देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) –
(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)
देवों के देव भगवान भोलेनाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता है। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हों, उपासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं। महाशिवरात्रि के विषय में मान्यता है कि इस दिन भगवान भोलेनाथ का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है। इस दिन शिव जी की उपासना और पूजा करने से शिव जी जल्दी प्रसत्र होते हैं।
वर्ष में 365 दिन होते हैं और लगभग इतनी ही रात्रियों भी। इनमें से कुछ चुनिंदा रात्रियां ऐसी होती हैं जिनका विशेष महत्व होता है। उन चुनिंदा रात्रियों में से महाशिवरात्रि ऐसी रात्रि है जिसका महत्व सबसे अधिक है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखकर शिवपूजन, शिव कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व ॐ नमः शिवाय का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन ब्राह्मणों को यथाशक्ति वस्त्र सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके संतुष्ट किया जाता हैं।
इस दिन व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शकर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्रान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिव पंचाक्षर (ओम् नमः शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती और परिक्रमा करें।
प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहा जाता है। इन शिवरात्रियों में सबसे प्रमुख है फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात में देवी पार्वती और भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था इसलिए यह शिवरात्रि वर्ष भर की शिवरात्रियों से उत्तम है।
महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। इसे हर साल फाल्गुन माह में 13वीं रात या 14वें दिन मनाया जाता है। इस त्योहार में श्रद्धालु पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना में भजन गाते हैं। कुछ लोग पूरे दिन और रात उपवास भी करते हैं। शिवलिंग को जल और बेलपत्र चढ़ाने के बाद ही वे अपना उपवास तोड़ते हैं।
शिवजी स्वयं कहते हैं कि ‘मैं बड़े-बड़े तपों से, बड़े-बड़े यज्ञों से, बड़े-बड़े दानों से, बड़े-बड़े व्रतों से इतना संतुष्ट नहीं होता हूँ जितना शिवरात्रि के दिन उपवास करने से होता हूँ।’ इस रात्रि से शंकर जी का विशेष स्नेह होने का एक कारण यह भी माना जाता है कि भगवान शंकर संहारकर्ता होने के कारण तमोगुण के अधिष्ठाता यानी स्वामी हैं। रात्रि जीवों की चेतना को छीन लेती है और जीव निद्रा देवी की गोद में सोने चला जा जाता है इसलिए रात को तमोगुणमयी कहा गया है। यही कारण है कि तमोगुण के स्वामी देवता भगवान शंकर की पूजा रात्रि में विशेष फलदायी मानी जाती है।
इस पर्व के बारे में ऐसा भी माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का रौद्र रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है। शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री संपत्ति प्रदान करते हैं। शिवरात्रि को शिव की पूजा करने के लिए शिव मंदिरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।
भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश पर्वत माना जाता है, लेकिन शिव समस्त जगत् में विचरण करते रहते हैं। अगर वे कैलाश पर्वत पर विचरण करते हैं, तो श्मशान में भी धूनी रमाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि शिवरात्रि को शिव संपूर्ण जगत् में विचरण करते हैं।
शिवरात्रि के दिन शिव का दर्शन करने से हजारों जन्मों का पाप मिट जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह महाशिवरात्रि के पर्व का महत्व ही है कि सभी आयु वर्ग के लोग इस पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इस दिन शिवभक्त काँवड़ में गंगाजी का जल भरकर शिवजी को जल चढ़ाते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन कुंवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए शिव जी की पूजा करती हैं। शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है। वे ऐसे देवता हैं जो विष स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और अमृत दूसरों के लिए छोड़ देते हैं। इसलिए शिव जगत् के उद्धारक हैं। इस तरह शास्त्र और पुराण कहते हैं कि महाशिवरात्रि की इस रात का सृष्टि में बड़ा महत्व है। शिवरात्रि को रात का विशेष महत्व होने की वजह से ही शिवालयों में रात के समय शिव जी की विशेष पूजा अर्चना होती है।
वास्तव में महाशिवरात्रि का पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है। महाशिवरात्रि के दिन व्रत धारण करने से सभी पापों का नाश होता है और मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति भी नियंत्रित होती है। निरीह लोगों के प्रति दयाभाव उपजता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार है-
*शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशन्*
*चाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायक*
कृष्ण चतुर्दशी के दिन इस पर्व का महत्व इसलिए अधिक फलदायी हो जाता है क्योंकि चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। ज्योतिष की दृष्टि से भी महाशिवरात्रि की रात्रि का बड़ा महत्व है। भगवान शिव के सिर पर चन्द्रमा विराजमान रहता है। चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात में चन्द्रमा की शक्ति लगभग पूरी तरह क्षीण हो जाती है। जिससे तामसिक शक्तियां व्यक्ति के मन पर अधिकार करने लगती हैं जिससे पाप प्रभाव बढ़ जाता है। भगवान शंकर की पूजा से मानसिक बल प्राप्त होता है जिससे आसुरी और तामसिक शक्तियों के प्रभाव से बचाव होता है। शिवरात्रि को ‘अहोरात्रि’ भी कहते हैं।
