उत्तराखंड

*गैस तेरे रूप अनेक*

(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स) समस्या गैस की हो, तो प्राथमिक स्तर पर परीक्षण अनिवार्य है, कि गैस किस प्रकार की है। समस्या पेट की गैस की है तो वैद्य…

(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)
समस्या गैस की हो, तो प्राथमिक स्तर पर परीक्षण अनिवार्य है, कि गैस किस प्रकार की है। समस्या पेट की गैस की है तो वैद्य हकीमों से अच्छा उपचार किसी अन्य के पास नहीं है,क्योंकि वे जानते हैं कि हर समस्या की जड़ पेट है, पेट में गैस और अफारा जैसी समस्या व्यक्ति का जीना दूभर कर देती है, स्वस्थ पेट से ही शरीर स्वस्थ रहता है। इसलिए कहते हैं कि पेट सफा हर रोग दफा लेकिन यदि खाना पकाने में मुख्य भूमिका निभाने वाली रसोई गैस की समस्या है, तो उसका समाधान गैस एजेंसियों के पास है।
माँग और पूर्ति का नियम उस पर लागू होता है। यदि माँग कम होगी, तो गैस सिलेंडर लेकर सप्लाई करने वाले दर दर घूमेंगे। यदि माँग अधिक होती है, तो तब गैस सप्लाई करने वालों के नखरे भी बढ़ जाते हैं । वे मनमानी करने लगते हैं और अपनी चौर्य कला का प्रयोग सिलेंडर से गैस चोरी करने, एक सिलेंडर से दूसरे सिलेंडर में गैस भरने जैसी क्रिया के माध्यम से करते हैं। कई बार घरेलू गैस सिलेंडर की बची हुई गैस व्यावसायिक सिलेंडर में भरते हैं।
मुद्दा यह है कि जहां भी ख़ालीपन हो, उसे गैस से भरने का प्रयास किया ही जाता है। बहरहाल गैस के भी अनेक प्रकार हैं। किसी भी शल्य क्रिया की सफलता गैस विसर्जन पर टिकी होती है। गैस विसर्जित न होने तक शल्य क्रिया की सफलता में संदेह रहता है। वैसे गैस के उत्पादन हेतु नित नए प्रयोग किए जाते हैं। एक समय था कि जब गाँवों में गोबर गैस संयंत्र बड़े ज़मींदारों के घेर में स्थापित किए जाते थे। जिसमें पशुओं के विसर्जित मल का प्रयोग करके गैस का उत्पादन किया जाता था, उस उत्पादन से जहां घर रोशन होते थे, वहीं गोबर गैस भोजन पकाने में गृहणियों का भरपूर साथ निभाती थी।
अब युग बदल गया है। गैस सिलेंडर निम्न और मध्यम वर्ग की मजबूरी हैं। अभिजात्य वर्ग की किचन तक पाइप लाइन के माध्यम से सीधे ही गैस सप्लाई होती है। न सिलेंडर बुक कराने का झंझट, न सिलेंडर की ढुलाई का झंझट फिर भी गैस डिमांड में रहती है। कभी कभी यह डिमांड अफ़वाहों के आधार पर भी बढ़ती है। इन अफ़वाहों के आधार पर जिन घरों में पाइप लाइन के माध्यम से सीधे गैस सप्लाई होती है, वे भी सिलेंडर की जुगाड़ में लग जाते हैं।
बहरहाल गैस पर राजनीतिक दल अलग से ही रोटी पकाने और चाय बनाने का जतन कर रहे हैं। कुछ खद्दर धारी तो नाले के निकट ही टी स्टाल खोलकर खड़े हो गए। नाले से गैस बनाने का ड्रामा करने लगे, मगर उनका हश्र वही हुआ जो अनाड़ी का खेलना खेल का सत्यानाश वाले का होता है। न उन्होंने गोबर गैस संयंत्र की तकनीकी का प्रयोग किया और न ही गैस बनाने की ट्रेनिंग ली। किसी किसी ने तो गैस की क़िल्लत का रोना रोते हुए भरे गैस के सिलेंडर के साथ वीडियो बनाई। किसी ने घर के संगमरमरी फ़र्श पर मिट्टी के चूल्हे बनाने का ड्रामा किया, मगर उपले लकड़ी का इंतज़ाम नही किया। गोया चूल्हा खाना पकाने के लिए नही, केवल रील बनाने के लिए ही बनाया गया हो। हर कोई गैस को अपने नज़रिए से देख रहा है।
छात्र गैस पेपर के नाम से बिकने वाली पतली पतली कितबिया से अपना स्वर्णिम भविष्य लिखने की फिराक में रहते हैं। कोई गैस की समस्या से निपटने के लिए ईनो का सेवन कर रहा है। कोई गैस को ईंधन के रूप में देख रहा है, तो कोई गैस में अन्य अनेक प्रयोग की संभावनाएँ तलाश रहा है। कोई गैस के आकार पर बहस करने पर आमादा है। यानी गैस एक प्रयोग अनेक। *(विनायक फीचर्स)*

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