देवभूमि जेके न्यूज 17 अगस्त 2026-
ऋषिकेश। उत्तराखंड के प्रमुख लोकपर्वों में शामिल घी संक्रांति (घ्यू त्यार) ग्रामीण क्षेत्रों में हर्षोल्लास एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। कृषि, पशुधन एवं पर्यावरण से जुड़ा यह लोकपर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और पहाड़ी जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ. राजे नेगी ने घी संक्रांति के अवसर पर प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति और विरासत में अनेक ऐसे लोकपर्व हैं, जिनका प्रकृति एवं ग्रामीण जीवन से गहरा संबंध रहा है। घी संक्रांति भी इन्हीं महत्वपूर्ण लोकपर्वों में से एक है। कुमाऊं मंडल में इसे ‘घी त्यार’ तथा गढ़वाल मंडल में ‘घी संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है।
डॉ. नेगी ने कहा कि विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में यह पर्व कृषि, पशुपालन और प्रकृति के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन लोग पूजा-पाठ कर अच्छी फसल, पशुधन की समृद्धि एवं परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। घरों में घी से बने विभिन्न पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं तथा परिवार और समाज के साथ मिलकर पर्व की खुशियां साझा की जाती हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए नई पीढ़ी को अपने पारंपरिक त्योहारों, लोक मान्यताओं और रीति-रिवाजों से जोड़ना बेहद आवश्यक है। आधुनिकता के दौर में ऐसे लोकपर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों से जुड़े रहने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
डॉ. राजे नेगी ने कहा कि घी संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य, कृषि, पशुधन और हमारी लोकपरंपराओं के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का संदेश देने वाला पर्व है। ऐसे पर्व समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करते हैं।
अंत में उन्होंने प्रदेशवासियों को घी संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पावन लोकपर्व सभी के जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, शांति और खुशहाली लेकर आए तथा उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक निरंतर आगे बढ़ती रहें।उत्तराखंड की लोक मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाना जरूरी होता है।






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