अजब-गजब

*चंपारण की धरती पर भूमि, विकास और लोकतंत्र के प्रश्न*

देवभूमि जे के न्यूज - (कुमार कृष्णन -विनायक फीचर्स) चंपारण भारतीय लोकतंत्र और किसान आंदोलनों के इतिहास में केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध अहिंसक…

देवभूमि जे के न्यूज –
(कुमार कृष्णन -विनायक फीचर्स)
चंपारण भारतीय लोकतंत्र और किसान आंदोलनों के इतिहास में केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक है। यही वह धरती है जहाँ 1917 में महात्मा गांधी ने अपने पहले सत्याग्रह के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। नील की खेती करने वाले किसानों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध शुरू हुआ वह आंदोलन केवल आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष नहीं था, बल्कि राज्य, समाज और नागरिक के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक क्षण भी था। गांधी ने चंपारण में यह स्थापित किया कि विकास या शासन का कोई भी मॉडल जनता की सहमति, न्याय और मानवीय गरिमा की उपेक्षा करके सफल नहीं हो सकता।
एक सदी से अधिक समय बाद पूर्वी चंपारण का पिपराकोठी क्षेत्र फिर भूमि के प्रश्न को लेकर चर्चा में है। इस बार विवाद नील की खेती का नहीं, बल्कि प्रस्तावित वाटर पार्क परियोजना का है। प्रशासन द्वारा वाटगंज क्षेत्र की लगभग 17 एकड़ भूमि को सरकारी घोषित कर उसकी जमाबंदी रद्द किए जाने के बाद किसान आंदोलनरत हैं। किसानों का कहना है कि वे और उनके पूर्वज पिछले सात-आठ दशकों से इस भूमि पर खेती करते आए हैं। उनके पास दाखिल-खारिज, राजस्व रसीदें तथा अतीत में मुआवजा मिलने जैसे दस्तावेज भी हैं। उनका आरोप है कि अचानक भूमि को सरकारी घोषित कर उनसे उनकी आजीविका का आधार छीनने की कोशिश की जा रही है।
दूसरी ओर प्रशासन की कार्रवाई इस आधार पर बताई जा रही है कि संबंधित भूमि सरकारी अभिलेखों में सरकारी संपत्ति है और प्रस्तावित विकास परियोजना के लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई है। यही वह बिंदु है जहाँ विवाद का समाधान केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि तथ्य, कानून और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया से ही संभव हो सकता है।
भूमि केवल संपत्ति नहीं होती, वह किसान के लिए उसकी पहचान, सुरक्षा और पीढ़ियों की स्मृतियों का आधार होती है। जिस खेत में एक परिवार कई दशकों तक खेती करता है, वह उसके लिए केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का केंद्र बन जाता है। ऐसे में यदि भूमि की स्थिति को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव केवल राजस्व अभिलेखों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक तनाव और अविश्वास का कारण भी बनता है।
पिपराकोठी का आंदोलन इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसानों का आरोप है कि आंदोलन करने पर उनके विरुद्ध कई मुकदमे दर्ज किए गए हैं। कुछ परिवारों का कहना है कि पुलिस कार्रवाई के भय से पुरुष सदस्य गाँव छोड़ने को मजबूर हुए, जबकि महिलाओं ने मोर्चा संभाला। महिलाओं ने यह भी आरोप लगाया कि रात के समय पुलिस घरों में पहुँचकर दबाव बनाती है।
यदि ऐसे आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी निष्पक्ष जाँच होना आवश्यक है। वहीं प्रशासन का भी यह दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपनी कार्रवाई का स्पष्ट तथ्यात्मक पक्ष सार्वजनिक करे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी पक्ष का दावा अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता,सत्य की स्थापना निष्पक्ष जाँच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होती है।
इस आंदोलन ने अब राजनीतिक स्वरूप भी ग्रहण कर लिया है। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुधाकर सिंह किसानों के समर्थन में आंदोलन स्थल पर पहुँचे और प्रतीकात्मक रूप से विवादित भूमि पर ट्रैक्टर चलाकर अपना विरोध दर्ज कराया। इसके बाद पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव भी किसानों के बीच पहुँचे। उन्होंने किसानों को भरोसा दिलाया कि उनकी लड़ाई संसद से लेकर न्यायपालिका तक उठाई जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
हालाँकि उनके दौरे के दौरान दिया गया एक विवादित बयान,जिसमें उन्होंने नेताओं की तुलना कुत्तों से करते हुए टिप्पणी की थी,राजनीतिक बहस का विषय बन गया। सार्वजनिक जीवन में तीखी आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, किंतु भाषा की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी भी जनप्रतिनिधि के वक्तव्य का प्रभाव व्यापक होता है। इसलिए मुद्दे की गंभीरता को बनाए रखने के लिए संवाद की भाषा संयमित और गरिमापूर्ण होनी चाहिए फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि इस आंदोलन ने भूमि अधिकार, विकास और किसानों की आजीविका के प्रश्न को फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है।
भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवाद भारत में नए नहीं हैं। आज़ादी के बाद बड़े बांधों, औद्योगिक परियोजनाओं, खनन, राजमार्गों और शहरी विस्तार के लिए लाखों लोगों का विस्थापन हुआ। इन परियोजनाओं ने विकास के नए अवसर भी पैदा किए, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अनेक स्थानों पर प्रभावित लोगों को न्यायपूर्ण मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिल सकी। इसी अनुभव ने यह प्रश्न बार-बार खड़ा किया कि क्या विकास का अर्थ केवल नई परियोजनाएँ हैं, या उसमें प्रभावित समुदायों का विश्वास और सहमति भी उतनी ही आवश्यक है?
