देवभूमि जे के न्यूज, ऋषिकेश, 21 अगस्त। नेपाल से धार्मिक यात्रा पर आए एक प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविख्यात आध्यात्मिक तीर्थस्थल परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश का पावन भ्रमण किया। प्रतिनिधिमंडल ने परमार्थ निकेतन में दिव्य गंगा आरती में सहभाग कर माँ गंगा के पावन तट पर आध्यात्मिक शांति, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं की दिव्यता का अनुभव किया। भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की वैश्विक आकर्षण शक्ति निरंतर बढ़ रही है। नेपाल से आए प्रतिनिधिमंडल का परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने आत्मीय स्वागत किया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि भारत और नेपाल के संबंध केवल दो देशों के संबंध नहीं हैं, बल्कि ये साझा संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, तीर्थ परंपरा और सनातन मूल्यों से जुड़े हृदयों के संबंध हैं। दोनों देशों की धरती भगवान श्रीराम, भगवान पशुपतिनाथ, भगवान बुद्ध, माता सीता और हिमालय की महान आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समावेशिता, सह-अस्तित्व और विश्वकल्याण की भावना है। भारत ने सदैव दुनिया को केवल भौतिक प्रगति का मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि जीवन को संतुलित, शांतिपूर्ण और सार्थक बनाने की दृष्टि दी है। यहां धर्म जीवन जीने की कला है। योग शरीर, मन और आत्मा को जोड़ता है, आयुर्वेद प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश देता है, गंगा हमें पवित्रता और प्रवाह का संदेश देती हैं और भारतीय दर्शन सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि आज विश्व भारत की ओर इसलिए आकर्षित हो रहा है क्योंकि आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच मानवता शांति, संतुलन, करुणा और आंतरिक आनंद की खोज कर रही है। भारत की प्राचीन परंपराओं में इन सभी प्रश्नों के उत्तर निहित हैं। योग, ध्यान, आयुर्वेद, अध्यात्म, भारतीय संगीत, नृत्य, दर्शन, मंदिर परंपराएं, तीर्थयात्राएं और प्रकृति के प्रति श्रद्धा आज विश्वभर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति किसी एक समुदाय, क्षेत्र या देश तक सीमित नहीं है यह मानवता को जोड़ने वाली चेतना है। उन्होंने कहा कि नेपाल और भारत का संबंध हिमालय और गंगा की तरह सनातन और अविच्छिन्न है। नेपाल में भगवान पशुपतिनाथ की आराधना हो या भारत में भगवान शिव और माँ गंगा की उपासना दोनों देशों की आध्यात्मिक चेतना एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसी धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं दोनों देशों के बीच मैत्री, आध्यात्मिक एकता और सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करती हैं।
इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल को पूज्य स्वामी जी द्वारा रचित सद्साहित्य भी भेंट किया गया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने इस सद्साहित्य को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि भारतीय आध्यात्मिक साहित्य जीवन को भीतर से देखने और समझने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल के सदस्य कृष्ण खनाल, सुरेश श्रेष्ठ, गजेन्द्र राजभण्डारी, अरुणा जोशी, अनिता काफ्ले, दीपक घिमिरे, विनोद घिमिरे, अच्युत ढुंगाना, आशिष शर्मा, दीपेश छेङ्गचु, सुरज कुमार ने किया सहभाग।






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