उत्तराखंड

तीन अंकों से छूटा था सपना, 18 साल बाद पहले प्रयास में NEET पास कर एमबीबीएस सीट: हिम्स की स्ट्रोक काउंसलर डॉ. दीपिका खांडूजा की प्रेरक कहानी

देहरादून — देवभूमि जेके न्यूज़ डेस्क जिस उम्र में ज़्यादातर लोग अपने अधूरे सपनों को भूलकर ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों में रम जाते हैं, उस उम्र में डॉ. दीपिका…

तीन अंकों से छूटा था सपना, 18 साल बाद पहले प्रयास में NEET पास कर एमबीबीएस सीट: हिम्स की स्ट्रोक काउंसलर डॉ. दीपिका खांडूजा की प्रेरक कहानी

देहरादून — देवभूमि जेके न्यूज़ डेस्क

जिस उम्र में ज़्यादातर लोग अपने अधूरे सपनों को भूलकर ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों में रम जाते हैं, उस उम्र में डॉ. दीपिका खांडूजा ने दोबारा किताबें उठाईं और अपने पहले ही प्रयास में NEET पास कर उत्तराखंड स्टेट कोटे से देहरादून मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की सीट हासिल कर ली। यह उपलब्धि इसलिए और खास है क्योंकि करीब 18 साल पहले मेडिकल प्रवेश परीक्षा में वे सिर्फ तीन अंकों से पीछे रह गई थीं।

डॉ. दीपिका फिलहाल हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (हिम्स), जौलीग्रांट के न्यूरोलॉजी विभाग में स्ट्रोक काउंसलर के रूप में कार्यरत हैं।

तीन अंक, जिन्होंने रास्ता बदल दिया

डॉ. दीपिका ने 2008 से 2013 के बीच बीडीएस (डेंटल) की पढ़ाई की। उस समय उनका सपना न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में चिकित्सक बनने का था, लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा में वे महज तीन अंकों से चूक गईं। 2016 में विवाह हुआ, फिर बेटे का जन्म — और परिवार की ज़िम्मेदारियां बढ़ती गईं। आमतौर पर यहीं कहानी खत्म हो जाती है। लेकिन दीपिका ने सपने को ज़िंदा रखा और आईसीएमआर प्रोजेक्ट के तहत स्ट्रोक काउंसलर के रूप में हिम्स के न्यूरोलॉजी विभाग से जुड़कर अपने लक्ष्य की दिशा में पहला कदम बढ़ाया।

एक मार्गदर्शक, जिसने क्षमता पहचानी

न्यूरोलॉजी विभाग में काम करते हुए वरिष्ठ न्यूरो चिकित्सक डॉ. दीपक गोयल ने उनकी क्षमता और सीखने की ललक को पहचाना। दीपिका बताती हैं कि डॉ. गोयल ने उन्हें दोबारा मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए लगातार प्रेरित किया। माता-पिता, परिजनों और सहयोगियों ने भी हौसला बढ़ाया।

18 साल के अंतराल के बाद NEET की तैयारी आसान नहीं थी — दीपिका इसे “एक पहाड़ खोदने जैसा” अनुभव बताती हैं। पाठ्यक्रम बदल चुका था, प्रतिस्पर्धा कई गुना बढ़ चुकी थी, और घर-परिवार व नौकरी की ज़िम्मेदारियां भी साथ थीं। लेकिन लगातार मेहनत रंग लाई: पहले ही प्रयास में उन्होंने अच्छी रैंक के साथ NEET क्वालिफाई किया और स्टेट कोटे से एमबीबीएस सीट पाई।

“एक परीक्षा ज़िंदगी का फैसला नहीं होती”

दीपिका की यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब NEET के नतीजों और परीक्षा के दबाव से जुड़ी कई दुखद घटनाओं ने अभिभावकों और समाज को सोचने पर मजबूर किया है। वे कहती हैं कि परीक्षा को लेकर तनाव होना स्वाभाविक है, लेकिन असफलता को जीवन की असफलता नहीं मानना चाहिए। कभी मंज़िल तक पहुंचने में समय लगता है, कभी रास्ता बदलना पड़ता है, और कभी दोबारा शुरुआत करनी पड़ती है।

ध्यान और सकारात्मक सोच बनी ताकत

अपनी सफलता में दीपिका आध्यात्मिक अनुशासन और सकारात्मक सोच की बड़ी भूमिका मानती हैं। परीक्षा से पहले वे नियमित ध्यान करती थीं और मानती हैं कि पढ़ाई के साथ मन को शांत रखना भी उतना ही ज़रूरी है। वे अपनी सफलता का श्रेय एचआईएचटी के संस्थापक ब्रह्मलीन डॉ. स्वामी राम की शिक्षाओं को भी देती हैं।

“परीक्षा जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं” — डॉ. विजय धस्माणा

स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. विजय धस्माणा ने डॉ. दीपिका को बधाई देते हुए कहा कि उनकी सफलता साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर मेहनत और सही मार्गदर्शन से कठिन से कठिन लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि किसी परीक्षा में सफलता या असफलता व्यक्ति की पूरी क्षमता और भविष्य तय नहीं करती; विद्यार्थियों को अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

उत्तराखंड के उन हज़ारों छात्रों के लिए, जो हर साल NEET की तैयारी करते हैं, डॉ. दीपिका की कहानी एक सीधा संदेश है: देर हो सकती है, लेकिन रास्ता बंद नहीं होता।

Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1 Static 1
Discussion

0 Comments

Join the conversation

Share your view on this story. Your email address will not be published.