देवभूमि जेके न्यूज़ डेस्क — विश्लेषण
पिछले कुछ हफ्तों में ऋषिकेश-देहरादून के बाज़ार में चीनी के दाम चढ़े हैं, और उसी दौरान पेट्रोल पंपों पर E20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिला पेट्रोल) को लेकर वाहन चालकों में माइलेज घटने की शिकायतें भी सुनाई दे रही हैं। ये दोनों बातें अलग-अलग लगती हैं, लेकिन इनके बीच एक सीधा संबंध है — गन्ना। इस लेख में समझिए कि एथेनॉल नीति क्या है, यह इतनी तेज़ी से क्यों लागू हुई, और इसके चार ऐसे पहलू जिन पर सार्वजनिक बहस अभी अधूरी है।
नीति क्या है और कितनी तेज़ी से बदली
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के पीछे तीन मकसद हैं: कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना, विदेशी मुद्रा बचाना और किसानों के गन्ने के लिए एक अतिरिक्त बाज़ार बनाना। 2018 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति में 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य 2030 के लिए रखा गया था। 2022 में सरकार ने इसे पांच साल पहले, 2025-26 तक हासिल करने का फैसला किया, और सरकार के अनुसार 2025 में यह लक्ष्य पूरा भी हो गया।
यह छलांग कितनी बड़ी है, इसे आंकड़ों से समझिए: 2013-14 में एथेनॉल मिश्रण सिर्फ 1.53 प्रतिशत था, 2019-20 में लगभग 5 प्रतिशत और 2020-21 में 8.17 प्रतिशत। यानी बाद के चार-पांच वर्षों में मिश्रण ढाई गुना से ज़्यादा बढ़ा। पहले के दौर में मिश्रण को उपलब्धता और क्षमता के साथ क्रमिक रूप से बढ़ाने का रास्ता अपनाया गया था; अब सवाल यह है कि क्या तैयारी भी उसी गति से हुई।
पहला पहलू: चीनी और एथेनॉल के बीच प्रतिस्पर्धा
गन्ना एक सीमित संसाधन है — उससे चीनी भी बनती है और एथेनॉल भी। सरकार ने 2024-25 में एथेनॉल उत्पादन के लिए 40 लाख टन चीनी के उपयोग-परिवर्तन की अनुमति दी और एफसीआई का अतिरिक्त चावल भी उपलब्ध कराया। जब चीनी सरप्लस हो, तो इसे एथेनॉल में बदलना मिलों और किसानों के लिए फायदेमंद है। लेकिन जिस साल गन्ने का उत्पादन कम हो और घरेलू मांग बढ़े, उस साल खाने की चीनी और ईंधन के एथेनॉल के बीच खींचतान पैदा हो सकती है। और चीनी महंगी होने का असर मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ और प्रोसेस्ड फूड तक फैलता है। सवाल यह नहीं कि उपयोग-परिवर्तन गलत है; सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा की न्यूनतम सीमा तय किए बिना इसकी हद क्या हो।
दूसरा पहलू: प्रति लीटर नहीं, प्रति किलोमीटर देखिए
एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम ऊर्जा होती है, इसलिए E20 से कुछ वाहनों में माइलेज घटता है। सरकार के अपने हालिया बयानों में भी माना गया है कि कुछ वाहनों में 3 से 5 प्रतिशत तक ईंधन दक्षता घट सकती है, हालांकि E20-अनुकूल वाहनों में असर सीमित है। उपभोक्ता के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि पेट्रोल का दाम स्थिर रहने पर भी, अगर एक लीटर में गाड़ी कम चलती है, तो प्रति किलोमीटर खर्च बढ़ जाता है।
तीसरा पहलू: पुराने वाहनों का क्या
E20 के लिए इंजन कैलिब्रेशन, फ्यूल सिस्टम और रबर के पुर्ज़ों की अनुकूलता ज़रूरी है — सरकार खुद मानती है कि तकनीकी बदलाव की ज़रूरत वास्तविक थी। यह कहना गलत होगा कि E20 से बड़े पैमाने पर इंजन खराब हो रहे हैं; सरकार के अनुसार इंजन फेल होने का कोई सत्यापित पैटर्न नहीं मिला है। लेकिन भारत की सड़कों पर करोड़ों पुराने वाहन हैं, और नई E20-अनुकूल गाड़ियों की तैयारी को पूरे वाहन बेड़े की स्थिति मान लेना उचित नहीं। पुराने वाहनों की अनुकूलता, रखरखाव और लंबी अवधि की टिकाऊपन का सवाल अलग है — और सरकार के अपने रोडमैप में भी माना गया था कि इंजन हार्डवेयर में बदलाव से माइलेज की क्षति घटाई जा सकती है।
चौथा पहलू: परिवार के बजट पर दोहरा दबाव
एथेनॉल नीति का उद्देश्य पेट्रोल सस्ता करना कभी नहीं था — उद्देश्य आयात घटाना है, और सरकार के अनुसार 2014-15 से इस कार्यक्रम ने बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचाई है। लेकिन ये मैक्रो लाभ उपभोक्ता की जेब तक नहीं पहुंचे। अगर एक ओर चीनी महंगी हो और दूसरी ओर माइलेज घटे, तो एक सामान्य परिवार पर खाने और आने-जाने — दोनों का खर्च बढ़ता है।
आगे का रास्ता: नीति छोड़ने की नहीं, संतुलित करने की ज़रूरत
विशेषज्ञ जिन सुधारों की बात करते हैं, वे व्यावहारिक हैं: एथेनॉल के लिए गन्ने पर निर्भरता घटाकर कृषि अपशिष्ट, सेलुलोसिक बायोमास और अन्य अखाद्य स्रोतों का उपयोग बढ़ाना; चीनी की न्यूनतम घरेलू उपलब्धता के लिए स्पष्ट सुरक्षा-सीमा तय करना; पुराने वाहनों के संक्रमण की लागत का अध्ययन; और उपभोक्ताओं को प्रति किलोमीटर वास्तविक लागत की जानकारी देना। 2030 का लक्ष्य 2025 में पूरा करना उपलब्धि का आंकड़ा ज़रूर है, लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब E20 के साथ चीनी की कीमत काबू में रहे, खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रहे और उपभोक्ता की वास्तविक लागत न बढ़े।
उत्तराखंड के वाहन चालकों के लिए
अगर आपकी गाड़ी 2023 या उसके बाद की है, तो वह लगभग निश्चित रूप से E20-अनुकूल है। पुरानी गाड़ी है, तो निर्माता की वेबसाइट या मैनुअल में E20 अनुकूलता जांचें, फ्यूल फिल्टर और रबर के पुर्ज़ों की नियमित जांच कराएं, और अपना माइलेज कुछ हफ्ते नोट करें ताकि वास्तविक खर्च का अंदाज़ा हो। रसोई के बजट पर महंगाई के असर पर हमारा यह विश्लेषण भी पढ़ें।







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