*आज भी प्रासंगिक हैं भगवान महावीर के सिद्धांत*
देव भूमि जे के न्यूज –
(संदीप सृजन-विभूति फीचर्स)
भगवान महावीर, जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर के रूप में तो धार्मिक मान्यता अनुसार संसार में पूजे ही जाते है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो वे संसार में मानवता के सच्चे मसीहा थे । उनका जीवन और शिक्षाएं न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और पर्यावरणीय संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। उनके अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य के सिद्धांत संसार के कल्याण के लिए है। महावीर ने अपने जीवन के माध्यम से मानवता को आत्म-शुद्धि और शांति का मार्ग दिखाया। उनके जीवन, दर्शन और शिक्षाओं की आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता है।
भगवान महावीर का जन्म आज से 2624 वर्ष पूर्व (599 ईसा पूर्व) वैशाली (वर्तमान बिहार, भारत) के कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ एक क्षत्रिय राजा थे और माता त्रिशला थीं । उनका मूल नाम वर्धमान था। बचपन से ही वर्धमान में करुणा और विचारशीलता के लक्षण दिखाई देने लगे थे। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब वे एक बार अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे, तो एक सांप को देखकर उनके मित्र डर गए, लेकिन वर्धमान ने उसे शांतिपूर्वक उठाकर सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया। यह घटना उनके अहिंसक स्वभाव का प्रारंभिक संकेत थी।
30 वर्ष की आयु में, अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद, वर्धमान ने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। उन्होंने अपने भाई नंदिवर्धन से आज्ञा ली और संन्यास ग्रहण किया। इसके बाद, वे साढ़े बारह वर्षों तक कठोर तपस्या में लीन रहे। 42 वर्ष की आयु में, ऋजुबालिका नदी के तट पर उन्हें कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ। कैवल्य ज्ञान प्राप्ति के बाद वे महावीर कहलाए, जिसका अर्थ है महान विजेता। अगले 30 वर्षों तक, महावीर ने भारत के विभिन्न हिस्सों में यात्रा की और अपनी शिक्षाओं का प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में, पावापुरी (बिहार) में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, जिसे जैन परंपरा में मोक्ष कहा जाता है।
महावीर का दर्शन जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर आधारित है, जो पांच महाव्रतों पर केंद्रित है- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य। ये सिद्धांत केवल संन्यासियों के लिए ही नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए भी अनुकरणीय हैं।
*अहिंसा*
महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च धर्म माना। उनके अनुसार, हिंसा केवल शारीरिक रूप में ही नहीं, बल्कि मन और वचन से भी नहीं होनी चाहिए। वे कहते थे कि प्रत्येक जीव में आत्मा निवास करती है, और हर आत्मा का सम्मान करना मानव का कर्तव्य है।
*सत्य*
सत्य महावीर के दर्शन का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ था। वे मानते थे कि सत्य बोलना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे जीवन में उतारना आवश्यक है।
*अपरिग्रह*
महावीर का अपरिग्रह का सिद्धांत आज के उपभोक्तावादी समाज के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। वे कहते थे कि आवश्यकता से अधिक संचय करना आत्मा को बंधन में डालता है। यह सिद्धांत हमें संतोष और सादगी की ओर ले जाता है।
*अचौर्य*
अचौर्य का अर्थ है चोरी न करना, चाहे वह भौतिक संपत्ति हो या किसी की भावनाएं। मन की वृत्ति पर नियंत्रण रखने का सूत्र है महावीर का यह सिद्धांत।
*ब्रह्मचर्य*
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य इंद्रियों पर नियंत्रण और संयम से है। ये मार्ग भोग का त्याग कर योग की तरफ जाने का है।
