उत्तराखंड

आस्था, तपस्या और भारतीय संस्कृति की अविरल धारा का प्रतीक पर्व गंगा दशहरा

(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स) ​गंगा दशहरा भारतीय सनातन परंपरा का एक ऐसा महापर्व है जो न केवल हमें संचित पापों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि गहन पर्यावरणीय चेतना और…

(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)

   ​गंगा दशहरा भारतीय सनातन परंपरा का एक ऐसा महापर्व है जो न केवल हमें संचित पापों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि गहन पर्यावरणीय चेतना और जीवन में पानी के वास्तविक मूल्य को भी समझाता है। ज्येष्ठ मास की तपती दुपहरी में, जब संपूर्ण वसुधा जल की एक-एक बूंद के लिए व्याकुल होती है, तब माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हमें यह संदेश देता है कि जल ही इस सृष्टि का आदि और अंत है। जल स्रोतों की पवित्रता बनाए रखना और प्रकृति का सम्मान करना ही इस पर्व का मूल दार्शनिक आधार है।

​इस महापर्व के आध्यात्मिक और व्यावहारिक माहात्म्य को रेखांकित करते हुए सनातन धर्म के परम पवित्र ग्रंथ स्कंद पुराण के काशी खंड में यह श्लोक वर्णित है:
​”दशमी ज्येष्ठ मासस्य शुक्लपक्षे विशेषतः।
हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृता॥”

     ​इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गहरा है। स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि अपने आप में इतनी कल्याणकारी है कि इस दिन यदि कोई मनुष्य साक्षात देवनदी गंगा का स्मरण करता है, उनके पावन जल में डुबकी लगाता है या श्रद्धापूर्वक उनका स्तवन करता है, तो उसके जीवन के दस प्रकार के संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। इसी दस पापों को हरने की विलक्षण क्षमता के कारण इस अनुपम तिथि को 'गंगा दशहरा' कहा गया है।
  ​यह तिथि केवल एक धार्मिक कर्मकांड का उत्सव नहीं है, यह गवाह है उस परम पावन क्षण का, जब ब्रह्मांड की सबसे पवित्र जलधारा, मोक्षदायिनी माँ गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। यह उत्सव है राजा भगीरथ के अखंड पुरुषार्थ का, देवाधिदेव महादेव की असीम करुणा का और उस गौरवशाली संस्कृति का जिसने सहस्रों वर्षों से संपूर्ण मानवता को सभ्यता, निर्मलता, जल-संरक्षण और अध्यात्म की अविरल धारा से सींचा है।

