देवभूमि जे के न्यूज-
(डॉ. राघवेन्द्र शर्मा-विभूति फीचर्स)
एक समय था जब लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में दिल दहला देने वाली सियासी खबरें समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर सुर्खियां बनी रहती थीं। उदाहरण – फलां राज्य में बूथ कैप्चरिंग हो गई। लोकतंत्र के लुटेरों द्वारा मतदान कार्य में लगे कर्मचारियों, अधिकारियों, पोलिंग बूथ एजेंटों और यहां तक की मतदाताओं की सामूहिक हत्याओं के समाचार प्रमुखता लिए रहते थे। कुछ ही मिनटों में फर्जी मत पत्रों से भरी हुई पेटियों को मतदान केंद्रों में रखकर, असली मत पेटियों और मतपत्रों को या तो आग लगाकर जला दिया जाता था अथवा उन्हें नदियों, तालाबों और कुओं में फेंक दिया जाता था।
उन घटनाओं को भी स्मरण रखना आवश्यक है जो बताती थीं कि मतदान केंद्र लूटने वालों के आतंक के चलते असली मतदाता का मतदान केंद्रों तक पहुंचना असंभव सा हो जाता था। जबकि उनके नाम पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुंडों, मवालियों और लुटेरों द्वारा फर्जी मतदान कर दिया जाता था। लिखने में कोई हिचक नहीं कि लंबे समय तक भारतीय लोकतंत्र में एक कालखंड ऐसा भी रहा, जब मतदान केंद्रों पर गोलीबारी, हत्या, आतंक और लूटपाट एक प्रकार से चुनावी रस्म ही बन गए थे।
अतः यह कहा जा सकता है कि भारत के चुनावी इतिहास में मतदान केंद्रों की लूट लोकतंत्र पर एक बड़ा काला धब्बा रही है। तत्समय सरकारों पर काबिज रहे वे, और सरकारों पर काबिज होने के लिए लालायित अधिकांश राजनीतिक दलों में मानो बूथ कैप्चरिंग की होड़ मची रहती थी। दावे के साथ लिखा जा सकता है कि इस तरह की लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों से भारतीय जनता पार्टी जो तत्समय भारतीय जनसंघ हुआ करती थी, का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था, ना आज है और भविष्य में ना कभी होगा। लेकिन जो लोग आज लोकतंत्र की हत्या, संविधान का अपमान, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की बेईमानी, एसआईआर से वोट चोरी, चुनाव आयोग की फूट आदि अफवाहें उड़ाकर भारतीय मतदाताओं को बरगलाने की जी तोड़ कोशिशों में लगे हुए हैं, उनमें से अधिकांश का वास्ता बूथ कैप्चरिंग अर्थात मतदान केंद्रों की लूट से बना रहा है।
उदाहरण के लिए बताना उचित रहेगा कि भारत में पहली बूथ कैप्चरिंग की घटना 1957 के दूसरे आम चुनाव के दौरान बिहार के बेगूसराय जिले के मटिहानी विधानसभा क्षेत्र के रचियाही गांव में दर्ज की गई थी। वहां मुकाबला कांग्रेस के सरयुग प्रसाद सिंह और कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के चंद्रशेखर सिंह के बीच था। कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन में स्थानीय बाहुबली और माफिया डॉन कामदेव सिंह ने अपने करीब 20 सशस्त्र गुंडों के साथ पोलिंग बूथ पर धावा बोल दिया। उन्होंने विरोधी पार्टी के समर्थकों को वोट देने से रोका, मतपेटियों को बंदूक की नोक पर छीन लिया और जमकर फर्जी मतदान कराया। बाद में मतपेटियों को एक कुएं में फेंक दिया गया था।