महावीर का मानना था कि ये गुण मानव को नैतिकता और आत्म-संयम की ओर ले जाते हैं।
महावीर ने कर्म सिद्धांत को जैन दर्शन का आधार बनाया। उनके अनुसार, हर क्रिया का एक परिणाम होता है, जो आत्मा को कर्मों के बंधन में जकड़ता है। इन बंधनों से मुक्ति के लिए आत्म-ज्ञान और तपस्या आवश्यक है। वे कहते थे, “आत्मा स्वयं में शुद्ध और अनंत है, लेकिन अज्ञानता के कारण वह संसार में भटकती है।” यह विचार व्यक्तिगत जिम्मेदारी और आत्म-निर्भरता को प्रोत्साहित करता है।
एक बार एक शिष्य ने उनसे पूछा, “क्या भाग्य हमारा जीवन निर्धारित करता है?” महावीर ने कहा, “भाग्य तुम्हारे कर्मों का परिणाम है। अपने कर्मों को बदलो, तो भाग्य भी बदलेगा।” यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन के निर्माता स्वयं हैं।
महावीर का जीवन और शिक्षाएं मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके विचारों ने भारतीय संस्कृति, समाज और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया।
*सामाजिक सुधार*
महावीर ने जाति-प्रथा और सामाजिक असमानता का विरोध किया। उनके अनुसार, सभी जीव आत्मा के स्तर पर समान हैं। एक बार एक निम्न जाति के व्यक्ति ने उनसे पूछा, “क्या मैं भी मोक्ष प्राप्त कर सकता हूं?” महावीर ने कहा, “मोक्ष जाति या वर्ण से नहीं, कर्म और ज्ञान से प्राप्त होता है।” यह विचार उस समय के सामाजिक ढांचे के खिलाफ क्रांतिकारी था।
*पर्यावरण संरक्षण*
महावीर की अहिंसा का सिद्धांत प्रकृति और पर्यावरण तक विस्तृत था। जैन धर्म में पेड़-पौधों और सूक्ष्म जीवों की रक्षा का जोर उनकी शिक्षाओं से प्रेरित है। आज के जलवायु संकट के दौर में यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है। वे कहते थे, “प्रकृति के साथ हिंसा स्वयं के साथ हिंसा है।”
*शांति और करुणा*
महावीर का जीवन शांति और करुणा का संदेश देता है। उन्होंने युद्ध और हिंसा का विरोध किया और लोगों को प्रेम और सहानुभूति के साथ जीने की प्रेरणा दी। उनकी यह शिक्षा विश्व शांति के लिए आज भी महत्वपूर्ण है।
*महावीर की तपस्या और त्याग*
महावीर की 12 वर्षों की तपस्या उनके संकल्प और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक है। वे नंगे पांव घूमे, कांटों पर चले, गर्मी और सर्दी सहन की, और कई बार भूखे-प्यासे रहे। एक कथा के अनुसार, एक बार एक चरवाहे ने उनके कानों में कील ठोक दी, लेकिन महावीर ने क्रोध या प्रतिशोध की भावना नहीं दिखाई। उनकी यह तपस्या हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति बाहरी परिस्थितियों को सहन करने में नहीं, बल्कि मन को वश में करने में है।
आज के युग में, जहां हिंसा, लालच और असमानता अपने चरम पर हैं, महावीर की शिक्षाएं एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर सकती हैं। महावीर का संदेश व्यक्तिगत जीवन में संयम और नैतिकता लाता है। उनकी अपरिग्रह की शिक्षा हमें सादगी और संतोष सिखाती है, जो आज के भौतिकवादी समाज में दुर्लभ है। उदाहरण के लिए, यदि हम उनकी सलाह मानें और केवल आवश्यक वस्तुओं का उपयोग करें, तो हमारा जीवन अधिक शांतिपूर्ण और तनावमुक्त हो सकता है। उनके सिद्धांत सामाजिक न्याय और समानता की नींव रखते हैं। आज जब विश्व विभिन्न संघर्षों से जूझ रहा है, महावीर का शांति और करुणा का संदेश हमें एकजुटता की ओर ले जा सकता है। उनकी अहिंसा का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि हिंसा से समस्याएं हल नहीं होतीं, बल्कि संवाद और समझदारी से ही शांति संभव है।
महावीर की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता आज के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी शिक्षाएं हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने की प्रेरणा देती हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम उनके अहिंसा के सिद्धांत को अपनाएं और मांसाहार त्याग दें, तो इससे पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भगवान महावीर मानवता के सच्चे मसीहा थे। उनका जीवन एक प्रकाश स्तंभ है, जो हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाता है। उनकी शिक्षाएं अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य सार्वभौमिक हैं और हर धर्म, हर समाज के लिए प्रासंगिक हैं। वे हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची विजय वह नहीं जो दूसरों पर हासिल की जाए, बल्कि वह जो स्वयं पर प्राप्त की जाए।
