*ऋतुराज बसन्त का आगमन एवं सामाजिक समरसता का अलौकिक पर्व है होली।*

देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) –

सनातन संस्कृति में होली पर्व को ऋतुराज बसन्त का संदेशवाहक माना जाता है। इस दिन सभी लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक दूसरे को रंग लगाते हैं। तो आइए श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास के मुख्य न्यासी व गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख जम्मू कश्मीर प्रान्त डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय जी महाराज से इस महापर्व के विषय में कुछ विशेष जानकारी प्राप्त करते हैं। होली प्रत्येक वर्ष देशभर में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को बहुत धूमधाम और भव्यता के साथ मनाया जाता है। यह अवसर भगवान कृष्ण और राधा रानी के शाश्वत प्रेम और मिलन को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व हिरण्यकशिपु पर भगवान विष्णु की जीत का भी प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। ऐसे तो होली की जड़ें प्राचीन भारतीय रीति-रिवाजों और कृषि पद्धतियों से भी जुड़ी हैं। यह प्रजनन उत्सव, वसंत के आगमन और नए जीवन की शुरुआत के साथ भी जोड़ गया है। होली पर, किसान स्वस्थ फसल के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं और अपनी भूमि की उर्वरता सुनिश्चित करने के लिए अनुष्ठान करते हैं। होली प्रकृति में जीवन के नवीनीकरण का भी प्रतिनिधित्व करता है।

होली यह भारत का एक विशिष्ट सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक त्यौहार है। इसके आध्यात्मिकता की बात करें तो आत्मा का परमात्मा के साथ जुड़ जाना या स्वयं का स्वयं के साथ सम्बन्धित होना दोनों कह सकते है। इसलिए होली महापुरुषों ने मानव का परमात्मा से एवं स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का पर्व बताया है। ऐसे तो होली रंगों का त्यौहार है। रंग सिर्फ प्रकृति और चित्रों में ही नहीं बल्कि हमारी आंतरिक ऊर्जा में भी छिपे होते हैं, जिसे हम आभामंडल कहते है। एक तरह से यही आभामंडल विभिन्न रंगों का समवाय है। हमारे जीवन पर रंगों का गहरा प्रभाव होता है, हमारा चिन्तन भी रंगों के सहयोग से ही होता है। हमारी गति भी रंगों के सहयोग से ही होती है। हमारा आभामंडल, जो सर्वाधिक शक्तिशाली होता है, वह भी रंगों की ही अनुकृति है। पहले आदमी की पहचान चमड़ी और रंग-रूप से होती थी। आज वैज्ञानिक दृष्टि इतनी विकसित हो गई कि अब पहचान त्वचा से नहीं, आभामंडल से होती है।

होली का अवसर आध्यात्मिक लोगों के लिए और अधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवसर पर अध्यात्म एवं योग केे विशेषज्ञ विभिन्न रंगों के ध्यान एवं साधना के प्रयोगों से आभामंडल को सशक्त बनाते हैं। होली केवल आमोद-प्रमोद का ही विषय नहीं बल्कि आध्यात्म का अनूठा पर्व है। होली का त्यौहार एवं उससेे जुड़ी बसंत ऋतु दोनों ही पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। इस अवसर पर प्रकृति सारी खुशियां स्वयं में समेटकर दुल्हन की तरह सजी होती है। पेड़-पौधे भी इस ऋतु में नया परिधान धारण कर लेते हैं। बसंत का मतलब ही है नया। नया जोश, नई आशा, नया उल्लास और नई प्रेरणा- यही बसंत का महत्वपूर्ण अवदान है और इसकी प्रस्तुति का बहाना है होली जैसा अनूठा एवं विलक्षण पर्व। मनुष्य भीतर से खुलता है समय का पारदर्शी टुकड़ा बनकर, सपने सजाता है और उनमें सच्चाई का रंग भरने का प्राणवान संकल्प करता है। इसलिए होली को वास्तविक रूप में मनाने के लिए माहौल भी चाहिए और मन भी। तभी हम मन की गंदी परतों को उतार कर न केवल बाहरी बल्कि आन्तरिक परिवेश को भी मजबूत बना सकते हैं।