वर्ष 1957 की इस घटना के बाद अपराधियों के बलबूते पर चुनाव जीतने वालों को समझ आ गया कि बंदूक की नोंक पर सत्ता की चाबी हासिल की जा सकती है। बस फिर क्या था? 1970 और 1980 के दशक में राजनीतिक दलों ने बड़े पैमाने पर स्थानीय अपराधियों को संरक्षण देना शुरू किया। चुनाव के दिन हथियारबंद गुंडे गाड़ियों में भरकर आते थे, मतदान अधिकारियों को बंधक बनाते थे, नहीं मानने पर उन्हें घायल करते, यहां तक कि उनकी हत्या भी कर देते थे। हथियारों की नोक पर ये राजनीतिक लुटेरे सभी बैलेट पेपर्स पर अपनी पार्टी का ठप्पा मारकर मतपेटियों में भर देते थे। चुनाव में धांधली इस कदर बढ़ गई थी कि 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयोग को देश के 63 बूथों पर पुनर्मतदान कराना पड़ गया था, जिनमें से 53 मतदान केंद्र अकेले बिहार में थे। वहीं 1984 के चुनाव तक देश भर में पुनर्मतदान के मामले बढ़कर 264 हो गए।
स्वयं को समाजवादी कहने वाले, देश को आजादी दिलाने का दावा करने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल शुरुआत में तो गुंडों को भाड़े पर लेते थे, लेकिन 1980 के दशक के अंत तक राजनीति का अपराधीकरण, या यूं कहें कि अपराधियों का राजनीतिकरण चरमोत्कर्ष तक पहुंच गया। फलस्वरूप जो कल तक लोकतंत्र के लुटेरे हुआ करते थे, वह तेजी से विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी बनते चले गए। ये शस्त्रधारी बाहुबली आतंक के बलबूते पर जीतते हुए लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में जनप्रतिनिधि बनकर पहुंचते गए।
आखिरकार बढ़ती चुनावी हिंसा और बूथ लूट की घटनाओं को रोकने के लिए चुनाव आयोग को 1989 में कड़े कदम उठाने पड़ गए। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके बूथ कैप्चरिंग को कानूनन एक गंभीर संज्ञेय अपराध घोषित किया गया। इसके तहत दोषी को एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया। इसमें सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी के शामिल होने पर उनके लिए भी 3 से 5 साल की सजा का प्रावधान किया गया। बूथ पर लूट की शिकायत सही पाए जाने पर वहां का मतदान तुरंत रद्द कर पुनर्मतदान कराने की प्रक्रिया अपनाई गई।
फिर भी लोकतांत्रिक लुटेरे पूरी तरह नियंत्रित नहीं हुए, तब 1990 में टी.एन. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद भारतीय चुनावों की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। उन्होंने सख्त कदम उठाए। संवेदनशील इलाकों में भारी मात्रा में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई। मतदान एकमुश्त की बजाय कई चरणों में कराए जाने लगे ताकि सुरक्षा बलों को हर बूथ पर तैनात किया जा सके। और अधिक कसावट लाने के लिए मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य किया गया।
विभिन्न सर्वेक्षणों के बाद यह सच्चाई पूरे देश ने मानी कि बूथ लूटने की सबसे बड़ी वजह कागजी मतपत्र थे, जिन्हें एक साथ थोक में मुहर लगाकर बक्से में डालना आसान था। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का प्रयोग शुरू हुआ और 1990 के दशक के अंत तक इसे पूरी तरह लागू कर दिया गया। अभी जो ईवीएम मशीनें प्रयोग में लाई जा रही हैं उनमें प्रोग्रामिंग ऐसी है कि हर एक वोट दर्ज होने के बीच कम से कम 5 सेकंड का समय लगता है। ऐसे में गुंडे कुछ ही मिनटों में सैकड़ों फर्जी वोट नहीं डाल सकते, जैसा बैलेट पेपर के समय होता था। यदि कोई जबरन बूथ में घुसता है, तो मतदान अधिकारी तुरंत मशीन का क्लोज बटन दबा देता है, जिसके बाद मशीन पूरी तरह लॉक हो जाती है और कोई नया वोट नहीं डाला जा सकता। आज के समय में केंद्रीय बलों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरों की निगरानी, ड्रोन जैसी डिजिटल तकनीकों के कारण मतदान केंद्रों की लूट लगभग न के बराबर या बेहद दुर्लभ हो चुकी है।
