उत्तराखंडधर्म-कर्मराशिफल

*आज आपका राशिफल एवं प्रेरक प्रसंग- क्यों किया भगवान ने 16108 राजकुमारियों से विवाह*


*आज का पञ्चांग*

*दिनांक:- 22/05/2025, गुरुवार*
*दशमी, कृष्ण पक्ष,*
*ज्येष्ठ*
(समाप्ति काल)

तिथि———– दशमी 25:11:43 तक
पक्ष———————— कृष्ण
नक्षत्र—- पूर्वा भाद्रपदा 17:46:27
योग——— विश्कुम्भ 21:48:19
करण———- वणिज 14:20:54
करण——- विष्टि भद्र 25:11:43
वार———————– गुरूवार
माह———————— ज्येष्ठ
चन्द्र राशि—– कुम्भ 12:07:28
चन्द्र राशि ———————– मीन
सूर्य राशि—————– वृषभ
रितु————————-ग्रीष्म
आयन—————– उत्तरायण
संवत्सर—————– विश्वावसु
संवत्सर (उत्तर)————— सिद्धार्थी
विक्रम संवत—————- 2082
गुजराती संवत————– 2081
शक संवत—————— 1947
कलि संवत—————– 5126
सूर्योदय————– 05:28:18
सूर्यास्त—————- 19:03:46
दिन काल———— 13:35:27
रात्री काल————- 10:24:08
चंद्रास्त————– 13:57:06
चंद्रोदय—————- 26:21:26
लग्न—- वृषभ 6°57′ , 36°57′
सूर्य नक्षत्र————— कृत्तिका
चन्द्र नक्षत्र———– पूर्वा भाद्रपदा
नक्षत्र पाया——————- ताम्र

*🚩💮🚩 पद, चरण 🚩💮🚩*

सो—- पूर्वा भाद्रपदा 06:26:17

दा—- पूर्वा भाद्रपदा 12:07:28

दी—- पूर्वा भाद्रपदा 17:46:27

दू—-उत्तरा भाद्रपदा 23:23:17

थ—- उत्तरा भाद्रपदा 28:58:01

*💮🚩💮 ग्रह गोचर 💮🚩💮*

ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद
============================
सूर्य= वृषभ 06°49, कृतिका 4 ए
चन्द्र= कुम्भ 26°30 , पूo भा o 2 सो
बुध =मेष 27°52 ‘ कृतिका 1 अ
शु क्र= मीन 21°05, रेवती 2 दो
मंगल=कर्क 21°30 ‘ आश्लेषा’ 2 डू
गुरु=मिथुन 01°30 मृगशिरा, 3 का
शनि=मीन 05°88 ‘ उ o भा o , 1 दू
राहू=(व) मीन 29°52 पू o भा o, 3 दा
केतु= (व)कन्या 29°52 उ oफा o 1 टे
============================

*🚩💮🚩 शुभा$शुभ मुहूर्त 🚩💮🚩*

राहू काल 13:58 – 15:40 अशुभ
यम घंटा 05:28 – 07:10 अशुभ
गुली काल 08:52 – 10: 34अशुभ
अभिजित 11:49 – 12:43 शुभ
दूर मुहूर्त 10:00 – 10:54 अशुभ
दूर मुहूर्त 15:26 – 16:21 अशुभ
वर्ज्यम 26:44* – 28:14* अशुभ
प्रदोष 19:04 – 21:10 शुभ

🚩पंचक अहोरात्र अशुभ

💮चोघडिया, दिन
शुभ 05:28 – 07:10 शुभ
रोग 07:10 – 08:52 अशुभ
उद्वेग 08:52 – 10:34 अशुभ
चर 10:34 – 12:16 शुभ
लाभ 12:16 – 13:58 शुभ
अमृत 13:58 – 15:40 शुभ
काल 15:40 – 17:22 अशुभ
शुभ 17:22 – 19:04 शुभ

🚩चोघडिया, रात
अमृत 19:04 – 20:22 शुभ
चर 20:22 – 21:40 शुभ
रोग 21:40 – 22:58 अशुभ
काल 22:58 – 24:16* अशुभ
लाभ 24:16* – 25:34* शुभ
उद्वेग 25:34* – 26:52* अशुभ
शुभ 26:52* – 28:10* शुभ
अमृत 28:10* – 29:28* शुभ