महावीर के सिद्धांत हमें यह विश्वास दिलाते है कि प्रत्येक व्यक्ति में वह शक्ति है जो संसार को बदल सकती है। उनकी तपस्या, उनका त्याग और उनकी करुणा हमें यह सिखाती है कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल सुख भोगना नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करना है। इसलिए, भगवान महावीर को केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के एक महान मार्गदर्शक और मसीहा के रूप में याद किया जाना चाहिए।
*भगवान श्री महावीर जी*
(स्वामी गोपाल आनन्द बाबा – विभूति फीचर्स)
प्राचीन राजपूताना अब राजस्थान कहलाता है। इस प्रदेश के जनपद सवाई माधोपुर में मुख्यालय से कुछ ही दूर पर श्री महावीर जी का मंदिर अवस्थित है। वास्तव में गोमाता की कृपा से यहां भगवान महावीर की प्रतिमा का प्राकट्य हुआ था, जिन्हें यहां विराजमान कराया गया। सारे भारत की तरह राजपूताना (राजस्थान) में भी छोटे-बड़े रियासती राज्य कायम थे। भारत वर्ष की राजनीतिक एकता विदेशी शासकों के आधीन थी। ऐसे ही समय में 18वीं सदी ई. के मध्य की यह एक चमत्कारी घटना है। ग्राम चांदनपुर गम्भीर नदी के तट पर बसा हुआ था, जहां एक चतरा मोची का निवास था। उसके परिवार में महत्वपूर्ण थी उसकी धर्मपत्नी लक्ष्मी एवं गाय धोरी। नित्य दिन धोरी गाय को चराने के लिए चरवाहा ग्वाला ले जाता था और शाम को आकर धोरी अच्छी मात्रा में दूध देती और पुन: प्रात: भी दूध देती जिससे चतरा का सपरिवार पालन-पोषण हो जाता था।
लेकिन एक दिन धोरी ने दूध देना बन्द कर दिया। कई दिन तक जब गाय ने दूध नहीं दिया तब चतरा चिन्तित हो उठा। तब उसने पत्नी लक्ष्मी को कहा कि हमें यह ज्ञात करना ही होगा कि घोरी के दूध न देने का कारण क्या है? चतरा व लक्ष्मी चुपचाप धोरी के पीछे पीछे चले। ग्वाला सभी गायों को लेकर चराने सदा की भांति ही गया। इसी बीच धोरी एक ओर चल पड़ी। वह गम्भीर नदी के तट पर स्थित एक छोटे से टीले पर खड़ी हो गई और चारों थनों से दूध की धारा गिराने लगी। ऐसा लग रहा था कि गोमाता वहां भूमि का अपने दूध से अभिषेक कर रही है। दूसरे दिन चतरा ने गाय को जाने से रोकना चाहा, पर गाय न रुकी और सीधे उसी टीले पर दूध की धार छोड़कर ही मानी। तब चतरा ने लक्ष्मी व ग्वाले से कहा कि अवश्य ही उस टीले के भीतर कोई दिव्य परमात्म तत्व विराजमान है, जिसका खुदाई करके पता करना ही चाहिए। तब उन्होंने वहां की सावधानी पूर्वक खुदाई की तो भगवान महावीर की देव प्रतिमा निकल पड़ी। उन्होंने यह बात चांदनपुर वासियों को बताई। सबने मिलकर तय किया कि एक भव्य मंदिर बनाया जाए और उसमें भगवान महावीर को बैठाया जाए। मंदिर बनकर तैयार हुआ तो लोगों ने बैलगाड़ी पर मूर्ति को रखकर लाना चाहा, परन्तु मूर्ति अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई। कई बैलगाड़ियां लगाकर सभी गांव वासियों ने मिलकर प्रयास किया तब भी सफलता हाथ न लगी। तब अकस्मात धोरी गाय वहां आ गई और रम्भाने लगी। चतरा भी पहुंचा तो धोरी उसकी धोती मुंह से पकड़कर मूर्ति के निकट ले आई। अब चतरा ने जैसे ही मूर्ति को उठाने के लिए हाथ लगाया तो मूर्ति उसके स्पर्श से ही उठ गई और लोग बैलगाड़ी में लादकर मूर्ति को मंदिर तक लाए और चतरा के साथ ही मूर्ति को मंदिर के भीतर प्रतिष्ठित किया। विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की गई और भगवान श्री महावीर यहां पूज्य हो गए। उक्त स्थान तीर्थ स्थल बन गया। इस प्रकार गौमाता की कृपा से संसार ने भगवान महावीर के प्राकट्य का सौभाग्य प्राप्त किया। (विभूति फीचर्स)
