*आध्यात्मिक जागृति, इन्द्रिय संयम के साथ अंत:करण शुद्धि का महापर्व है नवरात्र – डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय*


देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) –

सनातन धर्म, संस्कृति एवं परम्परा में प्रत्येक दिवस कोई न कोई पर्व त्यौहार एवं उत्सव को मनाने की व्यवस्था है। उसी क्रम में भारतीय नव संवत्सर आध्यात्मिकता से परिपूर्ण ऊर्जा के साथ आरम्भ होता है। संवत्सर का आरम्भ ही शक्ति की अहैतुकी कृपा से होती है। इस अवसर पर एक विशिष्ट मुहूर्त में विशेष अनुष्ठान के साथ हमारा नववर्ष आरम्भ होता है। यह इन्द्रिय संयम, आध्यात्मिक जागृति के साथ अंत:करण शुद्धि का महापर्व होता है जिसे नवरात्र कहते है। नवरात्र पर्व पर प्रकाश डालने से हम पूर्व हम इससे जुड़ी हुई कुछ महत्वपूर्ण विषयों की ओर अपना ध्यान आकर्षित करना चाहते है।

प्रकृति के साथ भारतीय संस्कृति भी बहुत उत्कृष्ट एवं प्राच्यविद्या के साथ जुड़ी एक अनुसंधान की सतत प्रवाह है। नवसंवत्सर का प्रवेश होने वाला है। नूतनता का चतुर्दिक प्रसार दिखाई देता है। रस-राग और सुगंध से भरी हुई प्रकृति में तितलियां, भ्रमर और कोयलें अपने उन्मुक्त उल्लास के द्वारा मानो समृद्धि का संकेत कर रहे हैं। हमारा भारत इस अर्थ में विलक्षण है। यहां वर्ष का नवीकरण मात्र आंकिक गणनाओं के अधीन नहीं, अपितु संपूर्ण पर्यावरण की नवीनता को अंगीकार कर नवसंवत्सर के आगमन का उत्सव मनाता है। जिसमें ऋतुएं बसती हैं, उसे संवत्सर कहते हैं। संवत्सर की प्रथम ऋतु के रूप में वसंत का आगमन होता है। वसंत ऋतु के चैत्र और वैशाख नामक दो महीने हैं, जिन्हें क्रमशः मधुमास और माधवमास कहा जाता है-‘वसंतौ मधुमाधवौ’। यह मधुऋतु है, मधु अर्थात जीवन का सत्व। इसी से जीवन की गति है। इसी मधु की न्यूनता, इसका सूख जाना शिशिर ऋतु के रूप में दिखाई पड़ता है। पत्ते वृक्षों से गिर जाते हैं। वनस्पतियां अपने रस-राग से रहित प्रतीत होने लगती हैं। इन दोनों के बीच ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमंत ऋतु का क्रम रहता है।

इसी वसंत से प्रारंभ होता है हमारा नव संवत्सर। यह कालपुरुष के अनवरत चंक्रमण का ही प्रतिफल है। राजा जनक एवं ऋषि अष्टावक्र के संवाद के क्रम में अष्टावक्र ने कहा है-‘ 24 पर्व, छह नाभि, 12 अंश और 360 दिन वाला संवत्सर रूप कालचक्र आपकी रक्षा करे। यह संवाद संवत्सर में निहित भारतीय ज्ञान परम्परा के कसौटी पर विज्ञान को प्रकट करता है। इस कालचक्र को समझने चलेंगे तो हमें अपने जीवन के गहरे संदेश अनुभव होंगे। नवसंवत्सर अपने आगमन से ही हमारा ध्यान मधु की ओर ले जाता है। सारा जीवन अंतर्निहित मधु का ही विलास है, तो हमारे जीवन का मधु क्या है? जिसे हमें सुदीर्घ जीवन में भोगते और चुकाते जाते हैं। वेद कहते हैं- मधु। भूयासं मधु सदृशः। हम मधु सदृश हो जाएं। यही मधु ‘आनंद’ कहलाता है। इसी से परमात्मा ने सृष्टि को रचा है। इस आनंदतत्व को स्वयं में पहचानने का अवसर है नवसंवत्सर। ग्रीष्म, वर्षा और शरद जीवन की ऋतु बनकर बीत जाते हैं। नवसंवत्सर का स्वागत करते हुए हम अपने आनंदतत्व को पहचानने का यत्न करें। अपना मधु खोजने में लगें। नवसंवत्सर अपनी नवीनता को प्रकृति के माध्यम से व्यक्त करता है। हम भी अपनी प्रकृति में जीने का अभ्यास करें। मधु का अनुसंधान करते हुए हम अपने भीतर सूख रहे रस-रुचि-राग को जगाने का संकल्प ले सकें तो संवत्सर की नवीनता हमारे जीवन में भी खिल सकेगी। अब हम नवरात्र के विषय में विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं।
भारतीय संस्कृति में नवरात्र का अपना विशेष महत्व है। ‘नवरात्र’ शब्द से नव अहोरात्रों अर्थात् विशेष रात्रियों का बोध होता है। इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना की जाती है। ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक है। हमारे ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व बताया है इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परम्परा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को ‘रात्रि’ न कहकर ‘दिन’ ही कहा जाता लेकिन नवरात्र के दिन, ‘नवदिन’ नहीं कहे जाते।

संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘नवरात्रि’ कहना त्रुटिपूर्ण है। नव रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण यह द्वंद समास है और यह शब्द पुल्लिंग रूप ‘नवरात्र’ में ही शुद्ध है। नवरात्र क्या है? यदि इस विषय पर बात करे तो इसके बहुत से पर्याय मिलते है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक वर्ष की चार संधियां हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में वर्ष के 2 मुख्य नवरात्र पड़ते हैं जिसे समाज के प्रत्येक वर्ग भक्ति भाव से करता है। इन दिनों में स्वाभाविक रूप से रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक आशंका होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए, तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रतिपदा से नवमी की दोपहर तक व्रत-नियम चलने से नौ रात यानी ‘नवरात्र’ नाम सार्थक है। यहां रात गिनते हैं इसलिए नवरात्र यानी नौ रातों का समूह कहा जाता है। यदि हम इसके रूपक की बात करे तो इसे हमारे शरीर के नव मुख्य द्वारों के लिए भी प्रसिद्ध है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। हमारे मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर तंत्र को वर्षभर के लिए सुचारु रूप से क्रियाशील रखने के लिए नव द्वारों की शुद्धि का पर्व नव दिन तक मनाया जाता है। यह हमारे समझ की उपज हो सकती है।

शरीर को सुचारु रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किंतु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छः माह के अनन्तर आन्तरिक सफाई की एक प्रक्रिया करनी चाहिए। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन-मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है। ऐसे इन चारों नवरात्रों में शारदीय नवरात्र वैभव और भोग प्रदान देने वाले है। गुप्तनवरात्र तंत्रस‌िद्ध‌ि के ल‌िए व‌िशेष है जबक‌ि चैत्र नवरात्र आत्मशुद्ध‌ि और मुक्त‌ि के ल‌िए। वैसे सभी नवरात्र का आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से अपना महत्व है।
आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से देखें तो यह प्रकृत‌ि और पुरुष के संयोग का भी समय होता है। प्रकृत‌ि मातृशक्त‌ि होती है इसल‌िए इस समय देवी की पूजा होती है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है क‌ि सम्पूर्ण सृष्ट‌ि प्रकृत‌िमय है और वह पुरुष हैं। यानी हम ज‌िसे पुरुष रूप में देखते हैं वह भी आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से प्रकृ‌त‌ि यानी स्त्री रूप है। स्त्री से यहां आशय यह है क‌ि जो पाने की इच्छा रखने वाला है वह स्त्री है और जो इच्छा की पूर्त‌ि करता है वह पुरुष है।

