है, लेकिन उसी जमीन के नीचे एक पूरा भूमिगत संसार मौजूद था। हम सुरंगों के संकरे रास्तों से गुजरे। कहीं छोटे-छोटे कमरे थे, कहीं भूमिगत रास्ते और कहीं ऐसी व्यवस्थाएं दिखाई दीं, जिनसे अंदाजा होता था कि कठिन परिस्थितियों में लोगों ने किस तरह जीवन को व्यवस्थित किया होगा।

कुछ जगहों पर सुरंग इतनी संकरी थीं कि उनमें प्रवेश करते समय अपने शरीर को सिकोड़ना पड़ता था। बताया गया कि विपरीत परिस्थितियों में सीमित संसाधनों और साधारण औजारों की मदद से इन सुरंगों का निर्माण किया गया था। सुरंगों के भीतर घायल सैनिकों की देखभाल और इलाज की व्यवस्था के साथ-साथ भोजन बनाने तथा सैनिकों की वर्दी सिलने जैसी व्यवस्थाएं भी थीं।

कू ची की सबसे बड़ी सीख यही लगी कि इतिहास केवल किताब के पन्नों पर नहीं रहता। कभी-कभी इतिहास जमीन के नीचे भी सांस लेता है। वहां खड़े होकर युद्ध की कठिनाइयों और उस समय के लोगों के जीवन की कल्पना करना मन को भीतर तक छू गया।

वियतनाम युद्ध लगभग दो दशकों तक चला। इसमें उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम का तथा सोवियत संघ और चीन ने उत्तर वियतनाम का समर्थन किया। 1975 में साइगॉन के पतन के साथ युद्ध समाप्त हुआ और बाद में वियतनाम एकीकृत देश बना।

कू ची का भ्रमण पूरा करने के बाद लगभग एक बजे हम हल्दी रेस्टोरेंट पहुंचे। सुबह से लगातार घूमने के बाद भोजन सभी के लिए जरूरी था। भोजन की मेज पर चर्चा भी कू ची की सुरंगों को लेकर ही होती रही। किसी को सुरंगों की बनावट आश्चर्यचकित कर रही थी तो किसी को युद्धकालीन जीवन की कल्पना भीतर तक प्रभावित कर रही थी।

भोजन के बाद करीब साढ़े तीन बजे हम वापस हो ची मिन्ह सिटी पहुंचे। कुछ ही घंटों में दृश्य फिर बदल गया। जिस सुबह हम इतिहास के भीतर उतर गए थे, अब हम एक आधुनिक महानगर के बीच थे।

शाम लगभग साढ़े छह बजे हम वॉकिंग स्ट्रीट पहुंचे। सड़क रोशनी से जगमगा रही थी। दुकानों, खान-पान के स्थानों, कैफे और पर्यटकों की भीड़ के बीच शहर का आधुनिक चेहरा सामने था। कू ची की गंभीरता और वॉकिंग स्ट्रीट की चहल-पहल—एक ही दिन में वियतनाम के दो बिल्कुल अलग रूप हमारे सामने थे।

रात आठ बजे बनारस रेस्टोरेंट में भोजन किया। यहां हमें ऋषिकेश, गुमानीवाला, खदरी के दो लोग भी मिले। विदेश की धरती पर अपने शहर के लोगों से मुलाकात हुई तो दोनों पक्षों को अपार प्रसन्नता हुई। दिनभर की थकान के बावजूद सभी के चेहरे पर संतोष था। लगभग नौ बजे होटल लौट आए।

20 सितंबर : हो ची मिन्ह सिटी से फु क्वोक

20 सितंबर को यात्रा ने अपना रुख समुद्र की ओर कर लिया। नाश्ते के बाद हम एयरपोर्ट पहुंचे और हो ची मिन्ह सिटी से फु क्वोक के लिए विमान में सवार हुए। लगभग 10:35 बजे उड़ान रवाना हुई और करीब 11:35 बजे हम फु क्वोक पहुंचे।

