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लॉकडाउन कब तक, स्टे होम कब तक?कोविड-19 और हर्ड इम्युनिटी!

देवभूमि जे के न्यूज ऋषिकेश!

कोविड-19 कोरोना वायरस ने दुनिया की आर्थिक और सामाजिक व्यव्हार को अभूतपूर्वक तरीके से प्रभावित किया है. विश्वयुद्धों के अलावा पिछले सौ वर्षों में ऐसा कोई अन्य कारक सामने नहीं आया था. हालांकि बीसवीं सदी के दुसरे दशक के उतरार्ध में फैली प्लेग महामारी के पश्चात यह पहला मौका है जब सम्पूर्ण विश्व इस तरह आहात और हताश है. हताशा के कई कारण हैं जिनमें से मुख्य है ‘अनिश्चितता’.

अनिश्चितता, अपने स्वास्थय की; अनिश्चितता, परिजनों/परिवार की सुरक्षा की; अनिश्चितता, रोज़गार की और अनिश्चितता, सामाजिक व्यव्हार की. इस अनिश्चितता के माहौल में समस्त राष्ट्र और उनके राष्ट्राध्यक्ष भी उचित निर्णय ले पाने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहे हैं. हालांकि सबकी प्राथमिकता इस महामारी के प्रसार को रोकना और इसका उपचार ढूँढना है लेकिन यह परिक्रिया समयबद्ध नहीं है. इसीलिए इसके प्रसार को रोकने के लिए कतिपय देशों ने लॉकडाउन, कर्फ्यू और सोशल डिस्टेंसिंग जैसी व्यवस्थाओं का सहारा लिया है. भारत के परिपेक्ष्य लॉकडाउन के प्रथम ट्रायल ‘जनता कर्फ्यू’ के दिन अधिकतर लोगों ने तो किसी फेस्टिव मूड साथ ताली/थाली बजाकर अपना समर्थन प्रदान कर दिया लेकिन धीरे-धीरे जब इसकी अवधि बढाई गई तो समाज में संशय भी बढ़ गया. आज लोग आपस में चर्चा करते हुए एक-दुसरे से पूछ रहे हैं की ‘लॉकडाउन कब तक, स्टे होम कब तक ?’.

हालांकि होम-स्टे, सोशल डिस्टेंसिंग या सामाजिक दूरी इस कोरोना माहामारी से लड्ने में एक मुख्य और कारगर रणनीति साबित हो सकती है. लेकिन सवाल उठता है की कब तक ? इसका उत्तर कई कारकों पर निर्भर करता है और उनमें से मुख्य है- झुंड प्रतिरक्षा (herd immunity).

झुंड प्रतिरक्षा या सामाजिक प्रतिरक्षा, संक्रामक रोगों से अप्रत्यक्ष संरक्षण का एक रूप है तो तब प्राप्त होता है जब आबादी का एक बड़ा प्रतिशत किसी संक्रमण के प्रति प्रतिरोधी बन जाता है फिर चाहे वह पिछले संक्रमण या टीकाकरण के माध्यम से हुआ हो. इस प्रकार यह उन व्यक्तियों के लिये सुरक्षा का एक उपाय है जो प्रतिरक्षित नहीं हैं. एक ऐसी आबादी जिसमें व्यक्तियों के एक बड़े हिस्से में प्रतिरक्षा होती है उनसे संक्रमण की श्रृंखला बाधित होने की अधिक संभावना होती है. यह आबादी या तो बीमारी के प्रसार को रोकती है या धीमा कर देती है। एक समुदाय में प्रतिरक्षित व्यक्तियों का अनुपात जितना अधिक होता है उतनी ही कम संभावना होती है कि गैर-प्रतिरक्षित व्यक्ति एक संक्रामक व्यक्ति के संपर्क में आएगा और गैर-प्रतिरक्षित व्यक्तियों को संक्रमण से बचाने में मदद करेगा। झुंड प्रतिरक्षा (herd immunity) के महत्व को सबसे पहले 1930 के दशक में स्वाभाविक रूप से होने वाली घटना के रूप में पहचाना गया था जब यह देखा गया था कि एक महत्वपूर्ण संख्या में बच्चों को खसरे से प्रतिरक्षित हो जाने के बाद, अतिसंवेदनशील बच्चों सहित नए संक्रमणों की संख्या अस्थायी रूप से कम हो गई. इसके आधार पर झुंड प्रतिरक्षा (herd immunity) को तत्कालीन जनसँख्या के उस प्रतिशत के तौर पर आँका जाता है जो प्रतिरक्षित हो चुका है. ऐसी स्थिति में उस विषाणु के संक्रमण और प्रसार की सम्भावना नगण्य हो जाती है. शने-शने महामारी ख़त्म हो जाती है और एक सामान्य बिमारी की श्रेणी में आ जाती है. शोध बताते हैं की झुंड प्रतिरक्षा (herd immunity) को प्राप्त करने के लिए जनसँख्या/समुदाय की दो-तिहाई आबादी का संक्रमित होना आवश्यक है. हालांकि लॉकडाउन/सामजिक दूरी बनाकर संक्रमण और मृत्यु दर को धीमे किया जा सकता है लेकिन उससे झुंड प्रतिरक्षा को प्राप्त करने में भी समय लगता है. ऐसे समय में जब इसकी दवा/टीके को बनने में लगभग 18 महीने का औसत समय लगता है ऐसे में वृहत जांच और लॉकडाउन/सामजिक दूरी कुछ हद तक मदद कर सकते है. लेकिन इसका मूल्य गिरती अर्थव्यवस्था के नकारात्मक परिणामों के रूप में चुकानी पड़ेगी जिसके कारण हाशिये पर खड़ा व्यक्ति अवसाद में आ सकता है.

बढती गर्मी में कोविड-19 के निष्क्रिय हो जाने के तर्क से वैज्ञानिक सहमत नहीं हैं. क्योंकि यह एक नया वायरस है इसलिए इसके व्यवहार के बारे में अनिश्चितता बरक़रार है. यदि ऐसा होता है तो ग्रीष्म ऋतू में छूट प्रदान की जा सकती है. पुराने अनुभव बताते हैं की इस महामारी का प्रभाव भी एक-दो साल तक रह सकता है इसलिए कुछ सामाजिक और यात्रा प्रतिबंधों के साथ लॉकडाउन को ख़त्म करना ही होगा. इसके साथ ही जांच को बहुत ही वृहद् स्तर पर लम्बे समय तक करना होगा और साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं को भी बूस्ट प्रदान करते हुए सरकारी नियंत्रण में लेना पड़ेगा वर्ना इस महामारी का विस्फोट देखने को मिल सकता है. महामारी के प्रभाव को सीमित रखने के लिए विषाणु वैज्ञानिकों द्वारा आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के साथ-साथ गणितीय प्रतिरूपण की मदद भी ली जा सकती है. इस हेतु सभी क्षमतावान देशों को अपने सुपर कंप्यूटरर्स भी नियोजित तरीक़े से इस कार्य में लगाने चाहिए.

शिवेंद्र ध्यानी की क़लम से!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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