उत्तराखंड

*गुड मॉर्निंग मैसेज की खरपतवार से लहूलुहान होता मोबाइल*

देव भूमि जे के न्यूज (विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स) आजकल सुबह की शुरुआत सूरज की रोशनी से नहीं, मोबाइल स्क्रीन की ‘टिंग-टिंग’ से होती है। सूरज को उगने…

देव भूमि जे के न्यूज

(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)

आजकल सुबह की शुरुआत सूरज की रोशनी से नहीं, मोबाइल स्क्रीन की ‘टिंग-टिंग’ से होती है। सूरज को उगने में भले ह अभी वक्त हो, पर आपके व्हाट्सऐप पर कोई अनजाना-सा ‘शुभचिंतक’ 500 केबी का सूरजमुखी भेजकर सुप्रभात कह देता है। बादल छाए हों तो सूरज भी सोच में पड़ जाता होगा कि – “भाई, मैं तो अभी एक्टिव हुआ नहीं और तूने मेरी फोटो फॉरवर्ड कर दी!”
ये एक अलग ही प्रजाति है, सोशल मीडिया के मौसमी शुभचिंतक। इनके फोन की गैलरी में न उनके बच्चे की फोटो, न छुट्टी की यादें, सिर्फ ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड इवनिंग’ और ‘शुभ रात्रि’ वाले फोल्डर। मंगलवार को जय बजरंगबली वाला संदेश, शाम को उसी का ‘गुड नाइट’ संस्करण। देवता भी कन्फ्यूज, अब आशीर्वाद दें या विश्राम करें?
समस्या तब बढ़ती है जब शुभकामना का आकार आपके डेटा पैक से बड़ा हो और डाउनलोड होते-होते बैटरी बैठ जाए। आप किसी जरूरी काम में व्यस्त हों और ये संदेश बिन बुलाए मेहमान की तरह एक के बाद एक आने लगें। आप विनम्रता से कहें- “भाई, रोज़ मत भेजा करो”तो भी उनका उत्साह वैसा ही अडिग रहता है, क्योंकि आप उनकी ‘ब्रॉडकास्ट लिस्ट’ में हैं। उनके लिए ये मैसेज उनके जिंदा होने का डिजिटल प्रमाणपत्र होते हैं।
अब सीधे-सीधे “ब्लॉक” कर देना सभ्यता में नहीं। हम सोचते हैं, डांट में भी साहित्य का रस घुला हो। आखिर यही तो फर्क है हममें और उन कवियों में, जो तुकबंदी के नाम पर गधे को पद्म पुरस्कार थमा देते हैं।
कभी-कभी दिल करता है कि एक भव्य उद्घोषणा कर दें कि-“हे महाशय, हे महाशया! आपके इन पिक्सेल-पुष्पों और काँटों से मेरा डिजिटल आँगन अवांछित रूप से भर गया है। कृपया इन्हें अपनी मेमोरी की तुलसी पर ही अर्पित करें।” पर जानते हैं, ऐसा कहते ही ‘तुम नाराज़ हो क्या?’ वाले तीन नए मैसेज मिल जाएंगे।
असल में, ये लोग दो श्रेणियों में आते हैं,
* पहली, जिन्हें लगता है कि दुनिया का सौहार्द उनके रोज़ के गुड मॉर्निंग से ही बचा है।
* दूसरी, जिन्हें डर है कि अगर उन्होंने नहीं भेजा तो भगवान उनके घर का वाई-फाई काट देगा। दोनों में तर्क की कोई जगह नहीं।
फिर भी, इन्हें रोकना मुश्किल है। आप ‘म्यूट’ करें, ये ‘स्टिकर’ पर उतर आते हैं। आप ‘स्टेटस हाइड’ करें, तो ये ग्रुप में टैग करके भेजते हैं- “भाई, देखना ज़रूर।” इनकी शुभकामनाओं का बहाव ऐसा है कि न रोका जा सकता है, न सुखाया जा सकता है।
आख़िरकार हमने निर्णय लिया है, इन संदेशों को न फूल मानेंगे, न काँटा। बस, डिजिटल खरपतवार समझकर ‘इग्नोर’ कर देंगे। आखिर मोबाईल मेमोरी कम होती है… और डेटा लिमिट उससे भी छोटी। यह सब तब अति कष्टकारी हो जाता है जब हम विदेश यात्रा पर हों और मोबाइल स्विच ऑन करते ही इन संदेशों के अवांछित हमले से सारा डेटा ही चुक जाता है।
गुड मार्निंग, गुड इवनिंग वाली इस बढ़ती प्रजाति को लेकर संभव है कि ऐसे इंटरव्यू पढ़ने मिलें ..
*पत्रकार*- “सर, आपने ज़िंदगी में सबसे बड़ी उपलब्धि क्या हासिल की?”
*गुड मॉर्निंग मैसेज स्पेशलिस्ट* “मैंने लगातार 25 साल, बिना एक भी दिन छोड़े, सबको बिना भेद भाव सुप्रभात मैसेज भेजा।”
*पत्रकार* – “पर सर, लोग आपके इन कार्यों से परेशान नहीं होते थे?”
*स्पेशलिस्ट*- “परेशान? अरे! यही तो प्यार है… कोई रिसीव करे या न करे, हम तो अपना काम करते रहेंगे।”
*पत्रकार* “और आपके इस प्रयास का नतीजा क्या निकला?”
*स्पेशलिस्ट* (गर्व से) “नतीजा ये कि मेरे फोन में अब तक 10,000 लोग मुझे ब्लॉक कर चुके हैं… पर मैंने हार नहीं मानी। सुप्रभात का सूर्य कभी अस्त नहीं होता!”
तो भला इसी में है कि अपने व्हाट्स अप की सेटिंग्स में जाकर नो डाउनलोड विदाउट परमिशन कर लें, क्योंकि लगभग मुफ्त की डिजिटल सद्भावना हर स्मार्ट फोन के साथ बढ़ती रहने वाली फॉरवर्डिंग बीमारी है।

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