फु क्वोक वियतनाम के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक द्वीप है और अपने समुद्र तटों, नीले पानी, हरियाली तथा पर्यटन गतिविधियों के लिए जाना जाता है। हो ची मिन्ह सिटी की भीड़ से निकलकर जब हम यहां पहुंचे तो वातावरण बिल्कुल बदल चुका था। सामने समुद्र था, हवा में नमी और आसपास हरियाली।

होटल पहुंचकर चेक-इन किया गया। भोजन किया और कुछ समय विश्राम के बाद आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण किया। यात्रा अब इतिहास से निकलकर प्रकृति और समुद्र के रंग में प्रवेश कर चुकी थी।

21 सितंबर : समुद्र के ऊपर केबल कार और हॉन थॉम का रोमांच

21 सितंबर को फु क्वोक में हमारी यात्रा का रोमांचक हिस्सा सामने आया। सुबह नाश्ते के बाद हम साओ बीच पहुंचे। सफेद रेत और नीले समुद्र का दृश्य ऐसा था जैसे किसी चित्रकार ने समुद्र के किनारे सफेद रंग की चादर बिछा दी हो।

इसके बाद हम हॉन थॉम की ओर बढ़े। वहां समुद्र के ऊपर चलने वाली केबल कार में बैठने का अवसर मिला। जैसे ही केबल कार ने जमीन से ऊपर उठकर समुद्र की ओर अपना सफर शुरू किया, रोमांच और उत्सुकता दोनों बढ़ने लगीं।

ऊंचाई से नीचे देखने पर चारों ओर फैला नीला समुद्र, समुद्र में बिखरे छोटे-छोटे द्वीप, चलती हुई नावें और दूर तक दिखाई देता क्षितिज मन को मोह लेने वाला दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी चित्र में प्रवेश कर गए हों।

हॉन थॉम पहुंचने के बाद हमने वहां के मनोरंजन और प्राकृतिक वातावरण का आनंद लिया। आसमानी झूले जैसी रोमांचक सवारी पर बैठकर आसपास के समुद्री क्षेत्र और प्राकृतिक दृश्यों को ऊपर से देखने का अवसर मिला। ऊंचाई से समुद्र और आसपास का क्षेत्र देखने पर पूरा दृश्य और भी आकर्षक नजर आया।

इसके बाद सामूहिक रूप से दोपहर के भोजन की व्यवस्था की गई। जिस स्थान पर भोजन कराया गया, वहां हजारों लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। भोजन की विशाल और विविध व्यवस्था देखकर हम सभी प्रभावित हुए। शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों प्रकार के वियतनामी सहित अनेक व्यंजन उपलब्ध थे। वहां बुफे व्यवस्था थी और प्रत्येक व्यंजन के नीचे वियतनामी भाषा में उसका नाम लिखा था। सभी लोगों ने अपनी पसंद और खान-पान के अनुसार भोजन किया।

भोजन के बाद हमारी वापसी यात्रा तेज स्टीमर से हुई। समुद्र को चीरता हुआ स्टीमर आगे बढ़ रहा था और चारों ओर समुद्र का विस्तार दिखाई दे रहा था। रास्ते में आसपास के द्वीपों के समुद्री दृश्य देखने का अवसर मिला। कभी लहरें तेज होतीं तो कभी समुद्र शांत दिखाई देता। समुद्र के बीच से गुजरते हुए द्वीपों को देखना अपने आप में रोमांचकारी अनुभव था।

यात्रा के दौरान हमें समुद्री जीवन और समुद्र के भीतर रहने वाले जीवों के बारे में भी जानकारी दी गई। समुद्र के अंदर पाए जाने वाले जीवों और उनके प्राकृतिक निवास से संबंधित वीडियो दिखाए गए। इससे यह समझने का अवसर मिला कि समुद्र की सतह के नीचे भी एक विशाल और अद्भुत दुनिया मौजूद है, जो सामान्य रूप से हमारी आंखों से दिखाई नहीं देती।