💮होरा, दिन
बृहस्पति 05:28 – 06:36
मंगल 06:36 – 07:44
सूर्य 07:44 – 08:52
शुक्र 08:52 – 10:00
बुध 10:00 – 11:08
चन्द्र 11:08 – 12:16
शनि 12:16 – 13:24
बृहस्पति 13:24 – 14:32
मंगल 14:32 – 15:40
सूर्य 15:40 – 16:48
शुक्र 16:48 – 17:56
बुध 17:56 – 19:04

🚩होरा, रात
चन्द्र 19:04 – 19:56
शनि 19:56 – 20:48
बृहस्पति 20:48 – 21:40
मंगल 21:40 – 22:32
सूर्य 22:32 – 23:24
शुक्र 23:24 – 24:16
बुध 24:16* – 25:08
चन्द्र 25:08* – 25:59
शनि 25:59* – 26:52
बृहस्पति 26:52* – 27:44
मंगल 27:44* – 28:36
सूर्य 28:36* – 29:28

*🚩उदयलग्न प्रवेशकाल 🚩*

वृषभ > 05:14 से 06:32 तक
मिथुन > 06:32 से 09:22 तक
कर्क > 09:22 से 11:36 तक
सिंह > 11:36 से 13:52 तक
कन्या > 13:52 से 16:08 तक
तुला > 16:08 से 18:20 तक
वृश्चिक > 18:20 से 20:44 तक
धनु > 20:44 से 22:54 तक
मकर > 22:54 से 00:38 तक
कुम्भ > 00:38 से 01:58 तक
मीन > 01:58 से 03:18 तक
मेष > 03:18 से 05:20 तक
=======================

*🚩विभिन्न शहरों का रेखांतर (समय)संस्कार*

(लगभग-वास्तविक समय के समीप)
दिल्ली +10मिनट——— जोधपुर -6 मिनट
जयपुर +5 मिनट—— अहमदाबाद-8 मिनट
कोटा +5 मिनट———— मुंबई-7 मिनट
लखनऊ +25 मिनट——–बीकानेर-5 मिनट
कोलकाता +54—–जैसलमेर -15 मिनट

*नोट*– दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है।
प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥
रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार ।
अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥
अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें ।
उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें ।
लाभ में व्यापार करें ।
रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें ।
काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है ।
अमृत में सभी शुभ कार्य करें ।

*💮दिशा शूल ज्ञान————-दक्षिण*
परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो घी अथवा बेसन लड्डू खाके यात्रा कर सकते है l
इस मंत्र का उच्चारण करें-:
*शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु च l*
*भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय: ll*

*🚩 अग्नि वास ज्ञान -:*
*यात्रा विवाह व्रत गोचरेषु,*
*चोलोपनिताद्यखिलव्रतेषु ।*
*दुर्गाविधानेषु सुत प्रसूतौ,*
*नैवाग्नि चक्रं परिचिन्तनियं ।।* *महारुद्र व्रतेSमायां ग्रसतेन्द्वर्कास्त राहुणाम्*
*नित्यनैमित्यके कार्ये अग्निचक्रं न दर्शायेत् ।।*

15 + 10 + 5 + 1 = 31 ÷ 4 = 3 शेष
मृत्यु लोक पर अग्नि वास हवन के लिए शुभ कारक है l

*🚩💮 ग्रह मुख आहुति ज्ञान 💮🚩*

सूर्य नक्षत्र से अगले 3 नक्षत्र गणना के आधार पर क्रमानुसार सूर्य , बुध , शुक्र , शनि , चन्द्र , मंगल , गुरु , राहु केतु आहुति जानें । शुभ ग्रह की आहुति हवनादि कृत्य शुभपद होता है

राहु ग्रह मुखहुति

*💮 शिव वास एवं फल -:*

25 + 25 + 5 = 55 ÷ 7 = 6 शेष

क्रीड़ायां = शोक , दुःख कारक

*🚩भद्रा वास एवं फल -:*

*स्वर्गे भद्रा धनं धान्यं ,पाताले च धनागम:।*
*मृत्युलोके यदा भद्रा सर्वकार्य विनाशिनी।।*

दोपहर 14:16 से 25:22 तक

मृत्यु लोक = सर्वकार्य विनाशिनी

*💮🚩 विशेष जानकारी 🚩💮*

*विश्व वैदिक विविधता दिवस*

*💮🚩💮 शुभ विचार 💮🚩💮*

यस्मिन रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः ।
निग्रहाऽनुग्रहोनास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ।।
।। चा o नी o।।

जिसके डाटने से सामने वाले के मन में डर नहीं पैदा होता और प्रसन्न होने के बाद जो सामने वाले को कुछ देता नहीं है. वो ना किसी की रक्षा कर सकता है ना किसी को नियंत्रित कर सकता है. ऐसा आदमी भला क्या कर सकता है.