महिलाओं के लिए शिवरात्रि का विशेष महत्व है। अविवाहित महिलाएं भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें उनके जैसा ही पति मिले। वहीं विवाहित महिलाएं अपने पति और परिवार के लिए मंगल कामना करती हैं। यह भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व है।
शिवरात्रि के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। शिवरात्रि के महत्व को जानने के लिए हमें इन पौराणिक कथाओं को जानना होगा।
एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन माह का 14वां दिन भगवान शिव का प्रिय दिन है। इसलिए महाशिवरात्रि को इसी दिन मनाया जाता है।
समुद्र मंथन की पौराणिक कथा- सभी पौराणिक कथाओं में नीलकंठ शिव की कहानी सबसे ज्यादा चर्चित है। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान कालकेतु विष निकला था। भगवान शिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा के लिए स्वयं ही सारा विष पी लिया था। इससे उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना गया।
*महिलाओं के लिए महत्व*- ऐसा माना जाता है जब कोई महिला भगवान शिव से प्रार्थना करती है तो भगवान शिव उनकी प्रार्थना को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान शिव को पूजा में किसी विशेष सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती है। सिर्फ पानी और बेलपत्र के जरिए भी श्रद्धालु भगवान शिव को प्रसत्र कर सकते हैं।
*शिव के संग गौरी की भी हो पूजा*
धार्मिक मान्यतानुसार भगवान शंकर इस दिन संपूर्ण शिवलिंगों में प्रवेश करते हैं। शिव मनुष्य जीवन में सुख संपत्ति, ऋद्धि-सिद्धि, बल-वैभव, स्वास्थ्य, निरोगता, दीर्घायु, लौकिक-पारलौकिक सभी शुभ फलों के दाता हैं। शक्ति का हर रूप शिव के साथ ही निहित है। इसलिए महाशिवरात्रि पर शिव और शक्ति की संयुक्त रूप से आराधना करनी चाहिए। शिवरात्रि को आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए शिव और शक्ति का योग भी कहा गया है।
*सुहागिनों के भी आराध्य हैं शिव*
महाशिवरात्रि का पावन दिन सभी कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर और विवाहित महिलाओं को अखंड सुहाग का वरदान दिलाने वाला सुअवसर प्रदान करता है। अगर विवाह में कोई बाधा आ रही हो, तो भगवान शिव और जगत जननी के विवाह दिवस यानी महाशिवरात्रि पर इनकी पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
शिवरात्रि के दिन मंत्र जाप से भोले भंडारी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। शिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए। जाप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। जप के पूर्व शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए। शिव को पंचामृत से अभिषेक कराते हुए मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।
भीड़भाड़ में या यदि मंदिर में नहीं गये तो ऐसे में घर पर ही *ॐ नमः शिवाय* जप करें। मानसिक यानि मन से की हुई पूजा षोडशोपचार की पूजा से दस गुना ज्यादा लाभ मिलता है।
*महाशिवरात्रि पर करें भगवान् शिव की आराधना*
(पं. विशाल शास्त्री-विभूति फीचर्स)
देवाधिदेव महादेव,भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे शिवपुराण में बताया गया है, ये उपाय इतने सरल हैं कि इन्हें बड़ी ही आसानी से किया जा सकता है। हर समस्या के समाधान के लिए शिवपुराण में एक अलग उपाय बताया गया है।
ये उपाय इस प्रकार हैं-
शिवपुराण के अनुसार इन छोटे उपायों से भगवान शिव को आसानी से प्रसत्र किया जा सकता है:
* भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
* तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
* जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
* गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।
* बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है, सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा भगवान शिव को पूजा उत्तम बताई गई है।
* तीक्ष्ण बुद्धि के लिए शकर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।
* शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।
* शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
* शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से रोग में आराम मिलता है।
* यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर है तो उसे उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का अभिषेक गौमाता के शुद्ध घी से करना चाहिए ।
*भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है*
* लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
* चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
* अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।
* शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
* शिव को प्रसत्र करने के लिए डमरू जरूर बजाएं और बम-बम भोले बम-बम भोले कहने से कृपा मिलेगी।
* जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
* कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।
* हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।
* धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।
* लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है।
* दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।
*स्तुतियों से भी करें शिव आराधना*
* शिव सहस्त्रनामावली का पाठ करें।
* शिव की सबसे प्रचलित स्तुति है-
*कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारं*
*सदा वसन्तं हृदयारवृन्दे भवं भवानी सहितं नमामि !!*
* 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से नमः शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं, इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।
* शिवलिंग पर केशर मिला दूध चढ़ाने से विवाह कार्य में आ रही बाधा दूर होती है।
* नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में ‘राजा’ ‘महाराजा’ जैसी सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसत्र रहेगा।
* गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।
* सुबह जल्दी उठकर स्रान के बाद शिव मंदिर में भगवान शिव का जल से अभिषेक कर उन्हें काले तिल अर्पित करें तत्पश्चात मन ही मन में ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।
* किसी नदी या तालाब जाकर ऊँ नमः शिवाय का जप करते हुए आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं, यह धन प्राप्ति का बहुत ही सरल उपाय है।
* भगवान शिव को प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। इसके बाद धूप, दीप से आरती करें। प्रसाद को गुरुजनों, बुजुर्गों और परिवार, मित्र सहित ग्रहण करें।
* महामृत्युंजय मंत्र का जप 108 बार करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी।
* इस दिन द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र का पाठ करते हैं तो भगवान विष्णु प्रसत्र होते हैं।
* महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करते हैं तो माँ दुर्गा आपके रोग और ग्रह के दोष को नष्ट कर देती है।
* ॐ नमः शिवाय जपते हैं तो भगवान शिव स्वयं प्रसन्न होते हैं।
*महाशिवरात्रि: धर्म,शांति और मानवता की स्थापना का पर्व*
(चारु सक्सेना -विनायक फीचर्स)
महादेव शिव हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर तक सभी जगह व्याप्त हैं। भारत की वर्तमान सीमाओं के पार भी उनका प्रभाव है। हर श्रेणी के लोगों में वे मान्य हैं। अपने विविध रूपों, स्वरूपों और क्रिया-कलापों के कारण वे सारे संसार में व्याप्त हैं। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार शिव सही अर्थों में राष्ट्रीय देवता हैं। इस महादेवता के रूप में समूचे भारत का विश्वास मूर्तिवान हुआ है। दर्शन, काव्य, नाटक, नृत्य मूर्ति, चित्र, वास्तु, संगीत जो कुछ भी भारत की श्रेष्ठ देन है, उन सब पर ही इस महादेवता का प्रभाव है।
शिव ने अपने इन्हीं महान गुणों के कारण देश के पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक भारतवासियों को पिरोकर रखा है। सारा राष्ट्र इस नाम से जुड़ा है। शिव के साथ हमारे राष्ट्र का इतिहास निरन्तर सम्बद्ध रहा है। शिव सब प्रकार से हमारी राष्ट्रीय एकता के उत्तम प्रतीक हैं। शिव में अव्यक्त और अदृश्य सृजन शक्ति अंतर्निहित है। शिव सहयोगी के रूप में सर्वमान्य हैं। वे अतुलनीय और असाधारण देवता हैं। वे सृष्टा, संरक्षक और संहारक हैं। महायोगेश्वर शिव विशुद्ध चैतन्य हैं। विशुद्ध प्रज्ञा का दूसरा नाम ही शिव है।
शिव नीलकंठ के रूप में भी सर्वत्र जाने और पूजे जाते हैं। उनकी नीलकंठ के रूप में पूजा उन समस्त बलिदानियों की पूजा है, जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए अपने जीवन की बलि दी। शिवत्व का आदर्श यही है, स्वयं विष पीकर औरों को अमृत का भागी बनाते हैं। भूतनाथ पिशाचों से घिरे रहकर भक्तों को देवत्व प्रदान करते हैं। स्वयं दिगम्बर रहकर सेवकों को दिव्याम्बरधारी बनाते हैं। वे विश्वमूर्ति हैं, उनका वेश अशिव है पर वे स्वयम् शिव हैं। संसार जब असुर-अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर उठा था तो उन्होंने त्रिपुरासुर का संहार किया पर जब आनंदोल्लास में स्वयं ने उन्मत्त होकर ताण्डव किया तो त्रिलोक्य कांप उठा। वे स्वयं नटराज हैं। उनके विराट उद्धाम तांडव का प्रचार तण्डुमुनि नामक उनके शिष्य ने किया। भारत जिन बातों पर गर्व करता है, उनमें अधिकांश देवाधिदेव महादेव शिव से सम्बद्ध हैं।
आज शिव की प्रासंगिकता कुछ ज्यादा ही है। सारा संसार, अधर्म, अनीति और अनाचार के कुमार्ग पर है। आज ऐसे संहारक शिव की आवश्यकता है, जो अधर्म का विनाश करके धर्म की स्थापना करे, जो अनीति से हटाकर न्याय को प्रतिष्ठित करे, जो अनाचार के बदले सदाचार पर आधारित समाज की रचना करे। आज संसार को ऐसे बलिदानियों, त्यागियों और प्राण की बाजी लगाने वाले महामानवों की जरूरत है, जो संभावित विनाश से सारी मानवता की रक्षा कर सकें। महाशिवरात्रि पर शिव के महान आदर्शों का संकल्प कर शिव की उपासना कर हम उन गुणों का स्मरण करते हैं, जिनके जीवित रहने से समाज जीवित रहता है।
महाशिवरात्रि के इस पावन पर्व पर सारे देश के शिव मंदिरों में धर्मप्राण जनता पूजा-अर्चना करती है और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करती है। इस दिन शिव की उपासना देश के उन सारे क्षेत्रों में होती है, जहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई है।
ये पीठ या साधना केन्द्र असम से सिंधु और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए हैं। इस प्रकार इस पावन पर्व पर सारा राष्ट्र किसी न किसी रूप में शिव की उपासना से जुड़ जाता है। इस अवसर पर अनेक स्थानों पर शिव मेलों का आयोजन भी होता है। *(विनायक फीचर्स)*
