उत्तराखंड

*तेल देखो- तेल की मार देखो*

देवभूमि जे के न्यूज़-

(मुकेश ‘कबीर’-विभूति फीचर्स)

डोनाल्ड ट्रम्प के सेकरेट्री पीटर नवारो ने कहा कि रूस के तेल का फायदा भारत के ब्राह्मण उठा रहे हैं। इस बयान ने साबित कर दिया कि बोलने के मामले मे भूरा भाई का छोटू उनसे डेढ़ परसेंट भी कम नहीं है। हालांकि भारत में इन दोनों की बातों को कोई महत्व नहीं देता क्योंकि यहाँ तो एक पहले से ही मौजूद है जो दस साल से हमें इस तरह की मनोरंजक सामग्री उपलब्ध करा रहा है।
असल में भारत में इन तीनों पप्पुओं का गुरु जॉर्ज सोरोस को माना जाता है इसलिए हमारे एक मित्र का कहना है कि सोरोस ने शायद भारत वाले की स्क्रिप्ट अमेरिका वाले को दे दी इसलिए पीटर ने ब्राह्मणों को तेल मे लपेट दिया लेकिन हमें समझ नहीं आ रहा कि ब्राह्मणों का रुसी तेल से क्या लेनादेना? देसी घी की बात होती तो समझ में भी आता कि हवन,पूज,न भोजन प्रसादी के लिए चाहिए होगा लेकिन भारत के ब्राह्मण रुसी तेल सस्ता खरीदकर महंगा बेच रहे हैं यह बात सुनकर तो लगता कि पप्पू स्टाइल अब पूरी दुनिया में चल चुका है।
एक बात यह भी साबित हो गई कि पीटर भारत वाला हो या अमेरिका वाला दोनों को ब्राह्मणों से खुन्नस रहती है और हमें तो ऐसा भी लगा कि बहुजन समाजवादी पार्टी को गोरा प्रवक्ता मिल गया, वैसे भी बहिन जी अकेली लगी हुई थीं, अब उन्हें भी सहारा मिल जाएगा। बुढ़ापे मे चाहिए भी एक भरोसेमंद साथी, जो उन्हें अमेरिका में मिला वरना भारत में तो बहिन जी का हाल माया मिली ना राम जैसा हो चुका था। खैर पीटर के इस बयान ने भारत की राजनीति मे हीटर जरूर लगा दिया।
हमारे विपक्षी दल चकर घिन्नी हो गए उनको लगता है कि हम बेवजह अडानी को बदनाम करते रहे मुनाफा तो ब्राह्मण कमा रहें हैं, सत्ता वाले इसलिए परेशान हैं कि उन पर फिर से ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगेगा फिर दलितों का गुस्सा झेलना पड़ेगा और दलितों को लगता है रूस ने तेल बेचने में आरक्षण के नियमों का पालन क्यों नहीं किया और हमारे अडानी यह सोचकर दुखी है कि इस साल भी दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने का सर्टिफिकेट हासिल नहीं हो पाएगा यहां भी ब्राह्मणों ने भांजी मार दी। लेकिन सबसे ज्यादा दुखी तो हमारे बेधड़क भोपाली हैं वो कहते हैं कि हम तो तीन पीढ़ियों से तेल की लाइन में लगे हुए हैं लेकिन तेल ब्राह्मणों को मिल गया।
खैर, जिस तरह हँसने वाले हंसने के बहाने ढूंढ लेते हैं, उसी तरह रोने वाले रोने के बहाने ढूंढ़ लेते हैं इसलिए कुछ कहने के बजाय हमें सिर्फ परिणाम पर ध्यान देना चाहिए कि मस्तिष्क को कष्ट दिए बिना बोलने वाले लोग हमारा उखाड़ क्या लेंगे इसलिए चुप रहकर तेल देखो और तेल की मार देखो… *(विभूति फीचर्स)*

व्यंग्य
*मेरी मर्जी … हाथ मिलाऊँ या न मिलाऊँ*
(सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)

