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लॉकडाउन:हमारी संयम, समझदारी,सब्र, सजगता की परीक्षा!

लॉकडाउन के समय खुद को मानसिक अवसाद से ग्रस्त नहीं करें, बस थोड़ा सा इंतजार कर लें..!!

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!
कहा गया है कि किश्तियां अक्सर किनारों के पास हीं डूब जाती हैं..!!

आइए इसी थीम पर आधारित एक कहानी आप सबको को सुनाता हूँ…!!

“बहुत दिनों पहले की बात है एक मूर्ख और कंजूस राजा के दरबार में एक नाटकमंडली आता है और दरबार में नाटक करने की अनुमति के लिए राजा से प्रार्थना करता है…!

राजा चूंकि मूर्ख और कंजूस है इसलिए उनलोगों को टालने के लिए उनसे बोलते हैं कि उन्हें किसी भी तरह के नृत्य और नाटक से घृणा है इसलिए वे लोग वापस जा सकते हैं…!!

यह सुनकर नाटक पार्टी के प्रबंधक ने कहा, “महाराज हमलोग शैक्षणिक नाटक करते हैं, यदि हमें नाटक करने की अनुमति दी जाती है तो आपके दरबारियों को बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा…!!

अब बात विद्वत्ता की आ चूकी थी इसलिए राजा था तो मूर्ख लेकिन अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए उसने दरबार में नवरत्नों को पाल रखे थे…!!

तुरंत राजा ने अपने महामंत्री को बुलाया और कहा, “इस नाटक पार्टी के मैनेजर को अपने विद्वत्ता का बहुत घमंड है, इसे ऐसी शिक्षा दो कि इसे यह मालूम पड़ जाए कि हमलोग इससे ज्यादा विद्वान हैं…!!

महामंत्री ने तुरंत एक घड़े को पानी से लबालब भरकर नाटकपार्टी के मैनेजर के पास भेजा …मैनेजर ने घड़े को देखकर अपनी अंगूठी उतारी और घड़े में डालकर वापस महामंत्री के पास भेज दिया….!!

यह देखकर महामंत्री ने कहा, “महाराज, इनलोगों को नाटक करने की अनुमति जरूर दिया जाए क्योंकि ये लोग सच में बहुत विद्वान हैं..!!”

यह सुनकर राजा ने अपने महामंत्री से पूछा, “तुम कैसे समझे कि ये लोग विद्वान हैं?”

इसपर महामंत्री ने जबाव दिया “महाराज, मैने पानी से लबालब भरकर घड़ा भेजा यह संदेश देने के लिए कि हमारा राज्य हर गुण से लबालब भरा हुआ है और किसी बाहरी गुण की जरूरत नहीं है, इसलिए आपलोग जा सकते हैं, लेकिन भरे घड़े में अपनी अंगूठी डालकर वापस भेजते हुए उसने प्रतिउत्तर दिया कि आपके गुणों से लबालब भरे राज्य में भी हमारा गुण भी इस अंगूठी के तरह समा सकता है”….अतः महाराज इनलोगों को नाटक की अनुमति देना चाहिए…!!

राजा ने नाटक की अनुमति तो दे दिया साथ हीं उसने अपने सभी दरबारियों को सख्त आदेश भी दिया कि कोई भी नाटक के दौरान ना तो कोई उपहार देगा और ना हीं ताली बजाकर नाटककारों का हौसलाफजाई हीं करेगा…!!

अब नाटक आरम्भ हुआ… सम्पूर्ण नाटक छ: एपिसोड में था। पहले एपिसोड में कलाकारों ने बुलंद हौसले से भूमिकाएं निभाई लेकिन ना तो कोई ताली बजी और ना हीं कोई उपहार हीं मिला..!!

पहले एपिसोड में थोड़ी निराशा जरूर हुई लेकिन फिर भी कलाकारों ने अपने को संभालते हुए दूसरी एपीसोड, फिर तीसरी एपीसोड को सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया लेकिन ना तो कोई उपहार मिला और ना हीं ताली हीं बजी…!!

अब कलाकारों का हौसला टूटने लगा था ( जिस तरह लगातार तीन चार बार परीक्षा में असफल होने पर बहुत बहुत सारे विद्यार्थियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति डेवलप होने लगते हैं….)

टूटे हौसले के बावजूद भी चौथा एपिसोड प्रदर्शित किया गया लेकिन पांचवें एपिसोड के समय ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब अंतिम एपिसोड यानी की छठा एपिसोड खेला हीं नहीं जाएगा क्योंकि कलाकार हतोत्साहित होकर इधर उधर गिरने लगे थे…!!

अन्तिम समय में कलाकारों के इस हतोत्साह को देखकर नाटक पार्टी का प्रबंधक मंच पर आते हैं और संस्कृत में एक श्लोक बोलते हैं…”गते रे बहूतरे काले, अल्पे तदनु वर्तते; करुउ चित्त समाधानं, संजनं मन रंजनं…!”

(अर्थात् इतना समय तो इंतजार में गुजार दिए अब बचे हुए थोड़े समय के लिए इतनी बेचैनी क्यों??? अपने आप को संभालिए हो सकता है बचे हुए अल्प समय में हीं आपके मन की मुराद पूरी हो जाय…!!!”

मंच पर प्रबंधक का श्लोक खत्म हुआ हीं था कि राजकुमार ने अपना कीमती शॉल उपहार स्वरूप देते हुए जोर जोर से ताली बजाना शुरू कर दिया…!!