नवरात्र के नौ द‌िनों में मनुष्य अपनी भौत‌िक, आध्यात्म‌िक, यांत्र‌िक और तांत्र‌िक इच्छाओं को पूर्ण करने की कामना से व्रतोपवास रखता है और ईश्वरीय शक्त‌ि इन इच्छाओं को पूर्ण करने में सहयोगी होती है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। प्रथम मां शैलपुत्री यह स्थिरता और धैर्य की प्रतीक है। द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी जो संयम और तप की प्रतिमूर्ति है। तृतीय चंद्रघंटा माता शांति और निर्भीकता की स्वरूप है। चतुर्थ कूष्मांडा यह सृजनात्मक ऊर्जा की प्रतीक है। पंचम स्कंदमाता यह मातृत्व और संरक्षण की शक्ति स्वरूपा है। षष्ठ कात्यायनी शक्ति और साहस की प्रतीक है। सप्तम कालरात्रि यह अंधकार के नाश करती है। आठवीं माता महागौरी यह पवित्रता और शांति की द्योतक है और माता सिद्धिदात्री यह आत्मज्ञान और सिद्धि की अधिष्ठात्री है। यदि ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से विचार करे तो चैत्र नवरात्र का व‌‌िशेष महत्व है क्योंक‌ि इस नवरात्र के समय ही सूर्य का राश‌ि पर‌िवर्तन होता है। सूर्य बारह राश‌ियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फ‌िर से अगला चक्र पूरा करने के ल‌िए पहली राश‌ि मेष में प्रवेश करते हैं। जबकि सूर्य और मंगल दोनों की राश‌ि मेष है और यह अग्न‌ि तत्व वाली है इसल‌िए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है।
चैत्र नवरात्र से ही सनातन हिन्दू नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है। इसी द‌िन से वर्ष के राजा, मंत्री, सेनापत‌ि, वर्षा, कृष‌ि के स्वामी ग्रह का न‌िर्धारण होता है और वर्ष में अन्न, धन, व्यापार और सुख शांत‌ि का आंकलन क‌िया जाता है। नवरात्र में देवी और नवग्रहों की पूजा का कारण यह भी है क‌ि ग्रहों की स्थ‌ित‌ि पूरे वर्ष अनुकूल रहे और जीवन में खुशहाली बनी रहे।
यदि हम धार्म‌िक दृष्ट‌ि से नवरात्र की बात करें तो इसका भी बहुत महत्व है क्योंक‌ि इसी समय आद‌ि शक्त‌ि ज‌िन्होंने इस पूरी सृष्ट‌ि को अपनी माया से ढ़का हुआ है और ज‌िनकी शक्त‌ि से सृष्ट‌ि का संचालन हो रहा है जो भोग और मोक्ष देने वाली देवी हैं वह पृथ्वी पर होती है इसल‌िए इनकी पूजा और आराधना से इच्छ‌ित फल की प्राप्त‌ि अन्य द‌िनों की अपेक्षा जल्दी ‌होती है।
जहां तक बात है चैत्र नवरात्र की तो धार्म‌िक दृष्ट‌ि से भी अत्यधिक प्रभावशाली और ऐतिहासिक है। बहुत से पौराणिक कथाओं में इसके विषय में उल्लेख मिलते है। इसी पावन पवित्र चैत्र नवरात्र के पहले द‌िन आद‌िशक्त‌ि प्रकट हुई थी और देवी के कहने पर ब्रह्मा जी ने सृष्ट‌ि न‌िर्माण का काम शुरु क‌िया था।
इसल‌िए चैत्र शुक्ल प्रत‌िपदा से ह‌िन्दू नववर्ष आरम्भ होता है। चैत्र नवरात्र के तीसरे द‌िन भगवान व‌‌िष्णु ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर पृथ्वी की स्थापना की थी। इसके बाद भगवान व‌िष्णु का सातवां अवतार जो भगवान राम का है वह भी चैत्र नवरात्र में हुआ था। इसल‌िए धार्म‌िक दृष्ट‌ि से चैत्र नवरात्र का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
हमारी सार्वभौम संस्कृति में नवरात्र महापर्व का विशेष महत्व केवल धर्म, अध्यात्म और ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से ही नहीं है बल्क‌ि वैज्ञान‌िक दृष्ट‌ि से भी बहुत महत्व है। ऋतु बदलते समय बहुत से रोग उत्पन्न होते है जिन्हें हम आसुरी शक्त‌ि भी कहते हैं उनका नाश करने के ल‌िए हवन, पूजन क‌िया जाता है इसमें बहुत से जड़ी, बूट‌ियों और वनस्पत‌ियों का प्रयोग क‌िया जाता है। हमारे ऋष‌ि मुन‌ियों ने न स‌िर्फ धार्म‌िक दृष्ट‌ि को ध्यान में रखकर नवरात्र में व्रत और हवन पूजन करने के ल‌िए बताया होगा बल्क‌ि इसका वैज्ञान‌िक आधार को भी अधिक महत्व दिया है।