कुछ पर्यटकों के लिए समुद्र के नीचे जाकर समुद्री जीवन को करीब से देखने और उसके साथ तस्वीरें खिंचवाने की सुविधा भी थी। वहां फोटोग्राफर भी मौजूद थे। हालांकि हमारे समूह में से कोई भी साथी समुद्र के नीचे जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसलिए हमने वहां दिखाई गई वीडियो के माध्यम से ही समुद्री जीवन को देखा।

तेज स्टीमर से यात्रा करते हुए आखिरकार हम उस स्थान पर पहुंच गए, जहां हमारी बस खड़ी थी। सभी यात्री क्रम से बस में सवार हुए और दिनभर की रोमांचक यात्रा की यादों को अपने साथ लेकर वापस लौट चले।

शाम को किस ब्रिज क्षेत्र पहुंचे। समुद्र और आधुनिक स्थापत्य का सुंदर मेल वहां दिखाई देता है। इसके बाद नाइट मार्केट गए। रंगीन रोशनी, दुकानें, स्थानीय सामान और खान-पान की खुशबू ने शाम को और रंगीन बना दिया। रात में होटल लौटकर भोजन और विश्राम किया।

21 सितंबर का यह दिन हमारे लिए केवल फु क्वोक की यात्रा नहीं, बल्कि समुद्र के ऊपर, समुद्र के बीच और समुद्र के भीतर बसे जीवन को महसूस करने वाली एक यादगार यात्रा बन गया।

22 सितंबर : फु क्वोक से दा नांग और होई आन तक

22 सितंबर को सुबह करीब 6:30 बजे होटल से फु क्वोक एयरपोर्ट के लिए प्रस्थान किया गया। इसके बाद Vietjet Air की उड़ान से फु क्वोक से दा नांग की यात्रा पूरी हुई। लगभग 9:35 बजे उड़ान भरने के बाद करीब 11:20 बजे हम दा नांग पहुंचे।

दा नांग मध्य वियतनाम का महत्वपूर्ण शहर है। एक तरफ समुद्र, दूसरी तरफ पहाड़ और बीच में आधुनिक शहर—इस भौगोलिक स्थिति ने इसे पर्यटन के लिए विशेष बना दिया है। यहां पहुंचकर हम Mường Thanh Luxury Song Han Hotel पहुंचे। होटल में चेक-इन के बाद भोजन और विश्राम किया।

होटल में मिलने वाला भोजन भी अपने आप में वियतनामी भोजन संस्कृति से परिचय कराने वाला था। चावल से बने अलग-अलग व्यंजन, सब्जियां, सूप, स्टिर-फ्राइड सब्जियां, स्टिकी राइस और मांसाहारी व्यंजन स्थानीय खान-पान की विविधता दिखा रहे थे।

मैं खाने के लिए लगे व्यंजनों पर लगे स्टीकरों को गूगल पर खोजकर लगातार देख रहा था कि कहीं यह मांसाहारी तो नहीं है और तभी उस व्यंजन को चख रहा था। होटल में बीफ को भी बड़े सुंदर ढंग से सजाकर रखा गया था, जिससे पहली नजर में पहचानना आसान नहीं था कि कौन-सा व्यंजन शाकाहारी है और कौन-सा मांसाहारी। नीचे लगे वियतनामी भाषा के टैग का अनुवाद कर मैं समझ पा रहा था कि व्यंजन शाकाहारी है या मांसाहारी। भारत से आए हमारे दल के लिए यह स्वाद की एक नई दुनिया थी।

दोपहर के भोजन के बाद हम कोकोनट फॉरेस्ट की ओर रवाना हुए। यहां नारियल के घने पेड़ों से घिरा प्राकृतिक वातावरण और जलमार्गों की सुंदरता आकर्षण का केंद्र रही। पारंपरिक गोलाकार बास्केट बोट की सवारी ने इस पड़ाव को और यादगार बना दिया।

गोलाकार नाव में बैठकर पानी के बीच नारियल के पेड़ों के बीच घूमना बहुत मजेदार रहा। हमारे दल के कई लोग इस अनुभव को लेकर विशेष रूप से उत्साहित थे। सभी लोग गोलाकार नाव में घूमते हुए हिंदी गानों का आनंद ले रहे थे और अपनी तस्वीरें मोबाइल में कैद कर रहे थे।