होली पर रंगों की गहन साधना हमारी संवदेनाओं को भी पवित्र करती है। क्योंकि असल में होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है, इसी से जिंदगी जीने का नया मार्ग मिलता है। इसमें अपनों के दुख-दर्द को बाँटा जाता है, बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है। लेकिन आज की आधुनिकता ने इस आनंद, उल्लास और अध्यात्म के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार को हम लोगों ने कहां लाकर खड़ा कर दिया है।कभी होली के चंग की हुंकार से जहाँ मन के रंजिश की गाँठें खुलती थीं, दूरियाँ सिमटती थीं वहाँ आज होली के हुड़दंग, अश्लील हरकतों और गन्दे तथा हानिकारक पदार्थों के प्रयोग से भयाक्रांत डरे सहमे लोगों के मनों में होली का वास्तविक अर्थ गुम हो रहा है। होली के मोहक रंगों की फुहार से जहाँ प्यार, स्नेह और अपनत्व बिखरता था आज वहीं खतरनाक केमिकल, गुलाल और नकली रंगों से अनेक बीमारियाँ बढ़ रही हैं और मनों की दूरियाँ भी।

हम होली कैसे खेलें? किसके साथ खेलें? और होली को कैसे आध्यात्म-संस्कृतिपरक बनाएँ? यह विचारणीय एवं ज्वलंत प्रश्न है। होली को अध्यात्मिक रंगों से खेलने की एक पूरी प्रक्रिया है। होली के अवसर पर सिद्ध एवं साधक सन्तों द्वारा अध्यात्म और ध्यान की पद्धति पर विशेष जोर दिया जाता है। एक विशेष पद्धति से रंगों का ध्यान किया जाता है। ध्यान के माध्यम से विभिन्न रंगों की होली खेली जाती है।

यह तो स्पष्ट है कि रंगों से हमारे शरीर, मन एवं आवेगों का बहुत बड़ा सम्बन्ध है। शारीरिक स्वास्थ्य और बीमारी, मन का संतुलन और असंतुलन, आवेगों में कमी और वृद्धि ये सब इन प्रयत्नों पर निर्भर है कि हम किस प्रकार के रंगों का समायोजन करते हैं और किस प्रकार हम रंगों से अलगाव या संश्लेषण करते हैं। उदाहरणतः नीला रंग शरीर में कम होता है, तो क्रोध अधिक आता है, नीले रंग के ध्यान से इसकी पूर्ति हो जाने पर गुस्सा कम हो जाता है। श्वेत रंग की कमी होती है, तो अशांति बढ़ती है, लाल रंग की कमी होने पर आलस्य और जड़ता पनपती है। पीले रंग की कमी होने पर ज्ञानतंतु निष्क्रिय बन जाते हैं। ज्योतिकेंद्र पर श्वेत रंग, दर्शन-केंद्र पर लाल रंग और ज्ञान-केंद्र पर पीले रंग का ध्यान करने से क्रमशः शांति, सक्रियता और ज्ञानतंतु की सक्रियता बढ़ती है। होली के ध्यान में शरीर के विभिन्न अंगों पर विभिन्न रंगों का ध्यान किया जाता है और इस तरह रंगों के ध्यान में गहराई से उतरकर हम विभिन्न रंगों से रंगे हुए लगते है। विशिष्ट प्रक्रियाओं के माध्यम से हम निश्चित रंग को निश्चित चैतन्य-केंद्र पर देखने का प्रयत्न करते हैं। हमारे साधक इसे अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जब व्यक्ति का चरित्र शुद्ध होता है तब उसका संकल्प अपने आप फलित होता है। चरित्र की शुद्धि के आधार पर संकल्प की क्षमता जागती है। जिसका संकल्प-बल जाग जाता है उसकी कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती।

होली के लिए विशेष रूप से ध्यान उपक्रम में प्रत्येक रंग का ध्यान में साक्षात्कार करने के लिए संकल्प-शक्ति का प्रयोग करवाया जाता है। संकल्प-शक्ति का अर्थ है, कल्पना करना अर्थात् मानसिक चक्षु से इसे स्पष्ट रूप से देखना। यह इस पद्धति का मूल आधार है। कल्पना जितनी अधिक देर टिकेगी और जितनी सघन होगी, उतनी ही सफलता मिलेगी। फिर उस कल्पना को भावना का रूप देना, दृढ़निश्चय करना। जब हमारी कल्पना उठती है और वह दृढ़निश्चय में बदल जाती है तो वह संकल्प-शक्ति बन जाती है। प्रारम्भिक कल्पना में इतनी ताकत नहीं होती, किंतु कल्पना को जब संकल्प शक्ति का सहयोग मिलती है तब उसकी ताकत बढ़ जाती है। जब कल्पना सुदृढ़ बन जाती है, तब जो रंग हम देखना चाहते हैं, वह साक्षात् दिखाई देने लग जाता है।
रंग का साक्षात्कार करने के लिए चित्त की स्थिरता एवं एकाग्रता अनिवार्य है।