​ ​गंगा के धरातल पर अवतरित होने की पृष्ठभूमि मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी और कठिन संकल्प गाथा है। ​पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सूर्यवंश के प्रतापी राजा सगर ने चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा में एक विशाल अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। उनकी कीर्ति से भयभीत होकर देवराज इंद्र ने यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया और उसे पाताल लोक में ध्यानमग्न कपिल मुनि के आश्रम के समीप छिपा दिया। घोड़े की खोज में निकले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने जब मुनि के आश्रम को घेरा, तो अहंकारवश उन्होंने ऋषि पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया।
​ऋषि कपिल ने जैसे ही क्रोध में अपनी आँखें खोलीं, उनके तप के प्रचंड तेज से राजा सगर के सभी साठ हजार पुत्र वहीं जलकर भस्म हो गए। तर्पण और अंतिम संस्कार न होने के कारण उनकी आत्माएं प्रेतयोनि में भटकने लगीं। सगर के वंशजों ने कई पीढ़ियों तक प्रयास किया कि किसी तरह स्वर्ग की नदी गंगा को पृथ्वी पर लाया जाए, ताकि उनके पवित्र जल के स्पर्श से इन भटके हुए पूर्वजों को मुक्ति मिल सके, परंतु वे असमर्थ रहे।
​अंततः राजा दिलीप के प्रतापी पुत्र भगीरथ ने इस असंभव कार्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया। वे राजपाठ त्यागकर गोकर्ण तीर्थ में घोर तपस्या में लीन हो गए। भगीरथ का संकल्प इतना अडिग था कि उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर माँ गंगा ने पृथ्वी पर आने की सहमति तो दे दी, परंतु उन्होंने एक विकट समस्या सामने रखी। गंगा ने कहा, “जब मैं स्वर्ग से तीव्र वेग से पृथ्वी पर गिरूँगी, तो पृथ्वी मेरा वेग सहन नहीं कर पाएगी और रसातल में समा जाएगी।”
​इस ब्रह्मांडीय संकट के समाधान के लिए भगीरथ ने भगवान शिव की शरण ली। उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर भोलेनाथ की आराधना की। भगीरथ की भक्ति से द्रवित होकर आशुतोष शिव ने अपनी विशाल जटाएं फैला दीं। जैसे ही गंगा का प्रचंड वेग स्वर्ग से नीचे गिरा, शिव ने संपूर्ण जलधारा को अपनी जटाओं के भूलभुलैया में कैद कर लिया।
​कई वर्षों तक गंगा शिव की जटाओं में भटकती रहीं। अंततः भगीरथ की विनम्र प्रार्थना पर, शिव ने अपनी जटा की एक लट को खोला और गंगा को अत्यंत शांत, नियंत्रित और सात धाराओं में पृथ्वी पर प्रवाहित होने दिया। शिव के इसी उपकार के कारण उन्हें “गंगाधर” कहा गया। इसके बाद, भगीरथ आगे-आगे अपने दिव्य रथ पर चले और माँ गंगा की पावन धारा उनके पीछे-पीछे चलती रही। भगीरथ गंगा को उस स्थान तक ले गए जहाँ उनके पूर्वजों की भस्म पड़ी थी। जैसे ही पावन जल ने उस भस्म का स्पर्श किया, साठ हजार आत्माओं को मोक्ष की प्राप्ति हुई। मानव इतिहास में इसी महान संकल्प को “भगीरथ प्रयत्न” कहा जाता है, जो आज भी हर असंभव कार्य को संभव करने की प्रेरणा देता है।
​ ​स्कंद पुराण में गंगा दशहरा के दिन जिन दस पापों के नाश की बात कही गई है, वे मनुष्य के नैतिक और चारित्रिक उत्थान के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका की तरह हैं। शास्त्रों ने इन दस मानवीय भूलों और पापों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया है, जिन्हें कायिक, वाचिक और मानसिक कहा जाता है।
​पहला वर्गीकरण कायिक पापों का है, जो मनुष्य अपने शरीर या भौतिक क्रियाओं द्वारा करता है। इसके अंतर्गत तीन प्रकार के पाप आते हैं,किसी भी निरीह जीव की शास्त्र-विरुद्ध हिंसा करना, किसी की वस्तु को उसकी बिना अनुमति के बलपूर्वक या चुपके से लेना अर्थात चोरी करना, और सामाजिक नियमों के विरुद्ध परस्त्री या परपुरुष गमन करना।
​दूसरा वर्गीकरण वाचिक पापों का है, जो मनुष्य अपनी वाणी या शब्दों के माध्यम से करता है। इसके अंतर्गत चार प्रकार के पाप गिने गए हैं,किसी व्यक्ति को आहत करने वाले अत्यंत कठोर या कटु वचन बोलना, स्वार्थवश असत्य भाषण या झूठ बोलना, किसी की पीठ पीछे उसकी निंदा या चुगली करना, और बिना किसी तर्क या सिर-पैर के व्यर्थ का प्रलाप करना।
