ऋषिकेश, 21 अगस्त 2026 — देवभूमि जेके न्यूज़ डेस्क
नेपाल से धार्मिक यात्रा पर आए एक प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार को ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम का भ्रमण किया और शाम को गंगा तट पर होने वाली विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती में हिस्सा लिया। परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। नेपाल के तीर्थयात्रियों के लिए ऋषिकेश-हरिद्वार लंबे समय से प्रमुख पड़ाव रहे हैं, और हाल के वर्षों में ऐसे धार्मिक-सांस्कृतिक दौरे बढ़े हैं।
“साझा संस्कृति से जुड़े हृदयों का संबंध”
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने संदेश में कहा कि भारत और नेपाल के संबंध सिर्फ दो देशों के नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और तीर्थ परंपरा से जुड़े हृदयों के संबंध हैं। दोनों देशों की धरती भगवान राम, पशुपतिनाथ, बुद्ध, माता सीता और हिमालय की आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी है। नेपाल में पशुपतिनाथ की आराधना हो या भारत में शिव और गंगा की उपासना — दोनों की आध्यात्मिक चेतना एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी है।
“दुनिया भारत की ओर क्यों आकर्षित हो रही है”
स्वामी जी ने कहा कि भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत उसकी समावेशिता, सह-अस्तित्व और विश्वकल्याण की भावना है। योग शरीर, मन और आत्मा को जोड़ता है, आयुर्वेद प्रकृति के साथ संतुलन सिखाता है, गंगा पवित्रता और प्रवाह का संदेश देती है, और भारतीय दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से पूरे विश्व को जोड़ता है। उनके अनुसार आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच मानवता शांति, संतुलन और आंतरिक आनंद की तलाश में है, और भारत की प्राचीन परंपराओं में इन सवालों के जवाब हैं — इसीलिए योग, ध्यान, आयुर्वेद, तीर्थयात्राएं और प्रकृति के प्रति श्रद्धा दुनिया भर के लोगों को आकर्षित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी यात्राएं दोनों देशों के बीच मैत्री और सांस्कृतिक संबंधों को और मज़बूत करती हैं।
सद्साहित्य भेंट
प्रतिनिधिमंडल को स्वामी जी द्वारा रचित सद्साहित्य भेंट किया गया, जिसे सदस्यों ने श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि भारतीय आध्यात्मिक साहित्य जीवन को भीतर से देखने की प्रेरणा देता है। प्रतिनिधिमंडल में कृष्ण खनाल, सुरेश श्रेष्ठ, गजेन्द्र राजभण्डारी, अरुणा जोशी, अनिता काफ्ले, दीपक घिमिरे, विनोद घिमिरे, अच्युत ढुंगाना, आशिष शर्मा, दीपेश छेङ्गचु और सुरज कुमार शामिल थे।







0 Comments