देवभूमि जे के न्यूज़-(जय कुमार तिवारी) –
(किशन लाल शर्मा- विनायक फीचर्स)
डिजिटल युग ने जहाँ जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं अपराध के नए और खतरनाक रूप भी जन्म दिए हैं। इन्हीं में से एक है “डिजिटल अरेस्ट” जो कानून नहीं, बल्कि साइबर ठगी का एक नया और भयावह तरीका है।
डिजिटल अरेस्ट कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह ठगों द्वारा रची गई एक मानसिक और तकनीकी धोखाधड़ी है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई,ईडी, कस्टम अधिकारी या कोर्ट का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं।
ठग वीडियो कॉल, फोन कॉल या मैसेज के माध्यम से कहते हैं कि- आपके नाम से अवैध गतिविधि हुई है या
आपके बैंक खाते से मनी लॉन्ड्रिंग हुई है या फिर आपका सिम/आधार/पासपोर्ट अपराध में इस्तेमाल हुआ है।
फिर वे व्यक्ति को “ऑनलाइन निगरानी” या “डिजिटल हिरासत” में होने का डर दिखाकर कहते हैं कि
“आप घर से बाहर नहीं जा सकते, किसी से बात नहीं कर सकते वरना तुरंत गिरफ्तारी होगी।” डर के कारण व्यक्ति उनसे जुड़ा रहता है और अंततः पैसे ट्रांसफर कर देता है।
अब तकडिजिटल अरेस्ट के जोसामान्य तरीके
देखे गए हैं , उनमें प्रमुख हैं अचानक वीडियो कॉल आना (पुलिस वर्दी या सरकारी बैकग्राउंड दिखाकर),फर्जी गिरफ्तारी वारंट या एफआईआर की पीडीएफ भेजना,
कॉल डिस्कनेक्ट न करने की धमकी देना, गोपनीयता की आड़ में परिवार से बात न करने को कहना और अंत में
“जांच खत्म करने” के नाम पर फीस या जुर्माना मांगना
डिजिटल अरेस्ट से आसानी से बचा जा सकता है क्योंकि डिजिटल अरेस्ट कानूनन संभव नहीं है।
भारत में कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती, न ही पैसे लेकर केस बंद नहीं करती। इसलिए
डरने के बजाय कॉल काटें और नजदीकी पुलिस स्टेशन या साइबर सेल से संपर्क करें। कभी भी पैसे ट्रांसफर न करें।
सरकारी एजेंसियाँ कभी भी गिफ्ट कार्ड,क्रिप्टो या निजी खाते में पैसा नहीं मांगतीं।
अपनी व्यक्तिगत जानकारी भूलकर भी साझा न करें
आधार नंबर, बैंक डिटेल, पासवर्ड किसी को न दें। सबसे जरुरी बात परिवार से बात जरूर करें क्योंकि ठग आपको अकेला और डर में रखना चाहते हैं। किसी विश्वसनीय व्यक्ति से तुरंत बात करें। जितनी जल्दी हो सके अपनी शिकायत दर्ज कराएं। *(विनायक फीचर्स)*