वहां एक फोटोग्राफर भी था, जो विभिन्न गतिविधियों की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कर रहा था और जिन्हें तस्वीर चाहिए होती, उन्हें बनाकर दे देता था। गोल नाव चलाने वाली अधिकांश महिलाएं थीं, जिनका रवैया बहुत सकारात्मक और हंसमुख था। वे गोलाकार नाव चलाते हुए हाव-भाव और मुस्कान से सभी का मनोरंजन कर रही थीं। हिंदी फिल्मों के गानों के साथ गोल नाव में घूमने और चारों ओर नारियल के पेड़ देखने का अनुभव बेजोड़ रहा। लगभग दो घंटे तक बास्केट बोट में घूमने के बाद हमारी वापसी हुई।

इसके बाद शाम करीब चार बजे हम होई आन पहुंचे। सूर्यास्त के साथ ही ऐतिहासिक शहर का रूप पूरी तरह बदल गया। पुरानी गलियों, पारंपरिक इमारतों और रंग-बिरंगी लालटेनों से सजा होई आन रात में किसी रोशन तस्वीर की तरह नजर आया।

होई आन दा नांग से अलग एक दूसरी ही दुनिया जैसा लगा। यह प्राचीन नगर सदियों से व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। कभी यहां समुद्री व्यापार के कारण अलग-अलग देशों के व्यापारी आते थे। इसी वजह से इसकी वास्तुकला और संस्कृति में वियतनामी परंपरा के साथ बाहरी संस्कृतियों का प्रभाव भी दिखाई देता है।

पुरानी पीली इमारतें, लकड़ी के घर, संकरी गलियां और रंग-बिरंगी लालटेनें होई आन को विशिष्ट बनाती हैं। गलियों में घूमते हुए स्थानीय बाजार, पारंपरिक संस्कृति और नदी किनारे का मनमोहक वातावरण देखने को मिला। लालटेन से सजी गलियों और रोशनी के बीच की गई सैर ने दिनभर की थकान को भी भुला दिया।

भोजन के बाद हम दा नांग लौटे और होटल में विश्राम किया। समुद्र, प्रकृति, परंपरा और रोशनी से भरा यह दिन वियतनाम यात्रा की खास यादों में शामिल हो गया।

23 सितंबर : बादलों के बीच बा ना हिल्स और गोल्डन ब्रिज

23 सितंबर हमारी यात्रा का एक और यादगार दिन था। सुबह नाश्ते के बाद हम बा ना हिल्स की ओर रवाना हुए।

बा ना हिल्स दा नांग के पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र में स्थित पर्यटन स्थल है। समुद्र तट से अचानक ऊंचे पहाड़ों की ओर बढ़ते हुए मौसम और वातावरण दोनों बदलने लगते हैं। जैसे-जैसे वाहन ऊपर चढ़ता गया, नीचे शहर और आसपास की धरती छोटी होती गई और सामने बादल, पहाड़ तथा हरियाली दिखाई देने लगी।

इसके बाद केबल कार की यात्रा शुरू हुई। पहाड़ों और जंगलों के ऊपर से गुजरती केबल कार में बैठना रोमांचकारी था। नीचे घने जंगल और दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दे रहे थे।

ऊपर पहुंचकर सबसे प्रसिद्ध आकर्षण गोल्डन ब्रिज हमारा इंतजार कर रहा था। विशाल पत्थर जैसे हाथों के आकार के सहारों पर बना यह पुल पहाड़ और बादलों के बीच बेहद आकर्षक दिखाई देता है। 28 यात्रियों के हमारे दल ने यहां जमकर तस्वीरें खिंचवाईं।

इसके बाद पहाड़ पर स्थित विशाल बुद्ध प्रतिमा के दर्शन किए। चारों तरफ पहाड़ी शांति, हरियाली और ऊंचाई पर स्थित विशाल प्रतिमा का दृश्य मन में अलग तरह की शांति पैदा कर रहा था।