​तीसरा और अंतिम वर्गीकरण मानसिक पापों का है, जिनका जन्म मनुष्य के विचारों और अंतःकरण में होता है। इसके अंतर्गत तीन प्रकार के पाप आते हैं,दूसरे के धन या संपत्ति को हड़पने की अनुचित इच्छा रखना, मन ही मन किसी व्यक्ति का अहित या बुरा सोचना, और नास्तिक अथवा अधार्मिक विचारों में लिप्त रहकर धर्म का उपहास उड़ाना।
​गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करते समय साधक केवल अपने स्थूल शरीर को स्वच्छ नहीं करता, बल्कि वह इस पवित्र जलधारा में इन दस मानसिक, वाचिक और कायिक विकारों को हमेशा के लिए विसर्जित करने का संकल्प लेता है। यही इस महापर्व का वास्तविक और गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य है।
​भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में गंगा केवल एक नदी नहीं हैं, वे हमारी राष्ट्रीय चेतना की मुख्य संवाहक हैं। हिमालय के गोमुख से लेकर गंगासागर तक की अपनी लंबी यात्रा में गंगा ने न केवल इस आर्यावर्त की भूमि को उपजाऊ और हरा-भरा बनाया है, बल्कि यहाँ की वैचारिक भूमि को भी महान जीवन मूल्यों से सींचा है।
​गंगा के पावन तटों पर ही संसार की सबसे प्राचीन सभ्यताओं का विकास हुआ। हरिद्वार, जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर पहली बार मैदानों में प्रवेश करती हैं,प्रयागराज, जहाँ वे यमुना और अदृश्य सरस्वती के साथ मिलकर त्रिवेणी संगम का सृजन करती हैं और काशी (वाराणसी), जो अनादि काल से ज्ञान, मोक्ष और कला का वैश्विक केंद्र रही है,ये सभी अनुपम तीर्थ स्थल गंगा के कारण ही जीवंत हैं। इसी पावन नदी के किनारे बैठकर ऋषियों ने वेदों की ऋचाएं गाईं, उपनिषदों के गूढ़ रहस्य खोजे और महान ग्रंथों की रचना हुई। आदि शंकराचार्य से लेकर संत कबीर और गोस्वामी तुलसीदास तक, सभी महान विभूतियों ने गंगा के सामीप्य में अपनी साधना को पूर्ण किया।
​एक भारतीय के जीवन में गंगा का स्थान कितना गहरा है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि शिशु के जन्म के समय शुद्धि के लिए गंगाजल छिड़का जाता है, और व्यक्ति की अंतिम यात्रा के समय उसके मुख में गंगाजल की कुछ बूंदें डालकर उसे इस नश्वर संसार से विदा किया जाता है। भारतीय जनमानस के लिए गंगाजल कोई सामान्य पानी नहीं है, बल्कि वह साक्षात ‘अमृत’ है, जिसमें स्वतः शुद्ध होने का अद्भुत गुण पाया जाता है।
​यदि हम कर्मकांडीय दृष्टिकोण से ऊपर उठकर देखें, तो गंगा दशहरा हमें आधुनिक जीवन को सुखी, संतुलित और सार्थक बनाने के कई व्यावहारिक संदेश देता है। गंगा का पहला संदेश निरंतरता और गतिशीलता है। मार्ग में कितनी भी विशाल चट्टानें आएं, पहाड़ आएं या गहरी खाइयाँ, गंगा कभी रुकती नहीं हैं। वे अपना मार्ग स्वयं बनाती हैं और आगे बढ़ती रहती हैं। गंगा दशहरा हमें यह सीख देता है कि जीवन का नाम ही गति है। ठहराव अवसाद लाता है, जबकि निरंतर प्रवाह हमें प्रगति की ओर ले जाता है।
​इसका दूसरा संदेश समानता और समभाव है। गंगा माँ के समान वात्सल्यमयी हैं। वे अपने जल का उपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति में भेद नहीं करतीं। उनके घाट पर राजा हो या रंक, प्रकांड विद्वान संत हो या समाज का तिरस्कृत व्यक्ति, वे सभी को समान रूप से शीतलता और पावनता प्रदान करती हैं। यह समादर और समभाव आज के समाज के लिए बहुत बड़ी सीख है।
​इसके साथ ही, यह पर्व हमें अहंकार के विसर्जन का पाठ पढ़ाता है। गंगा जब स्वर्ग से उतरीं, तो उनके पास प्रचंड वेग और अहंकार था, जिसे शिव ने अपनी जटाओं में बांध लिया। जब वे शांत और विनम्र होकर प्रवाहित हुईं, तभी वे लोककल्याण कर सकीं। यह इस बात का प्रतीक है कि शक्ति और ज्ञान तभी सार्थक हैं जब वे विनम्रता के साथ समाज के काम आएं।