इसके बाद सबसे बड़ी समस्या सामने यह आई कि लंबे समय से मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण ना होने से उन लोगों के नाम सूचीबद्ध बने रहे जो मर गए या अन्यत्र चले गए। फिर फर्जी तरीके से देश के बाहर से आए घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों में जोड़ दिए गए। आश्चर्य की बात यह कि इन सभी के नाम पर निरंतर उन पोलिंग बूथों पर मतदान होता रहा, जहां वे पूर्व में रहा करते थे। फर्जी मतदाताओं का मतदान लगभग शत-प्रतिशत होता चला गया। इस फर्जी मतदान ने भारतीय लोकतंत्र में बड़े पैमाने पर असंतुलन पैदा किया। फलस्वरूप कई राज्यों के चुनावों में, यहां तक कि लोकसभा मतदान के दौरान मतदाताओं का असल निर्णय दुष्प्रभावित होता चला गया। लेकिन जब एसआईआर यानि मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण (स्पेशल इंटेसिव रिवीजन) शुरू हुआ तो वे सभी फर्जी नाम करोड़ों की संख्या में छंट गए। नतीजा यह निकला कि अब जो चुनाव हो रहे हैं वह फर्जी मतदान के दुष्प्रभावों से मुक्त हैं। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से जनादेश भी राष्ट्र प्रथम की सोच रखने वाले राजनीतिक दलों के पक्ष में स्पष्ट रूप से दृष्टव्य होने लगा है।
जाहिर है इस प्रक्रिया से वे सभी ताकतें खिन्न हैं जो कभी बूथ कैप्चरिंग के माध्यम से सरकारें हथियाती रहीं। जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों ने लोकतांत्रिक डकैती को खत्म कर दिया तो यह ताकतें लंबे समय तक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और चुनाव आयोग को दोषी बताती रहीं। देश की लगभग डेढ़ अरब जनता ने जब विपक्षी दलों की इन मनगढ़ंत अफवाहों को पूरी तरह से नकार दिया तो अब इन लोगों ने एसआईआर को निशाने पर लिया है। क्योंकि अब मतदाता सूची शुद्धिकरण की प्रक्रिया ने पिछले दरवाजे से सरकारों में घुसपैठ बनाए रखने के उनके षड्यंत्रों को तहस-नहस करके रख दिया है।
शर्म की बात यह है कि अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए अब इन अति महत्वाकांक्षी विपक्षी दलों ने युवाओं को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है। देश के जिन डेढ़ अरब नागरिकों ने विकसित भारत 2047 का संकल्प मन में संजोए रखा है, वे सब ध्यान से विपक्षी दलों के पूरे सियासी षड्यंत्र को देख-समझ रहे हैं। यदि वे खामोश हैं तो उनके इस शांतिप्रिय बर्ताव को कम से कम कायरता तो नहीं समझा जाना चाहिए। यह बिल्कुल सत्य नहीं है कि राष्ट्र प्रथम की सोच रखने वाले लोगों को झूठ और लफ्फाजी का विरोध करना नहीं आता। सत्य तो यह है कि देश का अधिसंख्य जनमानस राष्ट्रीय स्तर पर बेवजह बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहता। क्योंकि वह जानता है कि यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जिस गति से मिशन 2047 की ओर बढ़ रहा है, उससे उन वैश्विक ठेकेदारों के पेट में दर्द है जो पूरी दुनिया पर अपनी नेतागिरी बनाए रखना चाहते हैं। दरअसल उन्हीं ताकतों के भारी निवेश के चलते हमारे भारत में देश और विभिन्न प्रदेशों की राष्ट्र प्रथम की सोच वाली सरकारों का बड़े पैमाने पर विरोध स्थापित करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। लेकिन इन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। *(विभूति फीचर्स)*







0 Comments