पिपराकोठी का विवाद भी इसी बड़े विमर्श का हिस्सा बन गया है। यदि सरकार पर्यटन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से वाटर पार्क जैसी परियोजना विकसित करना चाहती है, तो यह अपने आप में अनुचित नहीं कहा जा सकता। बिहार जैसे राज्य में पर्यटन अवसंरचना का विकास रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन किसी भी विकास परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक स्वीकार्यता से तय होती है। जिस परियोजना की शुरुआत ही अविश्वास और संघर्ष से हो, वह लंबे समय तक विवादों में घिरी रह सकती है।
यही कारण है कि लोकतांत्रिक शासन की पहली जिम्मेदारी संवाद है। यदि भूमि की प्रकृति को लेकर विवाद है, तो सरकार को सभी संबंधित अभिलेख, सर्वेक्षण, राजस्व रिकॉर्ड और कानूनी आधार सार्वजनिक करने चाहिए। यदि किसानों के पास भी स्वामित्व या दीर्घकालीन कब्जे से जुड़े दस्तावेज़ हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी पक्ष की बात सुने बिना एकतरफा निष्कर्ष लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं होगा।
इस आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष इसकी राजनीतिक गूंज है। सांसद सुधाकर सिंह और पप्पू यादव के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और किसान संगठनों ने भी किसानों के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद की है। वामपंथी दलों की स्थानीय इकाइयाँ भी भूमि अधिकारों के प्रश्न पर सक्रिय दिखाई दे रही हैं। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक पक्ष है कि जन आंदोलनों पर राजनीतिक दल अपनी प्रतिक्रिया दें। लेकिन यह भी आवश्यक है कि आंदोलन किसानों के वास्तविक मुद्दों से भटककर केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बन जाए। यदि राजनीति समाधान की दिशा में पुल बने तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि वह केवल ध्रुवीकरण का साधन बन जाए, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं किसानों का होता है, जिनके नाम पर संघर्ष चल रहा होता है।
चंपारण का इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण सीख देता है। महात्मा गांधी जब 1917 में यहाँ आए थे, तब उन्होंने किसी टकराव या हिंसक आंदोलन का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने सबसे पहले किसानों की शिकायतें सुनीं, गाँव-गाँव जाकर तथ्य एकत्र किए, प्रशासन से संवाद किया और सत्य के आधार पर संघर्ष का मार्ग अपनाया। उनका विश्वास था कि न्याय की लड़ाई तथ्यों, नैतिक बल और जनविश्वास से जीती जाती है। यही कारण है कि चंपारण सत्याग्रह आज भी लोकतांत्रिक संघर्ष का आदर्श माना जाता है।
पिपराकोठी के वर्तमान आंदोलन के लिए भी यही दृष्टि सबसे अधिक प्रासंगिक है। किसानों को अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखना चाहिए। वहीं प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी निर्दोष नागरिक के अधिकारों का हनन न हो। यदि पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी स्वतंत्र जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास बढ़ाने का माध्यम बन सकती है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वाटर पार्क बने या न बने। मूल प्रश्न यह है कि क्या विकास और न्याय साथ-साथ चल सकते हैं? क्या ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जिसमें राज्य की विकास योजनाएँ भी आगे बढ़ें और किसानों का विश्वास भी बना रहे? लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा इसी संतुलन में होती है। जिस समाज में विकास लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ता है, वही विकास टिकाऊ और न्यायपूर्ण माना जाता है।
पिपराकोठी का आंदोलन केवल पूर्वी चंपारण के एक गाँव का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का प्रतीक है, जिससे आज भारत का ग्रामीण समाज जूझ रहा है। विकास किसके लिए, किसकी सहमति से और किस कीमत पर? यदि किसी परियोजना से रोजगार, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि उसी प्रक्रिया में लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी बात सुने बिना उनके भविष्य का निर्णय किया जा रहा है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।