​आज जब हम आधुनिक युग में गंगा दशहरा मना रहे हैं, तो हमें आत्म-अवलोकन करने की अत्यंत आवश्यकता है। जिस माँ गंगा को हमने अपनी आस्था के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया, आज वही नदी मानवीय स्वार्थ, तीव्र औद्योगिकीकरण और प्रदूषण के कारण संकट में है। कल-कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा, शहरों का अनुपचारित सीवेज और प्लास्टिक के अनियंत्रित ढेर ने गंगा की निर्मलता को गंभीर रूप से खंडित किया है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो जल सदियों तक अपनी स्व-शुद्धिकरण क्षमता के लिए जाना जाता था, आज वह कई स्थानों पर आचमन के योग्य भी नहीं रहा है।
​गंगा दशहरा के इस पावन अवसर पर हमें यह समझना होगा कि नदियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी केवल तट पर खड़े होकर कपूर से आरती उतारने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि गंगा हमें जीवन देती हैं, तो गंगा को पुनर्जीवन देना हमारा परम नागरिक कर्तव्य है। नदी संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसमें जन-भागीदारी अत्यंत अनिवार्य है। हमें संकल्प लेना होगा कि हम नदियों में कचरा, प्लास्टिक और रासायनिक अपशिष्ट विसर्जित नहीं करेंगे। जल के स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए अपने स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलाएंगे।
​भारत के विभिन्न राज्यों में गंगा दशहरा का पर्व अभूतपूर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से उत्तर भारत के उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में इस दिन का सौंदर्य देखते ही बनता है। ऋषिकेश, हरिद्वार के हर की पौड़ी, प्रयागराज के संगम तट और वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है।
​संध्या के समय जब हजारों-लाखों जलते हुए मिट्टी के दीये गंगा की लहरों पर तैरते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के सारे तारे माँ गंगा की आरती उतारने धरती पर उतर आए हों। डमरूओं की गूँज, शंखनाद और वेदमंत्रों के सस्वर पाठ से संपूर्ण वातावरण आलौकिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से सरावोर हो जाता है।
​ग्रामीण अंचलों में, जहाँ साक्षात गंगा नदी उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ लोग स्थानीय नदियों, सरोवरों या अपने घरों में ही जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर पूरी श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं। इस दिन सत्तू, मटका, पंखा, तरबूज और ठंडे शरबत के दान का विशेष चलन है, जो ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में राहगीरों को शीतलता प्रदान करने के सामाजिक सरोकार को दर्शाता है।
​संक्षेप में कहा जाए तो, स्कंद पुराण के श्लोकों से शुरू होने वाली यह पावन परंपरा केवल एक पौराणिक घटना की स्मृति नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की अदम्य जिजीविषा, उसकी गहराई, उदारता और प्रकृति-केंद्रित जीवन-दर्शन का अनुपम उत्सव है। भगीरथ की अनथक तपस्या, महादेव का आश्रय और माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण,यह त्रिवेणी हमें सिखाती है कि जब पुरुषार्थ, करुणा और दिव्यता का मिलन होता है, तो सृष्टि का कल्याण निश्चित है।
​आज के इस भौतिकवादी युग में गंगा दशहरा की सार्थकता तभी है, जब हम गंगा के आध्यात्मिक, पर्यावरणीय और व्यावहारिक संदेश को अपने अंतःकरण में उतारें। हम अपने विचारों को गंगा की तरह निर्मल रखें, अपने कर्मों को भगीरथ की तरह लोककल्याण के प्रति समर्पित करें, पानी के मूल्य को समझें और अपनी इस जीवनदायिनी जीवन रेखा के संरक्षण के लिए सजग नागरिक की भूमिका निभाएं। आइए, इस पावन पर्व पर हम सब मिलकर प्रार्थना करें और संकल्प लें कि हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारी माँ गंगा की यह पवित्र धारा युगों-युगों तक इसी प्रकार निर्बाध, अविरल और निर्मल प्रवाहित होती रहे।​॥ हर हर गंगे, जय माँ गंगे ॥ (विनायक फीचर्स)

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