धर्म-कर्म

भारतीय संस्कृति में हिंदू धर्म बड़ा अच्छा धर्म हैं-महामंडलेश्वर अवधूत अरुण बाबा गिरी

यज्ञ ही जीवन है, जीवन ही यज्ञ है!

देवभूमि जे के न्यूज, ऋषिकेश!

भारतीय संस्कृति में हिंदू धर्म बड़ा अच्छा धर्म हैं, हिंदू धर्म की अधिकांश व्यवस्था बहुत ही अच्छी हैं। प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे- वर्ण और आश्रम। व्यक्तिगत संस्कार के लिए मनुष्य के जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे- (१) ब्रह्मचर्य (२) गृहस्थ (३) वानप्रस्थ (४) सन्यास।

उम्र के ५ साल तक बच्चा अपने माता -पिता के साथ रहता था और उसके बाद उसे गुरुकुल में भेज दिया जाता था। गुरुकुल में गुरु अपने शिष्यों को विविध विषयों की जिज्ञासा को शांत करते थे! मनुष्य का लोक व्यवहार, आचरण,जीवन जीने की कला कैसा हो? इत्यादि विषयों के बारे में बताते थे। इस आश्रम में शिष्य अपना जीवन शिक्षा ग्रहण करने में व्यतीत करते थे। ये सब चीज़े ब्रह्मचर्य में आते हैं और ये मनुष्य के आयु के २५ वर्ष तक रहता था। फिर उसके बाद गृहस्थश्रम हैं जो की २५ से ५० वर्ष तक रहता था। इसमें आदमी की शादी हो जाती है और आदमी का काम घर चलाने के लिए पैसे कमाना और घर के सभी व्यक्तियों का ध्यान रखना होता था। गृहस्थाश्रम में अर्थ, मोक्ष, धर्म और काम ये चार प्रमुख ध्येय होते थे। जब घर की जिम्मेदारियां ख़त्म हो जाती है, तो मनुष्य का काम धीरे धीरे अपना सामाजिक सामाजिक कार्य करने में लगता है और इसे वानप्रस्थश्रम कहते हैं, और ये मनुष्य के ५० से वर्ष७५ वर्ष के आयु तक रहता है। संन्यासाश्रम में मनुष्य अपना ध्यान घर से पूरी तरह हटाकर सामाजिक कार्य में लगा देता था। जब मनुष्य की आयु वर्ष७५ वर्ष बहुत ज्यादा हो जाती है तब इस आश्रम के अनुसार उसे संन्यासी जीवन व्यतीत करना होता है। इस आश्रम का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति का होता था। इस तरह मनुष्य का जीवन चार भागों में बाँटा गया था। संन्यास आश्रम में मनुष्य अपना ध्यान घर से पूरी तरह से अलग हो जाती था, तब इस आश्रम के अनुसार उसे जीवन व्यतीत करना होता था। इस आश्रम का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति का होता था। इस तरह मनुष्य का जीवन चार भागों में बाँटा गया था। था।
इस समय जहां हम अपनी कला-संस्कृति को बचाने, संजोने और सहेजने को लेकर एक तरह का उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। भारतीय जीवन पद्धति को और भी उन्नत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे जो दोष पध्दिति में घर करते गए, हम उन्हें दूर करने का प्रयास करें तभी सच्चे रूप में उन्नति और स्वस्थय जीवन जीने की परिकल्पना सार्थक
हो सकती है। संस्कृतिक ही किसी देश, समाज या जाति का प्राण है। वहीं से इन्हें जीवन मिलता है। किसी भी देश की सामाजिक प्रथाएं, व्यवहार, आचार-विचार, पर्व, त्योहार, सामुदायिक जीवन का संपूर्ण ढांचा ही संस्कृति और जीवन की नींव पर खड़ा रहता है। यह संस्कृति की धारा जिस दिन टूट जाती है, उसी दिन से उस समाज का बाह्य ढांचा भी बदल जाता है। संस्कृति के नष्ट होते ही किसी सभ्यता का भवन ही लड़खड़ाकर गिर जाता है। हां जी नितांत आवश्यक हो गया है कि हम अपनी पुरानी संस्कृति परंपरा पुरानी संस्कृति को जीवंत रखें और अपनी धार्मिक परंपराओं के विषय में जानें , अपनी पुश्तैनी भाषा को बचाएं, परंपरागत व्यंजनों की विधि अगली पीढ़ी को सौंपें, संस्कृति की कला और तकनीकी को दूसरों से शेयर करें, समुदाय एवं समाज के अन्य सदस्यों के साथ समय बिताएं, सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व के उत्सवों का प्रबंधन और सहभागिता करें, संस्कृति पर गर्व करे, और उसे अपने आचरण में उतारने के लिए सभी को प्रेरित करने का प्रयास करें!
इसके अलावा यज्ञ का हमारे जीवन में बहुत ही महत्व है। हमारा जीवन यज्ञ है और यज्ञ ही जीवन है ।मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कार होते हैं 16 संस्कारों में यज्ञ की विधि को अपनाया जाता है। प्रत्येक संस्कार में छोटे अथवा बड़े स्तर पर यज्ञ और हवन पूजा पाठ की पद्धति हिंदू धर्म और संस्कृति में प्रमुखता से निभाई जाती है। इसलिए मनुष्य का जीवन यज्ञ के इर्द-गिर्द ही घूमता है, और हमें यज्ञ को जीवन में आत्मसात करने की नितांत आवश्यकता है। जिससे कि हमारा हिंदू धर्म और मजबूत हो सके और यज्ञ से हर प्रकार के संकट से मुक्ति मिलती है। इसलिए हमारे ग्रंथों ने यज्ञ को जीवन से जोड़ा है।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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