भारतीय संविधान नागरिकों को केवल संपत्ति से जुड़े कानूनी अधिकार ही नहीं देता, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन, समानता और न्यायपूर्ण प्रशासन का भी आश्वासन देता है। भूमि विवादों में अदालतों ने भी समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत सुनवाई का अवसर, पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रक्रिया ये लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला हैं। इसलिए यदि किसी भूमि पर स्वामित्व या अधिकार को लेकर विवाद है, तो उसका समाधान प्रशासनिक शक्ति के बजाय विधिसम्मत और पारदर्शी प्रक्रिया से ही होना चाहिए।
पिपराकोठी प्रकरण में भी यही सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि प्रशासन का दावा सही है कि संबंधित भूमि सरकारी है, तो उसे सभी अभिलेख, सर्वेक्षण रिपोर्ट और कानूनी आधार सार्वजनिक करने चाहिए। यदि किसानों के पास भी राजस्व रसीदें, दाखिल-खारिज के दस्तावेज़, मुआवजा प्राप्ति के रिकॉर्ड या अन्य प्रमाण हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी पक्ष का दावा अंतिम सत्य नहीं होता,सत्य तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया से स्थापित होता है।
इस पूरे विवाद में एक सकारात्मक पक्ष भी दिखाई देता है। किसानों ने अब तक बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास किया है और विभिन्न जनप्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया है। सांसद पप्पू यादव ने किसानों की लड़ाई को संसद और न्यायपालिका तक ले जाने की बात कही है। अन्य राजनीतिक दलों ने भी समर्थन व्यक्त किया है। लेकिन अब यह जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों की है कि वे आंदोलन को समाधान की दिशा दें, न कि केवल राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखें। किसानों के जीवन और आजीविका का प्रश्न चुनावी मुद्दा भर नहीं बनना चाहिए।
सरकार के लिए भी यह अवसर आत्ममंथन का है। यदि विकास परियोजनाएँ जनविश्वास के साथ आगे बढ़ेंगी, तो उनका विरोध स्वतः कम होगा। इसके लिए आवश्यक है कि प्रभावित लोगों से पहले संवाद हो, सभी दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाएँ, आपत्तियों का निष्पक्ष निस्तारण किया जाए और यदि किसी को वास्तविक नुकसान होता है तो उसके पुनर्वास एवं मुआवजे की व्यवस्था न्यायपूर्ण और पारदर्शी हो। विकास का उद्देश्य लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ना है, न कि उन्हें अपने ही भविष्य को लेकर असुरक्षित बना देना।
चंपारण का इतिहास हमें यही सिखाता है कि संवाद, सत्य और न्याय किसी भी संघर्ष का सबसे प्रभावी समाधान हैं। महात्मा गांधी ने यहाँ किसी के विरुद्ध घृणा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध सत्याग्रह किया था। उन्होंने शासन को शत्रु नहीं माना, बल्कि उसे भी सत्य के प्रति उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
आज जब पिपराकोठी की धरती पर भूमि का प्रश्न फिर खड़ा हुआ है, तब समाधान भी उसी चंपारण की विरासत से निकल सकता है। प्रशासन अपनी बात पूरी पारदर्शिता से रखे, किसान अपनी बात संवैधानिक और शांतिपूर्ण ढंग से रखें, राजनीतिक दल संयमित भूमिका निभाएँ और यदि आवश्यकता हो तो किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति या न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से पूरे विवाद की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए। इससे न केवल विवाद का समाधान संभव होगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
चंपारण ने एक बार भारत को सत्याग्रह का मार्ग दिखाया था। आज वही धरती फिर यह याद दिला रही है कि विकास की सबसे बड़ी कसौटी केवल परियोजनाओं का आकार नहीं, बल्कि न्याय, संवाद और जनविश्वास है। यदि इन तीनों को साथ लेकर चला जाए तो विकास भी होगा और लोकतंत्र भी मजबूत होगा। लेकिन यदि इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा हुई, तो विकास की चमक के पीछे असंतोष की छाया हमेशा बनी रहेगी।
पिपराकोठी का आंदोलन अंततः केवल 17 एकड़ जमीन का प्रश्न नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा है, जिसमें राज्य, समाज और नागरिक,तीनों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस विवाद का समाधान कानून, संवाद और न्याय के रास्ते निकलेगा, क्योंकि यही चंपारण की विरासत है और यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान भी। *(लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)* *(विनायक फीचर्स)*

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