(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) – विधानसभा के बजट सत्र के दौरान ही प्रदेश की व्यापारिक राजधानी और राजनीतिक राजधानी में एक ही दिन लोकतंत्र का एक और “उत्सव” संपन्न हुआ। पत्थरों की वर्षा के बीच विचारधारा की ऐसी गंगा बही कि कार्यकर्ता सीधे अस्पताल और फिर थाने के दर्शन कर आए।
लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए। पहले नारे, फिर धक्का-मुक्की, फिर पथराव, और अंत में एफआईआर।
सुबह तक जो कार्यकर्ता पार्टी के “शेर” थे, शाम होते-होते मेडिकल रिपोर्ट और जमानत के कागज़ ढूंढते नजर आए। लोकतंत्र में भागीदारी का यह नया मॉडल है पहले जोश दिखाओ, और जब होश में आओ तो वकील खोजो।
भोपाल में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर के बाहर और इंदौर में जो दृश्य बने, वो किसी राजनीतिक बहस से ज्यादा एक एक्शन फिल्म के क्लाइमेक्स जैसे थे। फर्क बस इतना था कि यहां “कट” बोलने वाला कोई डायरेक्टर नहीं था। कैमरे जरूर थे मीडिया के और जब कैमरे होते हैं तो जोश थोड़ा और बढ़ जाता है।
कार्यकर्ता बेचारे क्या करें? उन्हें बताया गया, लोकतंत्र खतरे में है, दफ्तर घेरना है, आवाज बुलंद करनी है। उन्होंने आवाज इतनी बुलंद की कि पत्थर भी उड़ चले। उधर सामने वाले भी कम नहीं थे, उन्होंने भी सोचा, लोकतंत्र बचाना है तो जवाब तो देना ही पड़ेगा फिर क्या था, लोकतंत्र दोनों तरफ से सुरक्षित कर लिया गया।
अब दृश्य बदला है। अस्पताल के बाहर पट्टियां बंधी हैं, सोशल मीडिया पर बयानबाजी है, और थाने में धाराएं लगी हैं। पुलिस ने निष्पक्षता का परिचय देते हुए दोनों तरफ के कार्यकर्ताओं पर मुकदमा दर्ज कर लिया है आखिर कानून सबके लिए बराबर है। जो भी पत्थर फेंके, उसे कोर्ट का रास्ता दिखे।
और नेता जी ? वे बयान दे रहे हैं, कोई कह रहा है कि हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हमला हुआ। दूसरा कह रहा है कि हमारे दफ्तर पर सुनियोजित हमला था। दोनों तरफ से शब्दों के पत्थर अब भी चल रहे हैं, बस फर्क इतना है कि अब वे कागज और कैमरे के जरिए फेंके जा रहे हैं।
लेकिन असली नायक कौन? वही जमीनी कार्यकर्ता, जो दरियां बिछाता है, झंडे लगाता है, पर्चे बांटता है, घर घर जाकर वोटर निकालता है, जिसने जोश में आकर पार्टी का मान रखा और अब वकील का नंबर मोबाइल में सेव कर रहा है।
उसे अब समझाया जा रहा है। “डरो मत, पार्टी तुम्हारे साथ है।” लेकिन वह अच्छी तरह से जानता है कि हां, साथ है, बयान में, ट्वीट में, और प्रेस कॉन्फ्रेंस में। कोर्ट की तारीख पर साथ कौन जाएगा, यह अगली रणनीतिक बैठक में तय होगा।
लोकतंत्र में भागीदारी का यह व्यावहारिक पाठ बड़ा रोचक है। पहले नारे लगाओ, “हम लड़ेंगे!” फिर पुलिस कहे, “अच्छा, अब थाने चलिए।” वहां से आवाज आती है “वकील साहब, जमानत कराइए।”
कोर्ट-कचहरी का चक्कर भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है। तारीख पर तारीख मिलती है, और हर तारीख पर कार्यकर्ता को याद आता है कि उसने पत्थर किस विचारधारा के लिए उठाया था। विचारधारा धीरे-धीरे धुंधली होती है, लेकिन केस नंबर याद रहता है।
सबसे सुंदर दृश्य तब होता है जब दोनों दलों के घायल कार्यकर्ता अस्पताल के कॉरिडोर में आमने-सामने पड़ जाते हैं। एक के सिर पर पट्टी, दूसरे के हाथ में प्लास्टर। दोनों की आंखों में एक ही सवाल। “ये हुआ क्या?”
राजनीति में आक्रोश दिखाना आसान है, उसका दुष्परिणाम झेलना कठिन। पत्थर हवा में सेकंड भर उड़ता है, लेकिन मुकदमा सालों साल चलता है।
तो भाइयों और बहनों, अगली बार जब लोकतंत्र बचाने निकलें, तो जेब में नारा और दिल में जोश जरूर रखें, पर साथ में वकील का नंबर और थोड़ी समझदारी भी रख लें क्योंकि लोकतंत्र में पत्थर का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि एफआईआर से मिलता है और अंत में वही पुराना सत्य नेता मंच पर, कार्यकर्ता पंचनामे में और लोकतंत्र जिंदाबाद! *(विनायक फीचर्स)*