*🚩💮🚩 सुभाषितानि 🚩💮🚩*

गीता -: मोक्षसंन्यासयोग:- अo-18

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।,
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥,

क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है॥,11॥,

*💮🚩 दैनिक राशिफल 🚩💮*

देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत ।।

🐏मेष
मेहनत का फल मिलेगा। घर-बाहर पूछ-परख रहेगी। थकान रहेगी। धन प्राप्ति सुगम होगी। प्रसन्नता रहेगी। भूमि, आवास की समस्या रह सकती है। आजीविका में नवीन प्रस्ताव मिलेगा। दांपत्य जीवन सुखद रहेगा। संतान से कष्ट रहेगा।

🐂वृष
भूले-बिसरे साथियों से मुलाकात होगी। उत्साहवर्धक सूचना मिलेगी। मान बढ़ेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। अपनी बुद्धिमत्ता से आप सही निर्णय लेने में सक्षम होंगे। विकास की योजनाएं बनेंगी। निजीजनों में असंतोष हो सकता है। व्यापार में इच्छित लाभ होगा।

👫मिथुन
भाग्योन्नति के प्रयास सफल रहेंगे। भेंट व उपहार की प्राप्ति होगी। यात्रा, निवेश व नौकरी मनोनुकूल रहेंगे। जोखिम न लें। व्यावसायिक चिंता दूर हो सकेगी। स्वयं के सामर्थ्य से ही भाग्योन्नति के अवसर आएंगे। योजनाएं फलीभूत होंगी।

🦀कर्क
वाहन व मशीनरी के प्रयोग में सावधानी रखें। वस्तुएं संभालकर रखें। स्वास्थ्य पर व्यय होगा। विवाद न करें। यात्रा में अपनी वस्तुओं को संभालकर रखें। कर्म के प्रति पूर्ण समर्पण व उत्साह रखें। अधीनस्थों की ओर ध्यान दें। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी।

🐅सिंह
बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। आय बढ़ेगी। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। अपने व्यसनों पर नियंत्रण रखते हुए कार्य करना चाहिए। व्यापार में कर्मचारियों पर अधिक विश्वास न करें। आर्थिक स्थिति मध्यम रहेगी।

🙍‍♀️कन्या
नए अनुबंध होंगे। यात्रा, निवेश व नौकरी मनोनुकूल रहेंगे। झंझटों में न पड़ें। शत्रु सक्रिय रहेंगे। कार्य की प्रवृत्ति में यथार्थता व व्यावहारिकता का समावेश आवश्यक है। व्यापार में नई योजनाओं पर कार्य नहीं होंगे। जीवनसाथी का ध्यान रखें।

⚖️तुला
धर्म-कर्म में रुचि बढ़ेगी। राजकीय बाधा दूर होगी। वरिष्ठजन सहयोग करेंगे। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। बुद्धि एवं तर्क से कार्य में सफलता के योग बनेंगे। यात्रा कष्टप्रद हो सकती है। अतः उसका परित्याग करें। व्यापार लाभप्रद रहेगा।

🦂वृश्चिक
समय ठीक नहीं है। वाहन, मशीनरी व अग्नि के प्रयोग में सावधानी रखें। लेन-देन में सावधानी रखें। विवाद न करें। दांपत्य जीवन सुखद रहेगा। सकारात्मक विचारों के कारण प्रगति के योग आएंगे। कार्यपद्धति में विश्वसनीयता बनाए रखें।

🏹धनु
प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। राजकीय काम बनेंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा। चिंता रहेगी। जोखिम न उठाएं। संतान से मदद मिलेगी। आर्थिक स्थिति में प्रगति की संभावना है। अचानक धन की प्राप्ति के योग हैं। क्रोध एवं उत्तेजना पर संयम रखें।

🐊मकर
संपत्ति के कार्य लाभ देंगे। परीक्षा व साक्षात्कार आदि में सफलता मिलेगी। प्रसन्नता रहेगी। धनार्जन होगा। समाज में प्रसिद्धि के कारण सम्मान में बढ़ौत्री होगी। आजीविका में नवीन प्रस्ताव मिलेंगे। परिवार की समस्याओं को अनदेखा न करें।

