धर्म-कर्महरिद्वार

माॅ गंगा की पाती अपने बेटे बेटियों के नाम!

कलयुग के कथित मेरे बुद्विजीवी बेटे-बेटियोंः-

देवभूमि जे के न्यूज़!

‘‘मैं तुम्हें आशीष तो दे नहीे सकती क्योंकि मेरी शक्ति को तुमने क्षीण कर दिया है।’’

’’तुमने पढ़ा होगा की मेैं स्वर्ग से इस धरती पर भागीरथ प्रयास से आयी, भागीरथ से पहले उनकी कितनी पिढि़यां मुझे लाने के प्रयास में समाप्त हो गई, क्योंकि मैं जानती थी कि धरती पर जाना अपना अपमान करवाना है। परन्तु मेरे पुत्र भागीरथ के जिद के आगे मुझे झूकना पड़ा। एक माँ अपने बेटे-बेटियों के आगेअपना सारा सुख भूलकर उनके सुख के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। भागीरथ ने भी ऐसा ही किया। बिना अन्न-जल केवल हवा पीकर एक पैर पर खड़ा होकर हठयोग द्वारा जिद् करने लगा, फिर तो मुझे झूकना ही था। मैं स्वर्गिक सुख त्याग कर सागर के पुत्रों सहित समस्त जगत के कल्याण के लिये इस धरती पर आयी। कुछ सालों तक मैं इठलाती, बलखाती, लहराती अपने बहनों के साथ जीवों का कल्याण करती रही। हम यमुना, सरस्वती, कावेरी, सतजल नर्मदा, घाघरा सहित अनेक बहनें जनकल्याण में लगी रही, पर तुम लोगों के बर्ताव ने हमें मुत्यु शय्या पर पहुँचा दिया। सरस्वती सहित हमारी कई बहनेें, तुम्हारे कारण काल कवलित हो गई। यमुना मृत्यु शया पर पड़ी अंतिम सांसे ले रहीं है।

हमारे इलाज के लिये तुम लोग अनेको झूठे प्रयास करते हो, कभी विदेश में इलाज की बात, कभी स्वंय, तो कभी गहन चिकित्सा (वेनटीलेटर) की बात करते हो खाली थोथी हो हल्ला मचाते हो, तुम्हारे शोर सुनकर अड़ोसी-पड़ोसी भी खुले दिल से अरबो रूपये देते है, और कहते हैं भई अपनी माँ को अच्छे से अच्छे डाक्टर को दिखाओं अनका इलाज कराओ तुम तो रूपये लेकर उनसे वादा करते हो कि अबकी बार मै जरूर बढि़या से बढि़या इलाज कराऊॅगा पर मेरी दुर्भाग्य दवा के लिये मैं टकटकी लगाये देखती रह जाती, विभिन्न वेष पकड़कर तुम लोग मेरे इलाज के लिये दिन रात चन्दा एकत्रित करने में लगे हो परन्तु मेरा इलाज केवल दवा और इंजेक्शन दिखाने तक ही सीमित होकर रह जाती है।

दिनों दिन मेरे पुत्र मेरी सेवा सुश्रा के नाम पर अनेको योजना बनाते है चिखते है चिल्लाते है कहते है अब की बार मैं माँ के लिये अलग व्यवस्था, इलाज करूँगा।‘‘आप मुझे मुखिया बना दो, मुझे जिम्मेदारी दे दो और जिम्मेदारी मिलते ही मौन हो जाते है’’।

सेवा और मुक्ति हेतु तुम अपने घर के सुखे फुल पौधे, माला, पूजाघर के कच्चरे, मल-मुत्र सिविर की गन्दगी रोज टनों मुझमें डालते हो और अपने गन्दे कपडे, कूड़ा कारखानों के गन्दे पानी सब कुछ मुझमें डालते हो और तो और तुम्हारे साथी, नाते-रिस्तेदार, पशु-पक्षी मरते है तो उन्हें मुझमें प्रवाहित करते हो, उफ् मै निर्मल हृदय इस गन्दगी को कैसे सहन करूं! मेरी सहन शक्ति समाप्त हो रही है।

माँ का नाम ही काफी होता है तुम जैसे ही मेरा नाम लेते हो तुम्हारा कल्याण उद्धार तुम्हारी देखभाल के लिये मेरा तन -मन व्यथित हो जाता है। मैं पुरी शक्ति से तुम्हारे लालन-पालन के लिये व्यथित हो जाती हूँ। अपने खुन से तुम्हारे खेतों को सींच कर अन्न उपजाकर तुम्हारे शरीर का पोशण करती हूँ। बड़े-बड़े पेड़ उगाकर तुम्हारें लिये आक्सीजन पैदा कर तुममें सांस भरती हूँ। मेरे षीतल जल पीकर तुम्हारे शरीर का पोशण करती हूँ। मेरा अंश तुम्हारे शरीर में दो तिहाई है। फिर भी न जाने तुम्हारा बर्ताव मेरे प्रति ऐसा क्यों है? मैं अपना सारा जीवन तुम्हारे सुख-सुविधा, लालन-पालन में लगा दिया। परिणाम स्वरूप मेरे पूरे शरीर पर गोमुख से गंगा सागर तक ऐसा कोई जगह नहीं बचा है जहाँ तुमने अपनी घृृणित हरकतों से मुझे जख्मी किया हो मैं अपनी षरीर, आत्मा अपनी अस्तित्व के लिये हाथ जोड़ती हँू मुझे बचा लो -बचा लो।

मेरा शरीर जर्जर हो चुका है मुझे दवा की बजाय तुम मेरे जख्मों पर नमक मत छिड़को दुनिया के सामने इलाज के नाम पर झूठ का सहारा लेकर मुझे मत सताओं।

जगत कल्याण के लिये मैं अनवरत अविरल बहना चाहती हूॅ। मुझे मरणासन्न की अवस्था में जाने से पहले मुझे बचालो।

मैं मरना नही चाहती मेरे बच्चों! तुम्हारे कल्याण, लालन-पालन के लिये जीना चाहती हूॅ।
क्योंकि मैं मेरी बहनों के साथ जिस दिन मरी, तुम्हारा भी सत्यानाश हो जायेगा। और एक माँ अपने बच्चों को मरते हुए, उसकी हस्ती को मिटते हुए, देख नही सकती -देख नही सकती।

‘‘ मुझे (गंगा) बचावों, जीवन बचावों’’

लेखक
जयकुमार तिवारी
ऋषिकेश
दूरभाष
9411361877

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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