देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) –
(डॉ.राघवेंद्र शर्मा – विनायक फीचर्स)
आज जब हम वैश्विक पटल पर दृष्टि डालते हैं, तो हृदय विचलित हो उठता है। वर्तमान समय में समूचा विश्व अशांति और हिंसा के एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ बारूद की गंध हवाओं में घुली हुई है। पश्चिम के देशों से लेकर मध्य पूर्व तक, हर कहीं बमबारी और गोलीबारी का शोर सुनाई देता है। मानवता कराह रही है और शांति की तलाश में भटक रही है। भारत के पड़ोसी मुल्क भी आतंकवाद और आंतरिक कलह की आग में झुलस रहे हैं। लेकिन इन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच यदि कोई एक देश दुनिया के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है, तो वह भारत है। भारत आज के दौर में शांति का एक ऐसा टापू है जहाँ की फिजाओं में नफरत का धुआं नहीं, बल्कि प्रेम और सद्भाव के रंग घुले हुए हैं। इस शांति और सुरक्षा का सबसे बड़ा कारण भारत की वह समावेशी संस्कृति है, जिसका आधार ‘सनातनी संस्कार’ और ‘हिंदू बहुल्यता’ की वह विचारधारा है जो स्वभावतः सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। हिंदू शब्द मात्र एक उपासना पद्धति नहीं, बल्कि एक ऐसा उदार दृष्टिकोण है जो हर धर्म, संप्रदाय और पंथ का सम्मान करना सिखाता है। इसी सहिष्णुता और उदारता का परिणाम है कि आज भारत अपनी पूरी जीवंतता के साथ रंगों का पावन त्योहार होली मना रहा है।
होली मात्र रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारत की उस महान विरासत का प्रतिबिंब है जिसे हम ‘विविधता में एकता’ कहते हैं। भारत आज विश्व का एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जो अपनी निष्पक्ष और समान व्यवहार वाली नीति के कारण उन देशों के बीच भी सेतु का काम कर रहा है जो आपस में एक-दूसरे के कट्टर शत्रु बने हुए हैं। आज चाहे रूस और यूक्रेन का संघर्ष हो या इजराइल और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी, भारत की स्पष्टवादी नीतियों और शांति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का लोहा पूरी दुनिया मानती है। अमेरिका जैसा महाशक्तिशाली देश हो या संघर्षों में घिरे अन्य राष्ट्र, सभी भारत का सम्मान करते हैं। यह सम्मान भारत ने अपनी सैन्य ताकत के साथ-साथ अपनी नैतिक शक्ति से अर्जित किया है। भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है। वह आतंकवाद और हिंसा का पुरजोर विरोध करता है और सदैव शांति का पक्षधर रहा है। यह हमारे संस्कारों की ही ताकत है कि हम युद्ध नहीं, बुद्ध और गांधी की राह पर चलते हुए संवाद और समन्वय को प्राथमिकता देते हैं। यद्यपि हमारे देश को कुछ शत्रु राष्ट्रों से निरंतर चुनौतियां और घुसपैठ की धमकियां मिलती रहती हैं, लेकिन हमारी वीर सेना और संकल्पित सरकार आज 140 करोड़ देशवासियों के लिए सुरक्षा की एक ऐसी अभेद्य दीवार बनी हुई है कि आम नागरिक निर्भय होकर अपने त्योहार मना पा रहा है।
इस वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि भारत में रहने वाले सभी संप्रदायों के लोगों को इस सत्य का बोध हो कि जितनी धार्मिक और लोकतांत्रिक आजादी भारत की मिट्टी में है, वह दुनिया के किसी भी कोने में उपलब्ध नहीं है। भारत का खुलापन किसी एक पंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस विशाल आकाश की तरह है जहाँ हर पक्षी को अपनी पहचान के साथ उड़ने की स्वतंत्रता है। यह स्वतंत्रता और खुलापन ही होली के उन सतरंगी रंगों से मेल खाता है, जहाँ हर रंग की अपनी विशिष्टता है, लेकिन जब वे मिल जाते हैं तो एक सुंदर उत्सव की रचना करते हैं। हमारे यहाँ अलग-अलग संप्रदाय, मत और पंथ चुनौतियों के रूप में नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक संपन्नता के प्रतीकों के रूप में विद्यमान हैं। होली का त्योहार इसी सच्चाई का जीवंत प्रमाण है कि अलग-अलग रंगों के बावजूद हम सब एक ही धागे में पिरोए हुए हैं। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वह रंग किसी जाति या धर्म को नहीं देखता, वह केवल मनुष्यता के चेहरे को निखारता है।
आज जब हम होली की मस्ती में सराबोर हैं, तो हमें एक क्षण ठहरकर उस गौरव और सुकून को महसूस करने की आवश्यकता है जो हमें ‘भारतीय’ होने पर मिलता है। हमें इस बात का अहसास होना चाहिए कि हम सुरक्षित हैं और शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं क्योंकि हमारी जड़ें भारत की उर्वर भूमि में धंसी हुई हैं। विश्व के नक्शे पर कई समृद्ध देश हो सकते हैं, लेकिन जिस आत्मिक शांति और सामाजिक सौहार्द का अनुभव भारत में होता है, वह कहीं और दुर्लभ है।
होली का त्योहार हमें यह संदेश देता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः जीत सत्य, अहिंसा और प्रेम की ही होती है। होलिका दहन की अग्नि हमें सिखाती है कि हम हमारे भीतर की संकीर्णता और विद्वेष को जलाकर भस्म कर दें और धुलेंडी के रंगों के साथ एक नई शुरुआत करें। यह त्योहार हमारे भीतर के उस भारतीयत्व को जगाने का अवसर है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत को जीता है।