🍯कुंभ
किसी आनंदोत्सव में भाग लेने का अवसर मिलेगा। रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा। कामकाज में धैर्य रखने से सफलता मिल सकेगी। योजनाएं फलीभूत होंगी। मित्रों में आपका वर्चस्व बढ़ेगा। स्वास्थ्य की ओर ध्यान दें।

🐟मीन
दूसरों से अपेक्षा न करें। चिंता तथा तनाव रहेंगे। थकान रहेगी। जोखिम न लें। विवाद से बचें। राजकीय सहयोग मिलेगा एवं इस क्षेत्र के व्यक्तियों से संबंध बढ़ेंगे। विद्यार्थियों को प्रतियोगिता में सफलता मिलेगी। व्यापार अच्छा चलेगा। वाणी पर संयम रखें।

*🚩आपका दिन मंगलमय हो🚩*

*🛕जय श्री कृष्ण🙏*

*🌳क्यों किया भगवान ने 16108 राजकुमारियों से विवाह🌳*

भौमासुर नाम का एक असुर था। भौमासुर का एक नाम नरकासुर भी था। वह मूर्तिमती पृथ्वी का पुत्र था। असुर सदैव ही द्रोही होते हैं।

अत्यधिक शक्तिशाली हो जाने पर भौमासुर ने वरुण देव के सिंहासन का छत्र छीन लिया था। देवताओं की माता अदिति के कर्णफूल लेकर भौमासुर ने स्वर्ग लोक पर विजय प्राप्त कर ली थी। उसके दिनोंदिन बढ़ते उत्पातों के बारे में भगवान श्री कृष्ण को सूचित करने इंद्रदेव स्वर्ग लोक से द्वारिका आये। इंद्र देव से भौमासुर के विषय में सुनकर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरूड़ पे सवार होकर तत्काल ही भौमासुर के निवास स्थान की ओर प्रस्थान किया।

निम्न योनि से लेकर उच्च योनि देवता आदि सभी श्री भगवान की कृपा पर ही आश्रित है किन्तु अहंकार वश भूल जाते है। खुद को ही कर्ता धर्ता समझ कर उत्पात शुरू कर देते हैं।

भगवान श्री कृष्ण जब असुर के समक्ष आए तो शक्तिशाली असुर और उसकी सेना भगवान पर खड्ग ,गदा ,भाला ,बाण और त्रिशूल आदि अनेक आयुधों की वर्षा करने लगे।

श्री भगवान की असीम शक्ति का उसे तनिक भी अनुमान न था। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी समस्त सेना, सेनापति और आयुधों को नष्ट कर दिया।

जब उसने देखा की श्री भगवान ने उसके सभी सैनिकों सेनापतियों का संहार कर दिया है तो वह अत्यंत क्रुद्ध हुआ। और छल पूर्वक युद्ध करने लगा। श्री भगवान गरुड़ की पीठ पर बैठ युद्ध कर रहे थे। भौमासुर ने अनेको प्रकार के छल का प्रयोग किया किन्तु उसको समझ आने लगा की उसका कोई भी छल श्री कृष्ण पर काम नहीं करेगा और उसे ज्ञात हो गया श्री कृष्ण का वध करने की समस्त चातुरी में उसे निराशा ही प्राप्त होगी। फिर भी उसने त्रिशूल लेकर अंतिम बार श्री कृष्ण पर प्रहार करने का प्रयास किया। त्रिशूल उन तक आ पाता इसके पूर्व ही श्री भगवान के सुदर्शन चक्र ने भौमासुर का सिर काट दिया। कर्णफूलों और मुकुट से सुशोभित उसका सिर भूमि पे गिर पड़ा।