उस पहाड़ी पर स्वर्ग जैसा दृश्य दिखाई दे रहा था। जगह-जगह बने पार्क और उनमें लगे फूल मनमोहक लग रहे थे। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और चारों तरफ बादल छाए हुए थे। बादलों के बीच घूमना अपने आप में रोमांच पैदा कर रहा था। पूरे पहाड़ पर रंग-बिरंगे फूल, पार्क और विभिन्न कलाकृतियां करीने से सजी हुई थीं।

इसके बाद फ्रेंच विलेज पहुंचे। यूरोपीय शैली की इमारतें, सड़कें और पहाड़ी वातावरण देखकर ऐसा लगा जैसे वियतनाम के भीतर अचानक यूरोप का कोई छोटा-सा नगर सामने आ गया हो।

उसी जगह पर हमने बीयर बनाने की प्रक्रिया से संबंधित परिसर भी देखा। एक टिकट पर आलू से बने फ्रेंच फ्राइज अथवा बीयर उपलब्ध कराई जा रही थी। बहुत बड़े हॉल में लोग बैठकर ताजा बीयर का आनंद ले रहे थे।

फिर आया मनोरंजन का समय। फैंटेसी पार्क में झूलों और विभिन्न मनोरंजन गतिविधियों का आनंद लिया। कुछ क्षणों के लिए यह भूल गए कि हम सब अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से कितनी दूर आ चुके हैं। वहां हर व्यक्ति के चेहरे पर वही खुशी थी, जो बचपन में किसी मेले के झूले पर बैठते समय होती थी।

इसके बाद हम केबल कार से वापस आए। नीचे एक छोटा-सा बाजार बना हुआ था, जहां कुछ लोगों ने खरीदारी की। फिर बस में सवार होकर शाम को दा नांग वापस लौटे। होटल में भोजन किया और विश्राम किया।

24 सितंबर : दा नांग से हनोई की ओर

24 सितंबर को दा नांग के कुछ प्रमुख क्षेत्रों का भ्रमण किया गया। माई खे बीच, हान नदी और ड्रैगन ब्रिज जैसे स्थानों ने शहर की भौगोलिक और आधुनिक पहचान को सामने रखा। दा नांग की खासियत यही है कि यहां समुद्र, नदी, पहाड़ और आधुनिक शहरी जीवन एक-दूसरे के बहुत करीब दिखाई देते हैं।

हमारे 28 यात्रियों में से 11 यात्रियों की वापसी थी। आगे की यात्रा के लिए 17 यात्री तैयार हुए। शाम लगभग 7:25 बजे दा नांग से हनोई के लिए उड़ान भरी और करीब 8:50 बजे हनोई पहुंचे।

हनोई वियतनाम की राजधानी है और इसका इतिहास लगभग एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह शहर वियतनाम के राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। होटल पहुंचकर भोजन किया और विश्राम किया।

25 सितंबर : हालोंग बे की समुद्री यात्रा

25 सितंबर की सुबह नाश्ते के बाद हम हालोंग बे के लिए रवाना हुए। जैसे-जैसे बस हनोई से दूर जाती गई, शहर की भीड़ पीछे छूटती गई। ग्रामीण क्षेत्र, खेत और छोटे कस्बे दिखाई देते रहे। फिर अचानक समुद्र का विस्तार सामने आया।

हालोंग बे का दृश्य देखकर कुछ क्षण के लिए सभी की निगाहें ठहर गईं। समुद्र के नीले पानी के बीच सैकड़ों चूना-पत्थर की ऊंची-ऊंची प्राकृतिक संरचनाएं खड़ी हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार ने समुद्र के विशाल कैनवास पर एक-एक करके पहाड़ों की आकृतियां बना दी हों।

इन चट्टानी द्वीपों का निर्माण करोड़ों वर्षों में प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाओं से हुआ है। समुद्र और चूना-पत्थर के लंबे समय तक चले क्षरण ने इन्हें ऐसी आकृतियां दी हैं, जो दूर से किसी मूर्ति जैसी दिखाई देती हैं।