राजकुमारी ने अपना नौलखा हार उपहार स्वरूप भेंट कर ताली बजाना शुरू कर दिया..!!

उन दोनों को वैसा करते देख महामंत्री का बेटा अपने तलवार से अपने पिता का टिक (मंजूषा) हीं काट लेता है..!!

इधर टिक कटते हीं महामंत्री दु:खी होने के बजाय एक हाथ सिर पर और दुसरा हाथ कमर पर रखकर नृत्य शुरू कर देते हैं… !!

एक अनोखा मंजर बन चूका था..!!

एक दूसरा हीं नाटक आरम्भ हो चुका था..!!

यह सब देखकर राजा जोर से चिल्लाए और तत्क्षण दोनों नाटकों को रोक दिया गया…!!

अब राजा ने राजकुमार को बुलाकर पूछा, “मेरे मना करने के बावजूद आपने इतना कीमती शॉल उपहार में क्यों दिया?
राजकुमार ने बड़े हीं शालीनता से जवाब दिया, “पिताजी महाराज, शॉल चाहे जितना भी कीमती क्यों ना हो लेकिन वह आपके जीवन से ज्यादा कीमती नहीं था।

मेरी उम्र पचास वर्ष हो चुका है, अपने बीस वर्ष के उम्र से हीं मैं राजा बनने की ख्वाहिश लिए बैठा रहा हूँ लेकिन आप हैं कि गद्दी से ऐसे चिपके हुए हैं कि हटने का नाम हीं नहीं ले रहे!

इसलिए मैंने फैसला कर लिया था कि आपकी हत्या कर मैं सिंहासन पर कब्जा कर लुंगा…लेकिन इसके श्लोक का मर्म समझकर मैने अपना फैसला बदल दिया… जब मैं पचास वर्ष राजा बनने का इंतजार कर सकता हूँ तो दो चार वर्ष और सही फिर आपके मृत्युपरांत तो मैं राजा बनुंगा हीं…!!
अतः इनके श्लोक ने आपका जीवन बचाया और मुझे पितृहत्या के पाप से बचा लिया…!!!!
अब बताइए कि ज्यादा इनाम दे दिया????
राजा ने कहा, “नहीं बेटा तुमने बिल्कुल सही किया”

अब राजा ने राजकुमारी को बुलाकर पूछा, “तुम्हें तो पता था कि हार की कीमत नौ लाख रुपये है फिर भी तुमने इतना कीमती उपहार क्यों दिया???”

राजकुमारी ने गंभीर होते हुए जवाब दिया, “पिताजी महाराज, आप अपने राजकाज में इतना तल्लीन रहे कि आपको पता हीं नहीं चला कि आपकी बेटी कब बच्ची से बड़ी और बड़ी से बुढ़ी हो गयी…?
मेरी उम्र चालीस वर्ष हो चुकी है पिता जी लेकिन अभी तक आपने मेरी शादी नहीं करवाया..!
इसलिए मैंने आपके नौजर के साथ राजमहल छोड़ कर भाग जाने का फैसला कर लिया था‌ लेकिन इसके श्लोक ने मुझे फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया कि यदि चालीस वर्ष इंतजार कर सकती हूं तो दो चार वर्ष और सही…!!

राजा ने कहा, बेटी तुमने भी बहुत अच्छा किया ।

अब महामंत्री के पुत्र को बुलाकर पूछा गया, “तुमने अपने पिता की टिक क्यों काट लिया?”

उसने जवाब दिया, “महाराज मेरे धृष्ट पिता ने मुझे कोई शिक्षा नहीं दिया इसलिए सर्वत्र मैं मूर्ख के रूप में अपमानित होते रहता हूं इसलिए मैंने भी फैसला किया था कि अपने पिता को भरे दरबार में बेइज्जत करूंगा जो आज कर दिया। इसलिए टिक काटकर बेइज्जत कर दिया..!!

अब महामंत्री की बारी थी। राजा ने उससे पूछा, “टिक कटने पर तुम नाचने क्यो लगे?”

इसपर महामंत्री ने जवाब दिया, “महाराज जिस अभागे इन्सान को ऐसा कुपुत्र हो जो भरे दरबार में टिक काट ले वह कुपुत्र गला भी तो काट सकता था ना महाराज, गला बच गया इसी खुशी में नाच रहा था महाराज..!!”

तदुपरांत राजा ने सबसे पहले नाटककारों को ढेर सारा उपहार दिया, दूसरे हीं अपने पुत्र को राजा के रूप में राजतिलक करवाया, पड़ोसी राजा के बेटे से राजकुमारी की शादी करवाया और महामंत्री के मूर्ख-जपाट पुत्र को नैतिक शिक्षा प्राप्त करने हेतु गुरुकुल में भिजवाया..!!

मित्रों, सफलता के करीब पहुँच कर असफलता का भय हमें इतना हतोत्साहित कर देता है कि आसन्न सफलता को हम स्वयं असफलता में बदल देते हैं अतः हमें इस बात का ख्याल हमेशा रखना चाहिए कि किस्तियां अक्सर किनारे के पास डूब जाती हैं..!!

आइए इस लॉकडाउन के कालखण्ड को भी इसी परिपेक्ष्य में लेते हैं कि अब तो बस 13 दिन हीं बांकि है उसके बाद हम अपने‌ मानवता को Covid-19 के खतरे से बचाने में कामयाब हो जाएंगे… इसलिए इस लॉकडाउन के समय खुद को मानसिक अवसाद से ग्रस्त नहीं करें, बस थोड़ा सा इंतजार कर लें..!!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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28 Comments

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