संत जन श्री भगवान का यशोगान करने लगे और स्वर्ग के देवता पुष्प वर्षा करने लगे।
इस समय मूर्तिमती पृथ्वी भगवान श्री कृष्ण के समक्ष आई उन्होंने बैजंती रत्नों की माला से श्री भगवान का स्वागत किया और सम्पूर्ण जगत के स्वामी भगवान श्री कृष्ण की स्तुति करने लगीं। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया और अत्यंत भक्तिभाव पूर्वक कहा :-शंख ,चक्र,गदा और पद्म के चारो चिन्हों से विभूषित समस्त देवताओं के ईश्वर आपको मेरा सादर प्रणाम है। प्रिय भगवान आप परमात्मा हैं! अपने भक्तों की कामना संतुष्ट करने के हेतु आप अपने विभिन्न दिव्य अवतारों में पृथ्वी पर अवतीर्ण होते हैं। आप समस्त प्रकार के धर्म यश, सम्पति ज्ञान और वैराग्य के सागर हैं। नाथ आप अजन्मा हैं फिर भी वासुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं। आप समस्त कारणों के परम कारण है। प्रिय भगवान जहाँ तक तीनो देवताओं –ब्रम्हा ,विष्णु तथा महेश –का प्रश्न है वे भी आपसे स्वतंत्र नहीं हैं। जब सृष्टि के निर्माण की आवश्यकता होती है तब आप रजोगुणी आविर्भाव ब्रम्हा की रचना करते है। जब आप सृष्टि का पालन करना चाहते है तब श्री विष्णु के रूप में विस्तार करतें हैं।
इसी भांति आप तमोगुण के स्वामी शिव के रूप में प्रकट होते हैं और समस्त सृष्टि का संहार करते हैं.प्रिय भगवान आप ही प्रकृति है.एकमात्र आप ही जगत के परम ईश्वर हैं।

जब भगवान श्री कृष्ण ने पृथ्वीमाता की स्तुति सुनी तो उन्होंने उनको समस्त भय प्रद स्थितियों से मुक्त कर दिया। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने भौमासुर के महल में प्रवेश किया। भौमासुर के महल में श्री भगवान ने सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों को देखा, जिनका हरण करके उसने उन्हें बंदी बना रखा था।

जब राजकुमारियों ने महल में प्रवेश करते हुए श्री भगवान को देखा तो तत्काल भगवान के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गई उनकी अहैतुकी दया की प्रार्थना करने लगीं। वे सब की सब विधाता से प्रार्थना करने लगी कि श्री कृष्ण उनके पति हों। राजकुमारियां श्री भगवान से बोली,,

हे प्रभु हम सब उस पापी भौमासुर के महल में वर्षो से बन्दी है और दूषित भी, हम अब यहाँ से मुक्त होकर भी किस प्रकार जीवित रहेंगी? हमकों प्रेम और सम्मान कि दृष्टि से कौन देखेगा ? हमारे लिए मर जाना ही श्रेष्ठ है।
हे स्वामी! हमने सुना हैं की आप श्री भगवान ही इस मृत्युलोक में अवतरित हुए हैं तो हे जगतपति आप ही हम सब पतित स्त्रियों का उद्धार किजिये अपने श्री चरण कमल की दासी बना कर। निष्ठापूर्वक तथा गंभीरता से उन्होंने विशुद्ध भक्तिभाव से अपने-अपने ह्रदय श्री कृष्ण भगवान के चरणकमलों में अर्पित किये। सबके ह्रदय में निवास करने वाले परम ब्रम्ह परमात्मा श्री कृष्ण उनकी निर्दोष इच्छा को समझ सकते थे और वे उन राजकुमारियों को पत्नी रूप में स्वीकार करने लिए सहमत हो गए.इस प्रकार उन्होंने उन सबके लिए उपयुक्त वस्त्रभूषणों का प्रबन्ध किया और प्रत्येक को पालकी पे बिठा द्वारिका भेज दिया।

द्वारिका जा कर श्री भगवान ने सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों के साथ विवाह का आयोजन किया। सोलह हजार एक सौ रूपो में अपना विस्तार करके श्री भगवान ने विभिन्न महलों में एक ही शुभ घड़ी में उन सबसे विवाह किया। इस प्रकार उन्होंने इस सत्य को स्थापित कर दिया कि अन्य कोई नहीं अपितु केवल श्री कृष्ण ही स्वमं भगवान हैं.उनके लिए कुछ भी असंम्भव नहीं हैं क्यूकि श्री कृष्ण ही परम ईश्वर हैं।

वे सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा अविनाशी है अत एव इस लीला में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। भगवान श्री कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के अलग -अलग महल थे और श्री भगवान सभी के साथ उनके अलग -अलग महलों में एक साथ उपस्थित रहते थे। उनकी पत्नियां इतनी सौभाग्यशाली थीं कि उन्हें पति रूप में श्री भगवान प्राप्त हुए। हमें सदैव स्मरण रहना चाहिए कि भगवान श्री कृष्ण एक मानव की भाँति अभिनय कर रहे थे। ब्रम्हा और महादेव जैसे महान देवता भी लीला पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण की लीलाओं को समझने में असमर्थ रहते हैं।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।*

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