एकाग्रता का अर्थ है एक ही कल्पना पर स्थिर रहना, उसका ही चिंतन करते रहना। जब एकाग्रता सधती है तभी चित्त स्थिर होता है और तब वह कल्पना के रंगों की तरंगों को अपने सूक्ष्म शरीर-तैजस शरीर की सहायता से उत्पन्न करता है। तभी कल्पना समाप्त हो जाती है और वास्तविक रंगों की उत्पत्ति हो जाती है। किसी-किसी व्यक्ति को इसमें शीघ्र सफलता मिलती है, पर किसी-किसी को कुछ समय लगता है। वैसी स्थिति में व्यक्ति को न निराश होना चाहिए और न ही अपना धैर्य खोना चाहिए। दृढ़संकल्प के साथ प्रयत्न करना चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति में अनंत शक्ति निहित है। किंतु वह अपनी शक्ति से परिचित नहीं है। अपेक्षा है, अपनी शक्ति को जानने की, उससे परिचित होने की और उसमें आस्था की। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- ये पांच भौतिक तत्व हैं। शरीर इन्हीं पांच तत्वों से निर्मित है। इनके अलग-अलग स्थान निर्धारित हैं। माना गया है कि पैर के घुटने तक का स्थान पृथ्वीतत्त्व प्रधान है। घुटने से लेकर दृष्टि तक का स्थान जलतत्त्व प्रधान है। कटि से लेकर पेट तक का भाग अग्नितत्त्व प्रधान है। वहां से हृदय तक का भाग आकाशतत्त्व प्रधान है। तत्त्वों के अपने रंग भी होते हैं। पृथ्वीतत्त्व का रंग पीला है। जलतत्त्व का रंग श्वेत है। अग्नितत्त्व का रंग लाल है। वायुतत्व का रंग हरा-नीला है। आकाशतत्त्व का रंग नीला है। ये रंग हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। पूरी रंग थेरेपी, क्रोमो थेरेपी रंगों के आधार पर ही काम करते हैं।
होली पर इन पांच तत्त्व और उनसे जुड़े रंगों का ध्यान करने से हमारा न केवल शरीर बल्कि सम्पूर्ण वातावरण शुद्ध और सशक्त बन जाता है। रंगों से खेलने एवं रंगों के ध्यान के पीछे एक बहुत बड़ा दर्शन है। निराश, हताश और मुरझाएं जीवन में इससे एक नई ताजगी, एक नई रंगीनी एवं एक नई ऊर्जा आती है। रंग बाहर से ही नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से भी मनुष्य को सराबोर कर देता है।

होली के अवसर पर आध्यात्मिक रंगों से होली खेलने की लोकजीवन में ही नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व है। आओ सब मिलकर होली के इस आध्यात्मिक स्वरूप को समझें और इस पर्व के साथ जुड़ रही विसंगतियों को उखाड़ फेकने में सहयोग करें। पूर्ण संतों के अनुसार होलिका दहन का आध्यात्मिक महत्व यह है कि हम अपने अंदर की बुराईयों को जलाकर सदाचारी जीवन व्यतीत करें तथा जिस प्रकार हम बाहर एक-दूसरे पर रंग व गुलाल डालकर इस त्यौहार को मनाते हैं, उसी प्रकार हम पूर्णगुरु की सहायता से ध्यान-अभ्यास द्वारा अपने अंतर में प्रभु के विभिन्न रंगों को देखकर सच्ची होली अपने आन्तरिक स्वरूप में भी खेलें। इस त्यौहार का एक अन्य पहलू एक दूसरे पर रंग लगाना भी है। इस त्यौहार पर लोग सफेद कपड़े पहनते हैं, इसमें भी एक आध्यात्मिक रहस्य है। सफेद रंग में अन्य सभी रंग शामिल हैं। इसी तरह परमेश्वर हम सबके भीतर है। जिस प्रकार सफेद रंग सभी रंगों का स्रोत है उसी प्रकार परमेश्वर सारी सृष्टि का स्रोत है।

विगत कुछ वर्षों से इस पर्व की तिथि निर्धारण को लेकर संशय हो जा रहा है जो अत्यन्त विचारणीय विषय है। इस विषय पर विशिष्ट विद्वानों एवं सरकार को सहमति के साथ तय करके समाज में इसकी तिथि घोषित करना चाहिए ताकि आए दिन जो विसंगति आ रही है उससे मुक्ति मिल जाय। सनातन संस्कृति की अनूठी परम्परा होली पर्व को विकृतियों से बचाकर आध्यात्मिक स्वरूप में ही मनाना चाहिए।

लेखक – डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय, मुख्य न्यासी श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास व गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख जम्मू कश्मीर प्रान्त।

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