तीन मंजिला क्रूज पर सवार होकर हमारी टीम समुद्र के बीच निकली। चारों ओर पानी, ऊपर खुला आकाश और बीच-बीच में विशाल चट्टानी द्वीप—यह दृश्य लंबे समय तक आंखों में बसा रहने वाला था।

क्रूज में चारों तरफ कुर्सियां लगी हुई थीं और बीच में हमारे सभी लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था थी। भोजन में विभिन्न प्रकार के शाकाहारी, मांसाहारी और वियतनामी व्यंजन थे। व्यंजन पहले से टेबलों पर सजाए गए थे। जिसे जो पसंद आया, सभी ने अपनी भूख और पसंद के अनुसार भोजन का आनंद लिया।

इसके बाद हम क्रूज की छत पर पहुंचे। शाम का लुभावना मौसम और डूबते हुए सूर्य का दृश्य देखने का अपना अलग ही रोमांच था। हमारे साथियों ने वहां हिंदी गानों पर ठुमके लगाए, तस्वीरें खिंचवाईं और इस यादगार पल को अपने कैमरों में कैद किया।

समुद्र के बीच अपने 17 साथियों के साथ भोजन करना यात्रा की आत्मीय स्मृतियों में शामिल हो गया। दिनभर प्रकृति को देखने के बाद हम शाम को हनोई लौटे।

26 सितंबर : हनोई का इतिहास, संस्कृति और ट्रेन स्ट्रीट

26 सितंबर यात्रा का अंतिम दिन था।

सुबह नाश्ते के बाद हनोई के प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण किया। सबसे पहले हो ची मिन्ह परिसर और उसके आसपास के महत्वपूर्ण स्थलों को देखा। इसके बाद वन पिलर पगोडा और प्रेसिडेंशियल पैलेस क्षेत्र का भ्रमण किया।

हनोई में साहित्य मंदिर का अनुभव भी महत्वपूर्ण रहा। यह वियतनाम की प्राचीन शिक्षा और विद्या परंपरा से जुड़ा स्थल है। यहां पहुंचकर यह महसूस हुआ कि किसी देश को केवल उसकी सड़कें, बाजार और पर्यटन स्थल देखकर नहीं समझा जा सकता। उसकी शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और इतिहास को समझना भी उतना ही जरूरी है।

इसके बाद पुराने शहर और बाजारों में घूमे। स्थानीय वस्तुओं, स्मृति-चिह्नों, कपड़ों और वियतनामी कॉफी की खरीदारी की। सभी मित्रों ने यहां जमकर खरीदारी की। अपने प्रियजनों के लिए जिसको जो पसंद आया, खरीदा और पैकिंग कराकर अपने-अपने सामान के साथ रख लिया।

इसके बाद हम हनोई की ट्रेन स्ट्रीट के आसपास का जीवन देखने के लिए निकल पड़े।

हनोई की ट्रेन स्ट्रीट का अनुभव अपने आप में एक अलग रोमांच समेटे हुए है। शहर की संकरी गलियों के बीच बिछी रेलवे पटरी और उसके दोनों ओर बेहद करीब बने छोटे-छोटे कैफे इस स्थान को अनोखी पहचान देते हैं।

पटरी के किनारे बने कैफे में लोग कॉफी, चाय, ठंडे पेय और नाश्ते का आनंद लेते दिखाई देते हैं। जैसे ही ट्रेन के आने का समय होता है, कैफे संचालक लोगों को सुरक्षित दूरी पर रहने के लिए कहते हैं और दुकानों का सामान भी पटरी से पीछे कर दिया जाता है।

इसके बाद दूर से ट्रेन की आवाज सुनाई देती है। धीरे-धीरे बढ़ती हुई ट्रेन जब बेहद करीब से गुजरती है तो उसके पहियों की आवाज, इंजन की गड़गड़ाहट और यात्रियों की उत्सुकता मिलकर रोमांच पैदा कर देती है। कुछ ही क्षणों में ट्रेन सामने से गुजरती हुई आगे निकल जाती है और फिर वही संकरी गली सामान्य जीवन में लौट आती है।