यह उत्सव हमारी उस सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन है जिसने सदियों से विदेशी आक्रमणों और आंतरिक चुनौतियों को झेलने के बाद भी अपनी मूल प्रकृति को नहीं खोया। भारत आज भी अडिग है क्योंकि इसकी बुनियाद भाईचारे और सह-अस्तित्व पर टिकी है। हमें अपनी सेनाओं के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो सीमाओं पर जाग रहे हैं ताकि हम चैन की नींद सो सकें और उल्लास के साथ होली खेल सकें। आइए, हम सब मिलकर इस रंग-बिरंगे पर्व को एक संकल्प के रूप में मनाएं कि हम भारत की इस विविधता को संजोकर रखेंगे और शांति की इस मशाल को कभी बुझने नहीं देंगे। यह देश हमारा है, इसकी परंपराएं हमारी हैं और इसकी सुरक्षा हमारी साझा जिम्मेदारी है। नफरत की आग को प्रेम के रंगों से बुझाने का यह सबसे उत्तम समय है। आप सभी को होली के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। आइए, रंगों के इस मेले में डूबकर हम सब एक स्वर में कहें कि भारत की एकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। (विनायक फीचर्स)
*लोकपर्व होली की अनूठी परम्पराएं*
(मनोज कुमार अग्रवाल -विभूति फीचर्स)
समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है। यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रह्लाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु जी का परम भक्त था। ये बात हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं थी। इस वजह से वह प्रह्लाद को मारना चाहता था। असुर राज हिरण्यकश्यप ने बहुत कोशिश की, लेकिन प्रहलाद को मार नहीं सका। तब असुरराज की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन भगवान विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। तभी से प्रह्लाद की जीत के रूप में होली दहन का पर्व मनाया जाता है।
*गाली देने की रीति*
होली के गीतों में वैसे भी गालियां पिरोई होती हैं। शब्दों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया होता है कि लोग उसे सुन कर मस्ती करते हैं और उन्हें भीतर तक गुदगुदी होती है। वाराणसी, मिथिलांचल, कुमाऊं, राजस्थान, हरियाणा में होली पर गाली की अनोखी परंररा है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो रंगों की मस्ती के साथ-साथ गालियों और गुदगुदाते गीतों के लिए भी खूब जाना जाता है। इसीलिए इस त्योहार को सबसे अनूठा कहते हैं। साल भर लोगों को इसका इंतजार रहता है। लोग गालियों और गीतों के जरिए अपनी भड़ास निकालते हैं। जैसा प्रदेश, वैसे गीत और वैसी ही वहां की गालियां। बहुरंगी होली की ये छटा दुनिया भर में निराली है। काशी की परंपराएं इसलिए अनूठी हैं क्योंकि यहां होली पर गालियों का भी अपना एक अलग संस्कार देखने को मिलता है। दूसरे शहरों में गाली देने पर मार हो जाए, लेकिन यहां होली पर गालियां मनभावन लगती हैं।
*लट्ठमार होली*
श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से करीब 50 किमी दूर बरसाना की होली बहुत खास होती है। बरसाना में कई दिनों तक लट्ठमार होली खेली जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले ही लोग यहां होली खेलना शुरू कर देते हैं। पास के नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं। इन गांवों की महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं और पुरुष ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। ये होली देखने देश-विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं।
*फूलों की होली*
मान्यता है कि मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ होली खेली थी। इसी वजह से इन जगहों पर होली की अच्छी खासी धूम होती है। मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण के भक्त बड़ी संख्या में होली खेलने पहुंचते हैं। यहां के मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है।बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली अवर्णनीय है।
*मसाने की होली*
वाराणसी(काशी) के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां शमशान की राख से होली खेली जाती है। मान्यता है कि शिव जी ने यहां अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी। इसी मान्यता की वजह से आज भी शिव भक्त यहां मसाने की होली खेलते है। देश दुनिया में यह एकमात्र ऐसी होली है जिसमें चिता भस्म को रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल करते हुए होली खेलते हैं।
*फालैन गांव की होली*
एक ऐसी भी होली है जहां जलती होली की लपटों के बीच पंडा नंगे पांव निकल जाता है लेकिन खरोंच तक नहीं आती है। मथुरा से करीब 50 किमी दूर एक गांव है फालैन। इसे प्रहलाद का गांव भी कहते हैं। फालैन गांव की होली की खास बात ये है कि यहां जलती हुई होली के बीच में से एक पंडा चलकर गुजरता है। होली ऊंची-ऊंची लपटों से निकलने के बाद भी पंडे का बाल तक नहीं जलता है। ये चमत्कार देखने के लिए देश-दुनिया से काफी लोग यहां पहुंचते हैं।
*कर्नाटक की होली*
कर्नाटक के हम्पी की होली भी दुनियाभर में फेमस है। ये जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है। इस जगह का संबंध त्रेतायुग की वानर सेना से है। मान्यता है कि सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ इसी क्षेत्र में रहते थे। यहां होली पर बड़ा आयोजन होता है। हजारों लोग यहां होली खेलने आते हैं।
*राजस्थान की होली*
उदयपुर और पुष्कर में आज भी शाही तौर तरीकों से होली खेली जाती है। इस मौके पर राजपुताना आन बान शान देखने को मिलती है।
कई दूसरे एशियाई देशों में भी होली के प्रतिरूप रंगों का पर्व मनाया जाता है लेकिन भारतीय होली यकीनन आज भी अनूठी मस्ती से भरी है। यह समाज को एक सूत्र में पिरो कर उमंग व उत्साह का संचार करती है। *(विभूति फीचर्स)*
