दैव भूमि जे के न्यूज,ऋषिकेश, 21 अक्टूबर 2026।** परमार्थ निकेतन में आयोजित नवरात्रि रिट्रीट में विश्व के विभिन्न देशों से आए योग एवं आध्यात्मिक जिज्ञासुओं ने सहभाग कर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, योग, ध्यान और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन को निकट से जाना। माँ गंगा के पावन तट और हिमालय की दिव्य छत्रछाया में आयोजित इस रिट्रीट में नौ देशों के 70 से अधिक साधकों ने भाग लिया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं साध्वी भगवती सरस्वती के सान्निध्य में प्रतिभागियों ने नवरात्रि के आध्यात्मिक महत्त्व को समझने के साथ आत्मचिंतन, साधना और भारतीय जीवन मूल्यों का अनुभव किया।
परमार्थ निकेतन में नवरात्रि के दौरान भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण वातावरण रहा। गंगा तट पर मंत्रोच्चार, यज्ञ की पवित्र अग्नि, सामूहिक प्रार्थना, ध्यान और संध्या गंगा आरती ने प्रतिभागियों को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ने का अवसर प्रदान किया। दीपों से आलोकित गंगा तट और सामूहिक साधना के बीच विदेशी साधकों ने भारतीय संस्कृति की उस जीवनदृष्टि को समझा, जिसमें आत्मिक शांति, प्रकृति के प्रति सम्मान और मानवता के कल्याण को विशेष महत्त्व दिया गया है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने संदेशों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक दर्शन और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को रेखांकित किया। उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के उस संदेश को सामने रखा, जो समस्त विश्व को एक परिवार मानते हुए विविधताओं के बीच एकता, संवाद, सहयोग और सह-अस्तित्व की प्रेरणा देता है। वर्तमान समय में जब दुनिया विभिन्न चुनौतियों, तनावों और अनिश्चितताओं का सामना कर रही है, तब योग, ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से आंतरिक शांति स्थापित करने का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
साध्वी भगवती सरस्वती के मार्गदर्शन में प्रतिभागियों ने ध्यान, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अनुशासन के महत्त्व को जाना। नवरात्रि में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना के माध्यम से शक्ति, साहस, करुणा और सकारात्मकता के संदेश को समझा गया। साधकों को यह अनुभव करने का अवसर मिला कि आध्यात्मिकता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों, भावनाओं और व्यवहार में जागरूकता लाकर जीवन को अधिक संतुलित, संवेदनशील और सार्थक बनाने का मार्ग भी है।
रिट्रीट के दौरान योगासन, प्राणायाम, ध्यान, प्रातःकालीन यज्ञ, आध्यात्मिक परिचर्चा, आयुर्वेद से संबंधित सत्र, प्रकृति के साथ जुड़ाव, सृजनात्मक कार्यशालाएँ, पवित्र हवन, गंगा आरती और कीर्तन सहित विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया गया। इन गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों को भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को समझने और उन्हें अपने जीवन से जोड़ने का अवसर मिला।
कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण **योग गरबा** रहा, जिसमें अनिश रंगरेज ने प्रतिभागियों को गरबा कराया। भारतीय लोकसंस्कृति, संगीत और सामूहिक उत्साह से जुड़े इस आयोजन ने नवरात्रि के उल्लास को और भी जीवंत बना दिया। विभिन्न देशों से आए साधकों ने भारतीय परंपराओं के इस रंगीन और आनंदपूर्ण स्वरूप का अनुभव किया। वहीं, माँ गंगा के तट पर आयोजित संध्या आरती प्रतिभागियों के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभूति का अवसर बनी। गंगा की लहरों पर झिलमिलाते दीप, मंत्रों की गूंज और सामूहिक प्रार्थना ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
इस रिट्रीट में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, भारत, इजराइल, इटली, मेक्सिको, स्पेन और अमेरिका सहित नौ देशों के प्रतिभागियों ने सहभाग किया। इनमें ऑस्ट्रेलिया से संतोष बार्ता और शेया अन्ना स्पिरेवका; कनाडा से इंदिरा मिश्रा; जर्मनी से क्लाउडिया सेनहेन और झन्ना बोचकारोवा; भारत से अंकित शाह, अक्षय महाजन, चिंतन शेट्टी, डॉ. सुरेश चंदर शर्मा, एरेज़ फेरीम्यूटर, कृति गुप्ता, इंदु पटियाल, नवीनकुमार सिन्हा, प्रिंस नागपाल, राजीव पटोदिया, राम करण मकर, वैभव वर्मा और विनोद कुमार; इजराइल से राजेंद्र गुमानी; इटली से अगुस्तिना लूना; मेक्सिको से इहाली ओर्टेगा पुलिडो; स्पेन से डोमिनिक एलिजाबेथ यानेज़ डियाज़ तथा अमेरिका से क्रिस्टिन टॉम्पकिन्स, रॉबिन जे. क्रीच और सुज़ाना डेटन शामिल रहे।
परमार्थ निकेतन का नवरात्रि रिट्रीट भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन-दर्शन की वैश्विक स्वीकार्यता का परिचायक बना। यहाँ प्रतिभागियों ने योग, ध्यान, सेवा, भक्ति और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाली भारतीय परंपराओं को समझा। इस तरह के आयोजन प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ते हुए विश्वभर के लोगों को आत्मचिंतन, शांति और सद्भाव की दिशा में प्रेरित करते हैं।
माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन वर्षों से देश-विदेश के साधकों और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम रहा है। नवरात्रि रिट्रीट के माध्यम से भी यही संदेश दिया गया कि वास्तविक शांति की शुरुआत व्यक्ति के भीतर से होती है और जब व्यक्ति करुणा, प्रेम, सेवा तथा प्रकृति के सम्मान को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है, तभी वैश्विक सद्भाव की भावना मजबूत होती है।






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