जब मैं किसी की ज़िंदगी में नही झाँकना चाहता, तो कोई मेरी क्यों झाँके ? ज़रा जरा सी बात पर बात का बतंगड़ बनाना लोगों की आदत बन चुकी है। जब से सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ है, तब से तो जिसे देखो वही मान न मान मैं तेरा मेहमान बन कर कोई भी किसी की ज़िंदगी में दाखिल होने में देर नहीं लगाता। कभी शुभ चिंतक बन जाता है, कभी आलोचक । बहरहाल कोई अपने कष्टों से दुखी नहीं है। उसे बस उस सेलिब्रिटी पर टीका टिप्पणी,छींटाकशी करनी है, जो उसे न जानता है न पहचानता है।
मुझे क्या पसंद है, क्या नहीं, मुझसे किस से बात करनी है, किस से नहीं, यह मेरी मर्जी पर निर्भर होना चाहिए या किसी अन्य की मर्जी पर। सवाल मेरे स्वाभिमान और मेरी स्वतंत्रता से जुड़ा है। न जाने क्यों लोग मुझसे अपेक्षा करते हैं, कि मैं उनकी मर्जी से ही जीवनचर्या अपनाऊं, वे जैसे कहें वैसे ही उनके इशारे पर कठपुतली का नाच दिखाऊं, वे कहें कि खड़ा हो जा तो खड़ा हो जाऊं, बैठ जा, तो बैठ जाऊं, चाय पी ले, तो चाय पी लूँ। पानी पी ले तो बिना प्यास के पानी पी लूँ। आखिर मेरी भी तो कोई अपनी इच्छा होगी, मेरा भी अपना नजरिया होगा, जिस नजरिये से मैं जीना चाहता हूँ, उस नजरिये से मेरी भी जीने की तमन्ना होगी। पर मेरे बारे में कोई सोचता ही नहीं, जिसे देखो वही मेरे आचरण के बाल की खाल निकालने में जुटा हुआ है।
कल ही मैं मैदान में क्रिकेट खेल रहा था। टॉस हुआ, मैं टॉस हार गया। खेल में जीत हार नई बात नहीं है। चाहे टॉस जीतो या मैच, चाहे टॉस हारो या मैच, क्या फर्क पड़ता है। पर कुछ ऐसे लोग हैं, जो टॉस जीतने को मैच जीतने की प्रस्तावना मान लेते हैं। खेल के मैदान में खेल की शुरुआत ही खेल भावना के प्रदर्शन से होती है। कहा जाता है कि पहले प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी से हाथ मिलाओ, फिर खेल में अपना कौशल दिखाओ। मैं तर्कशील हूँ। हर परंपरा को तब तक निभाना नहीं चाहता, जब तक कि उस परंपरा को तर्क की कसौटी पर न तौल लूँ। मैंने टॉस हार कर विपक्षी टीम के मुखिया से हाथ नहीं मिलाया, मैच जीतकर भी विपक्षी टीम के खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया। लोग उसी की चर्चा करने लगे। हद है, लगता है कि कोई अपने दुःख से दुखी नहीं है। उन्हें केवल दूसरों के आचरण पर नजर रखनी है, कि कब किसने किस से हाथ मिलाया और कब हाथ पीछे कर लिए , कब किस को अपनत्व की नजर से निहारा और कब किसकी तरफ से निगाहें फेर ली। कब किस का अपमान किया, कब किसका सम्मान किया। वैसे समय बलवान है, न जाने कब किस का अपमान करा दे और कब किस का सम्मान। पग पग पर ऐसे लोग खड़े मिलते हैं, जिनसे हमारे विचार नहीं मिलते। क्या सभी से हाथ मिलाना जरुरी है। क्या जरुरी है कि किसी से मन मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए। अपुन तो अपनी मर्जी के मालिक हैं। न किसी के प्रभाव में रहते हैं, न किसी को अपने प्रभाव में रखने का प्रयास करते हैं। अपुन का मूल मंत्र है खुद भी अपनी मर्जी से जियो और औरों को भी उनकी मर्जी से जीने दो। खेल का मैदान हो या ज़िन्दगी का, अपुन तो अपनी मर्जी से ही हाथ मिलाएंगे। *(विनायक फीचर्स)*

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देवभूमि jknews

जीवन में हमेशा सच बोलिए, ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है!

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