देवभूमि जे के न्यूज,रायवाला।
प्रतीत नगर गांव के वार्ड नंबर-6 स्थित प्राथमिक विद्यालय, श्रीरामलीला चौक में लोक कल्याण समिति के तत्वावधान में आयोजित पंचम श्रीरामलीला महोत्सव में बुधवार, 28 अक्टूबर को भगवान श्रीराम के वनवास काल से जुड़े छह प्रमुख प्रसंगों का भावपूर्ण मंचन किया गया। अत्रि एवं शृंगी आश्रम, श्रीराम-जटायु भेंट, पंचवटी, शूर्पणखा प्रसंग, खर-दूषण वध और रावण-मारीच संवाद के मंचन ने दर्शकों को रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं से रूबरू कराया। कलाकारों के सजीव अभिनय, सुंदर गायन और प्रभावशाली संवादों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
रामलीला महोत्सव के मुख्य मंच उद्घोषक एवं लोक कल्याण समिति के प्रवक्ता विरेन्द्र नौटियाल (वीरू) ने बताया कि लीला के प्रारंभ में भरत से भेंट के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की वन यात्रा को आगे बढ़ते हुए दिखाया गया। वन में ऋषि अत्रि के आश्रम पहुंचने पर भगवान श्रीराम और माता सीता का आदर-सत्कार किया जाता है। माता अनुसूया, सीता को पत्नी धर्म का ज्ञान देने के साथ वनवास के दौरान जीवन निर्वहन की सीख देती हैं और उन्हें वस्त्र एवं आभूषण भेंट करती हैं।
इसके बाद श्रीराम की भेंट गिद्धराज जटायु से होती है। जटायु स्वयं को राजा दशरथ का मित्र बताते हुए वन में उनकी रक्षा का आश्वासन देते हैं। उनकी सलाह पर भगवान श्रीराम पंचवटी में निवास करने का निर्णय लेते हैं, जहां लक्ष्मण सुंदर पर्णकुटी का निर्माण करते हैं।
रामलीला में इसके बाद राक्षसी शूर्पणखा के प्रसंग का मंचन किया गया। पंचवटी में भगवान श्रीराम को देखकर शूर्पणखा उन पर मोहित हो जाती है और सुंदर नारी का रूप धारण कर विवाह का प्रस्ताव रखती है। श्रीराम द्वारा माता सीता का परिचय देने और लक्ष्मण के भी प्रस्ताव अस्वीकार करने पर वह क्रोधित हो जाती है। सीता पर आक्रमण करने का प्रयास करने पर लक्ष्मण भगवान श्रीराम के संकेत से शूर्पणखा की नाक काट देते हैं। अपमानित शूर्पणखा बदला लेने की चेतावनी देकर वहां से चली जाती है।
इसके बाद शूर्पणखा अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुंचकर उन्हें राम-लक्ष्मण के विरुद्ध भड़काती है। दोनों राक्षस अपनी सेना के साथ आक्रमण करते हैं, लेकिन भगवान श्रीराम अपने पराक्रम से राक्षसी सेना को पराजित कर देते हैं। अंततः खर-दूषण का वध होता है। इस युद्ध प्रसंग का कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से मंचन किया, जिसे देखकर दर्शकों ने जय श्रीराम के उद्घोष के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
रामलीला के अंतिम प्रमुख प्रसंग में शूर्पणखा रावण के दरबार में पहुंचकर अपने अपमान की कहानी सुनाती है। विभीषण रावण को बिना पूरी जानकारी के कोई निर्णय नहीं लेने की सलाह देता है, लेकिन शूर्पणखा की बातों से क्रोधित रावण सीता हरण की योजना बनाता है। वह अपने मामा मारीच के पास जाकर उसकी सहायता मांगता है। भगवान श्रीराम की शक्ति से परिचित मारीच रावण को समझाने का प्रयास करता है, लेकिन रावण के दबाव के आगे उसे उसकी बात माननी पड़ती है। रावण-मारीच संवाद के इस प्रसंग ने आगामी घटनाक्रम के प्रति दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा दी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री शूरवीर सिंह सजवाण, पौड़ी गढ़वाल के ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि एवं नमामि गंगे के प्रदेश सहसंयोजक संजीव चौहान तथा हरिपुर कला की ग्राम प्रधान सविता शर्मा उपस्थित रहे। लोक कल्याण समिति की ओर से अतिथियों को रामदरबार की माला, प्रतीक चिह्न और रामदरबार का चित्र भेंट कर सम्मानित किया गया।
रामलीला के दौरान शूर्पणखा नासिका छेदन, खर-दूषण वध, त्रिसरा प्रसंग और साधु मारीच-रावण संवाद का मंचन विशेष आकर्षण रहा। उपस्थित सैकड़ों रामभक्तों ने कलाकारों के अभिनय और गायन की सराहना करते हुए उनका उत्साहवर्धन किया। देश-विदेश में रहने वाले दर्शकों ने भी ऑनलाइन प्रसारण के माध्यम से घर बैठे रामलीला का आनंद लिया और संदेशों के जरिए आयोजन की प्रशंसा की।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में लोक कल्याण समिति के प्रवक्ता विरेन्द्र नौटियाल (वीरू), मुख्य निर्देशक महेंद्र राणा, अध्यक्ष गंगाधर गौड़, उपाध्यक्ष बालेन्द्र सिंह नेगी, सचिव नरेश थपलियाल, कोषाध्यक्ष मुकेश तिवाड़ी सहित समिति के सदस्यों का योगदान रहा।
इस अवसर पर आशीष सेमवाल, राजेन्द्र प्रसाद रतूड़ी, नवीन चमोली, राम सिंह, आचार्य संजय सेमवाल, राजेश जुगलान, राजेन्द्र कुकरेती, गंगा बहादुर, सुनील तिवाड़ी, अरुण डबराल, त्रिलोक सिंह, रमेश क्षेत्री, अनीता जुगलान, रुचि सती, रेखा थपलियाल, रेखा तिवाड़ी, रोहित, मोहन और ईशांत सहित सैकड़ों रामभक्त उपस्थित रहे।







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