नवरात्र के अवसर पर व्रत और हवन पूजन स्वास्थ्य के ल‌िए बहुत ही लाभदायक है। इसका कारण यह है क‌ि चारों नवरात्र ऋतुओं के संध‌िकाल में होते हैं यानी इस समय मौसम में बदलाव होता है ज‌िससे शारीर‌िक और मानस‌िक बल की कमी भी प्रतीत होती है। शरीर और मन को पुष्ट और स्वस्थ बनाकर नए मौसम के ल‌िए तैयार करने के ल‌िए व्रत करने की प्रक्रिया को बहुत गहन अध्ययन और चिन्तन के उपरान्त हमारे ऋषियों ने शोध करके लाया है। तभी से इस अवसर पर लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तिसंचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
अध्यात्म पथ पर प्रगतिशील साधकों के लिए नवरात्रि के त्यौहार की अनुपम महिमा है।
वर्ष में एक बार शिवरात्रि महापर्व साधकों के लिए साधना में प्रवेश करने का काल है तो वहीं नवरात्र उत्सवपूर्ण नवीनीकरण के लिए नौ रात्रियां हैं।
नवरात्र व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण हो गया है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। अपने भीतर की ऊर्जा जगाना ही देवी उपासना का मुख्य प्रयोजन है। चैत्र नवरात्र के समय में तो वसंत ही होता है। प्रकृति की शोभा देखते ही बनती है। इस समय वनस्पतियां भी नवीन पल्लव धारण करती हैं। प्रकृति का उल्लास अपना प्रभाव समस्त वातावरण पर डालती है। जीवधारियों के मन विशेष प्रकार की मादकता से भर जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से मनीषियों ने इन दिनों आत्मा के ऋतुमति होने का आलंकारिक संकेत किया है। उनके अनुसार, इन दिनों वह अपने प्रियतम परमात्मा से मिलने के लिए विशेष रूप से आतुर होती है। नौ दिन का व्रत-उपवास प्राकृतिक उपचार के समतुल्य माना जा सकता है। इसमें प्रायश्चित के निष्कासन और पवित्रता की अवधारणा दोनों भाव सम्माहित हैं।
नवरात्र में व्रत का विशेष उद्देश्य है। उस समय प्रकृति में एक विशिष्ट ऊर्जा होती है, जिसको आत्मसात कर लेने पर व्यक्ति का कल्याण हो जाता है। व्रत में हम कई वस्तुओं का त्याग करते हैं और कई वस्तुओं को अपनाते हैं। आयुर्वेद की भी यही धारणा है कि पाचन क्रिया की खराबी से ही शारीरिक में अनेक प्रकार के रोग होते हैं क्योंकि हमारे भोजन के साथ जहरीले तत्वभी शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। आयुर्वेद में तो व्रत के विषय में वर्णन मिलता है। व्रत से पाचन प्रणाली ठीक होती है। व्रत, उपवास का प्रयोजन भी यह है कि हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने मन-मस्तिष्क को केंद्रित कर सकें। मनोविज्ञान भी यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति व्रत-उपवास एक शुद्ध भावना के साथ रखता है तो उस समय उसकी सोच सकारात्मक रहती है, जिसका प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है, जिससे हम अपने भीतर नई ऊर्जा का अनुभव करते हैं। इस ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करने के लिए हमें व्रतों का संयम-नियम बहुत लाभ पहुंचाता है। नवरात्र में कृषि-संस्कृति को भी सम्मान दिया गया है। मान्यता है कि सृष्टि की शुरुआत में पहली फसल जौ ही थी जिसे हम प्रकृति मां परम्बा जगदम्बा को समर्पित करते हैं।


लेखक – डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय, मुख्य न्यासी श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास व गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख जम्मू कश्मीर प्रान्त।

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