हनोई की इस ट्रेन स्ट्रीट में सबसे खास बात यह है कि यहां रेलवे और रोजमर्रा की जिंदगी एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई देते हैं। कहीं लोग कॉफी की चुस्की लेते नजर आते हैं, कहीं नाश्ता करते हुए बातचीत करते हैं और कहीं पर्यटक ट्रेन के गुजरने के रोमांच को अपने कैमरे में कैद करते दिखाई देते हैं।

यह अनुभव केवल ट्रेन देखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हनोई के स्थानीय जीवन, संस्कृति और शहर की अनूठी जीवनशैली को करीब से महसूस करने का अवसर भी देता है।

नौ दिनों की यात्रा ने बना दिया एक परिवार

अब यात्रा का अंतिम समय आ चुका था।

18 सितंबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर जब हम 28 लोग पहली बार मिले थे तो अधिकांश एक-दूसरे के लिए अपरिचित थे। लेकिन नौ दिनों में साथ उड़ते-उड़ते, बस में बैठते-बैठते, एक साथ नाश्ता और भोजन करते, समुद्र देखते, पहाड़ चढ़ते, झूले झूलते, तस्वीरें खिंचवाते और एक-दूसरे का ध्यान रखते-रखते कब यह समूह एक परिवार जैसा हो गया, पता ही नहीं चला।

विदा लेने का समय आया तो सभी ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं। कुछ तस्वीरें आखिरी बार खिंचवाई गईं। हंसी-मजाक के बीच कहीं न कहीं मन में यह भी था कि यह साथ अब रोज नहीं मिलेगा।

वियतनाम से वापसी की उड़ान ने जब इस यात्रा को समाप्ति की ओर पहुंचाया तो मन में पिछले नौ दिनों की पूरी कहानी चलचित्र की तरह घूमने लगी।

18 सितंबर की सुबह चार बजे ऋषिकेश से निकले थे। दिल्ली पहुंचे। 28 साथियों से मिले। दोपहर की उड़ान पकड़ी। हो ची मिन्ह पहुंचे। बनारस में भोजन किया।

19 सितंबर को कू ची की सुरंगों में इतिहास के भीतर उतरे। हल्दी रेस्टोरेंट में भोजन किया। वॉकिंग स्ट्रीट की रोशनी देखी और बनारस रेस्टोरेंट में भोजन किया।

20 सितंबर को समुद्र की ओर उड़ चले। फु क्वोक पहुंचे।

21 सितंबर को साओ बीच देखा। हॉन थॉम की समुद्र के ऊपर चलती केबल कार में बैठे। आसमानी झूले का आनंद लिया। किस ब्रिज और नाइट मार्केट देखा।

22 सितंबर को दा नांग पहुंचे। कोकोनट फॉरेस्ट में बास्केट बोट की सवारी की। होई आन की पुरानी गलियों में घूमे।

23 सितंबर को बा ना हिल्स के बादलों के बीच पहुंचे। गोल्डन ब्रिज देखा। विशाल बुद्ध प्रतिमा के दर्शन किए। फ्रेंच विलेज देखा और झूलों तथा मनोरंजन का आनंद लिया।

24 सितंबर को दा नांग की समुद्र और नदी की सुंदरता देखी। फिर हनोई पहुंचे।

25 सितंबर को हालोंग बे के समुद्र में उतरे। प्रकृति की विराटता को देखा। क्रूज पर भोजन किया और डूबते सूर्य के दृश्य को निहारा।

26 सितंबर को हनोई के इतिहास और संस्कृति को जाना। पुराने बाजारों में घूमे और ट्रेन स्ट्रीट का रोमांच देखा। और फिर विदाई का समय आ गया।

दिल्ली पहुंचकर सभी साथी अपने-अपने गंतव्य की ओर चले गए। मैं और रंजू तिवारी दिल्ली एयरपोर्ट से कार द्वारा ऋषिकेश के लिए निकल पड़े। दिल्ली की भीड़ पीछे छूटती गई और ऋषिकेश की ओर बढ़ते हुए मन में केवल एक ही भाव था—यात्रा समाप्त नहीं हुई है, केवल एक अध्याय पूरा हुआ है।

