देवभूमि जे के न्यूज, डोईवाला, 14 सितंबर 2026। स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय (एसआरएचयू) के वाटर एंड सैनिटेशन (वाटसन) विभाग की ओर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), नई दिल्ली के सहयोग से ‘जल एवं स्वच्छता का अधिकार-हिमालयी क्षेत्र में सुजलाम और सतत जल शासन के लिए युवाओं की भागीदारी’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया। सेमिनार में देशभर के विशेषज्ञों ने जल एवं स्वच्छता को मानवाधिकार से जोड़ते हुए हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा, जल संरक्षण, सतत जल शासन और युवाओं की सक्रिय भागीदारी पर व्यापक मंथन किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एसआरएचयू के महानिदेशक (शैक्षणिक) डॉ. विजेन्द्र चौहान ने सुरक्षित पेयजल को मानवाधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए सतत विकास लक्ष्य-6 की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जल सुरक्षा आज केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसके लिए युवाओं को जागरूक होकर बदलाव का वाहक बनना होगा।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. राजेंद्र डोभाल ने जल सुरक्षा और जल गुणवत्ता से जुड़ी विश्वविद्यालय की विभिन्न पहलों की जानकारी दी। उन्होंने रिवर बैंक फिल्ट्रेशन और जल गुणवत्ता परीक्षण जैसे प्रयासों का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्रों में भू-जनित प्रदूषण से उत्पन्न चुनौतियों पर भी चर्चा की।
उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग के सदस्य हरि चंद सेमवाल ने कहा कि सुरक्षित जल और स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक जागरूकता के साथ सामुदायिक भागीदारी बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि केवल शौचालयों का निर्माण कर देने से स्वच्छता सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उचित अपशिष्ट प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और निजता से जुड़े स्वच्छता के पहलुओं के साथ ग्रे-वॉटर प्रबंधन और जल पुनर्भरण पर भी जोर दिया।
उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की महानिदेशक (अन्वेषण) अनुपमा निलेकर चंद्रा ने ऑनलाइन माध्यम से मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि जल मानवाधिकारों की आधारभूत आवश्यकता है। सम्मानजनक जीवन के लिए स्वच्छता भी उतनी ही आवश्यक है। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती जल कमी को देखते हुए प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और योजनाओं के प्रभावी जमीनी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
सेमिनार में विश्वविद्यालय के विभिन्न संस्थानों के छात्र-छात्राओं के साथ जल एवं स्वच्छता, मानवाधिकार, पर्यावरण, प्रशासन और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया।
जल शासन और जल सुरक्षा पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
सेमिनार के दौरान आयोजित पैनल विमर्श में डी.पी. गैरोला, डॉ. ए. शरीफ, प्रशांत कुमार राय और प्रो. एच.पी. उनियाल ने जल एवं स्वच्छता के अधिकार, जल सुरक्षा, जल संरक्षण और जल शासन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए। तकनीकी सत्र में डॉ. तरुणा गौतम, डी.के. सिंह, डॉ. प्रशांत सिंह और डॉ. रमेश बडोला ने समुदाय आधारित जल प्रबंधन, जल सुरक्षा तथा युवाओं की भागीदारी पर चर्चा की।
दूसरे पैनल विमर्श में पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, आशुतोष त्रिपुरारी सिंह, डॉ. राजीव बिजल्वाण, डॉ. गरिमा कपूर और नितेश कौशिक ने युवा नेतृत्व, नवाचार, तकनीक और सतत जल शासन को लेकर अपने विचार रखे। विशेषज्ञों ने कहा कि जल संकट से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
जलवायु अनुकूलन, जल सुरक्षा एवं सतत जल प्रबंधन पर आयोजित तकनीकी सत्र में डॉ. अविनाश चंद्र जोशी, द्वारिका प्रसाद सेमवाल, डॉ. विनोद कोठारी, निखिल पंत, डॉ. गौरव और नितेश कौशिक ने जलवायु अनुकूल वाटरशेड प्रबंधन, जल सुरक्षा, सामुदायिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान, स्प्रिंगशेड विकास और सतत जल प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
सेमिनार में विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हिमालयी क्षेत्रों में जल स्रोतों का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों, युवाओं, शिक्षण संस्थानों और विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी। प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण, वर्षाजल संचयन, जल पुनर्भरण, अपशिष्ट प्रबंधन और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी को जनभागीदारी से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय सेमिनार ने जल एवं स्वच्छता के अधिकार को मानवाधिकार के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए हिमालयी क्षेत्र के लिए सतत जल शासन की दिशा में युवाओं की भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा। कार्यक्रम का संदेश रहा कि जल बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सामूहिक जिम्मेदारी है।







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