देव भूमि जे के न्यूज-, 14 सितंबर। लंदन के हृदय में बहने वाली टेम्स नदी के तट पर माँ गंगा की दिव्य आरती ने भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का भावपूर्ण संदेश विश्व तक पहुँचाया। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, पूज्य स्वामी स्वरूपानन्द जी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में टेम्स के तट पर भव्य गंगा आरती सम्पन्न हुई।
इस अवसर पर यूके के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग एकत्र हुए। विभिन्न परिवारों और पीढ़ियों के लोगों ने एक साथ आरती में सहभागिता कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया। टेम्स के तट पर प्रज्वलित गंगा आरती का दीप केवल नदी किनारे ही नहीं, बल्कि उन हृदयों में भी प्रज्वलित हुआ, जो अपनी भारतीय जड़ों, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत से जुड़े हुए हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि टेम्स के तट पर माँ गंगा की आरती भारत की शाश्वत आध्यात्मिक परंपरा का विश्व से संवाद है। गंगा और टेम्स की धाराओं के इस संगम ने यह संदेश दिया कि संस्कृति की सीमाएँ भौगोलिक नहीं होतीं। उन्होंने “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” की भावना को विश्व कल्याण का आधार बताया।
गणेश चतुर्थी पर अहंकार के विसर्जन का संदेश
गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ देते हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भगवान गणेश के स्वरूप को आध्यात्मिक चेतना की यात्रा से जोड़ते हुए कहा कि श्री गणेश जी की जन्मकथा प्रकृति से पुरुष, देह से चेतना और सीमित अहं से विराट अस्तित्व की यात्रा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि गणेशजी का मस्तक अलग होना केवल एक घटना नहीं, बल्कि सीमित ‘मैं’ और अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है। जब संकीर्ण अहंकार की पहचान समाप्त होती है, तभी विराट चेतना का प्राकट्य होता है। भगवान शिव द्वारा उन्हें गज का मस्तक प्रदान किया जाना व्यापक दृष्टि और उच्च चेतना की ओर रूपांतरण का संदेश देता है।
स्वामी जी ने कहा कि गणेशजी का विशाल मस्तक विराट दृष्टि, बड़े कान गहराई से सुनने, छोटी आँखें एकाग्रता और सूँड कोमलता एवं सामर्थ्य के संतुलन की प्रेरणा देती है। एकदंत जीवन में सार को ग्रहण करने और अनावश्यक को छोड़ने का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि भगवान गणेश का विशाल उदर जीवन में आने वाले सुख-दुःख, मान-अपमान और सफलता-असफलता को पचाने की साधना का प्रतीक है। साधना का अर्थ कठिनाइयों से बचना नहीं, बल्कि परिस्थितियों को अपने भीतर विष न बनने देना है।
मूषक चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि गणेशजी के चरणों में स्थित मूषक चंचल मन और अनियंत्रित इच्छाओं का प्रतीक है। गणेशजी उसे नष्ट नहीं करते, बल्कि उस पर आरूढ़ होते हैं। यह संदेश देता है कि मन को मिटाना नहीं, बल्कि मन पर नियंत्रण स्थापित करना और इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देना ही वास्तविक साधना है।
मिट्टी की प्रतिमा के साथ रोपे जाएँ जीवन के बीज
स्वामी जी ने गणेश चतुर्थी पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने और उसके भीतर एक बीज रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रतिमा मिट्टी की हो, उसमें श्रद्धा का भाव हो और विसर्जन के बाद वही मिट्टी प्रकृति में लौटकर नए जीवन का आधार बने।
उन्होंने कहा कि गणेशजी की प्रतिमा के साथ केवल मिट्टी का विसर्जन न हो, बल्कि एक वृक्ष का जन्म हो और हमारे भीतर विवेक, करुणा, संतुलन तथा प्रकृति-प्रेम का बीज भी अंकुरित हो।
उन्होंने कहा कि श्री गणेशजी की प्रतिमा को घर में स्थापित करना हमारी परंपरा है, लेकिन उन्हें अपने भीतर प्रकट करना सनातन का रहस्य है। गणेश चतुर्थी केवल उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि यह प्रकृति-सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और आत्म-जागरण का पर्व बने।
टेम्स के तट पर सम्पन्न इस दिव्य गंगा आरती ने भारतीय संस्कृति और सनातन आध्यात्मिक परंपरा के उस संदेश को पुनः जीवंत किया, जो संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हुए विश्व कल्याण और सर्वजन सुखाय की कामना करता है।







0 Comments