क्योंकि जीवन की असली सुंदरता शायद इसी में है कि हम एक यात्रा से लौटते हैं तो अगली यात्रा का सपना हमारे भीतर जन्म ले चुका होता है।

कू ची ने इतिहास की कठिनाइयां दिखाईं। फु क्वोक ने समुद्र की विशालता दिखाई। साओ बीच ने प्रकृति का सौंदर्य दिखाया। हॉन थॉम ने रोमांच दिया। होई आन ने संस्कृति की खुशबू दी।

बास्केट बोट ने बचपन लौटा दिया। बा ना हिल्स ने बादलों तक पहुंचाया। गोल्डन ब्रिज ने मानव कल्पना की शक्ति दिखाई। विशाल बुद्ध प्रतिमा ने मन में शांति जगाई। फ्रेंच विलेज ने स्थापत्य की विविधता दिखाई। दा नांग ने समुद्र, नदी और शहर का संगम दिखाया। हालोंग बे ने प्रकृति की करोड़ों वर्ष पुरानी रचना के सामने हमें छोटा होने का एहसास कराया। और हनोई ने इतिहास, शिक्षा और संस्कृति से परिचित कराया।

लेकिन इन सबके ऊपर इस यात्रा ने एक और चीज दी—साथ चलने का आनंद।

28 लोग थे, अलग-अलग शहरों और अलग-अलग जीवन से आए थे, लेकिन नौ दिनों के सफर ने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया। यही यात्रा की सबसे बड़ी स्मृति है।

स्थान पीछे छूट जाते हैं, होटल पीछे छूट जाते हैं, बसें और विमान पीछे छूट जाते हैं, बाजार और सड़कें पीछे छूट जाती हैं, लेकिन जो स्मृतियां मन में बस जाती हैं, वे जीवनभर साथ चलती हैं।

इसलिए जिंदगी को रोकिए मत।

सपना देखिए। सपने को पूरा करने का प्रयास कीजिए। घर से बाहर निकलिए। दुनिया देखिए। प्रकृति को महसूस कीजिए। लोगों से मिलिए। नई संस्कृति समझिए। और हर यात्रा से अपने भीतर कुछ नया लेकर लौटिए।

क्योंकि जीवन सचमुच एक उत्सव है।

जीवन होली है—इसे रंगों से भरिए।
जीवन दीपावली है—इसे रोशनी से भरिए।
जीवन एक यात्रा है—इसे चलते हुए पूरा कीजिए।

और जब तक सांस है, मन में नए सपने सजाते रहिए।

चरैवेति… चरैवेति…

श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा के संस्थापक स्वर्गीय लाला शिवचरण अग्रवाल थे। वर्ष 1967 में स्थापित श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा, ऋषिकेश का कार्यालय 233, बनखंडी, पुराना रेलवे स्टेशन, ऋषिकेश में स्थित है। वर्तमान में देवव्रत अग्रवाल के निर्देशन में देश-विदेश की विभिन्न यात्राओं का आयोजन किया जाता है।

देवव्रत अग्रवाल का अपने सभी यात्रियों के साथ मित्रवत व्यवहार रहता है। यात्रियों के प्रति उनका समर्पण, समरसता और मित्रता का भाव यात्रा को सरल और सुगम बनाने में सहयोग करता है। यह उनके साथ हमारी दूसरी यात्रा थी और हमारा अनुभव बेहद सकारात्मक रहा। आगे भी उनके साथ यात्रा करने के लिए हम उत्सुक रहेंगे। हमारी समस्त शुभकामनाएं श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा, ऋषिकेश के साथ हैं।

चलते रहिए।
देखते रहिए।
सीखते रहिए।
मुस्कुराते रहिए।
और जिंदगी को हर दिन एक नया उत्सव बनाते रहिए।

—जयकुमार तिवारी, ऋषिकेश, देहरादून, उत्तराखंड
मो.: 9411361877

वियतनाम यात्रा-वृत्तांत : जीवन एक उत्सव है, चलते रहिए और दुनिया को महसूस करते रहिए!

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