ऋषिकेशधर्म-कर्म

*श्रीमद् भागवत पुराण एवं देवी भागवत पुराण के पंचम दिवस पर व्यास पीठ से मधु कैटभ बध एवं पूतना बध प्रसंग सुनाया*

देवभूमि जे के न्यूज 28/05/2022-

गुमानीवाला कैनाल रोड गली न 6 में पितरों की पुण्य स्मृति मे श्रीमद् भागवत पुराण एवं देवी भागवत पुराण के पंचम दिवस पर व्यास पीठ से मधु कैटभ बध एवं पूतना बध प्रसंग पर चर्चा ।

गुमानीवाला पर्यावरण विशेषज्ञ डा इंद्रमणि सेमवाल जी द्वारा अपने पितरों की पुण्य स्मृति मे सप्त दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा एवं देवी भागवत पुराण के पंचम दिवस के अवसर पर श्रीमद् भागवत कथा व्यास डा सतीश कृष्ण वत्सल नोटियाल जी एवम श्रीमद् देवी भागवत कथा व्यास आचार्य सचिदानंद डंगवाल जी अपने श्रीमुख से लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं मे पूतना वध का वर्णन करते हुए कहा कि दुष्टों की दुष्टता से संसार को मुक्त करने के लिए भगवान ने अनेक लीलाओं का दर्शन करवाया है जिसमें पूतना वध का वर्णन करते हुए डा सतीश चन्द्र वत्सल ने अपने श्री मुख से कहा कि पूतना कंस की दासी थी, जिसे उसने कृष्ण को मारने के उद्देश्य से गोकुल भेजा था। इसके संबंध में कई प्रकार के विवरण मिलते हैं। एक जगह इसे कंस की बहन और घटोदर राक्षस की पत्नी बताया गया है। आदि पुराण पूतना को कैतवी राक्षस की पुत्री और कंस की पत्नी की सखी बताता है। एक अन्य पुराण के अनुसार पूतना पूर्वजन्म में राजा बलि की पुत्री थी और इसका नाम रत्नमाला था। बलि के यहाँ यज्ञ के समय वामन भगवान को देखकर इसकी इच्छा हुई कि वामन मेरा पुत्र हो और मैं उसे स्तनपान कराऊं। उसकी यही इच्छा कृष्णावतार में पूरी हुई।
अपने विचार व्यक्त करते हुए डा वत्सल ने कहा कि कंस ढूंढ-ढूंढ कर नवजात शिशुओं का वध करवाने लगा। उसने पूतना नाम की एक क्रूर राक्षसी को ब्रज में भेजा। पूतना ने राक्षसी वेष तज कर अति मनोहर नारी का रूप धारण किया और आकाश मार्ग से गोकुल पहुँच गई। गोकुल में पहुँच कर वह सीधे नन्दबाबा के महल में गई और शिशु के रूप में सोते हुये श्रीकृष्ण को गोद में उठाकर अपना दूध पिलाने लगी। उसकी मनोहरता और सुन्दरता ने यशोदा और रोहिणी को भी मोहित कर लिया, इसलिये उन्होंने बालक को उठाने और दूध पिलाने से नहीं रोका।

पूतना के स्तनों में हलाहल विष लगा हुआ था। अन्तर्यामी श्रीकृष्ण सब जान गये और वे क्रोध करके अपने दोनों हाथों से उसका कुच थाम कर उसके प्राण सहित दुग्धपान करने लगे। उनके दुग्धपान से पूतना के मर्म स्थलों में अति पीड़ा होने लगी और उसके प्राण निकलने लगे। वह चीख-चीख कर कहने लगी- “अरे छोड़ दे! छोड़ दे! बस कर! बस कर!” वह बार-बार अपने हाथ पैर पटकने लगी और उसकी आँखें फट गईं। उसका सारा शरीर पसीने में लथपथ होकर व्याकुल हो गया। वह बड़े भयंकर स्वर में चिल्लाने लगी। उसकी भयंकर गर्जना से पृथ्वी, आकाश तथा अन्तरिक्ष गूँज उठे। बहुत से लोग बज्रपात समझ कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पूतना अपने राक्षसी स्वरूप को प्रकट कर धड़ाम से भूमि पर बज्र के समान गिरी, उसका सिर फट गया और उसके प्राण निकल गये। जब यशोदा, रोहिणी और गोपियों ने उसके गिरने की भयंकर आवाज को सुना, तब वे दौड़ी-दौड़ी उसके पास गईं। उन्होंने देखा कि बालक कृष्ण पूतना की छाती पर लेटा हुआ स्तनपान कर रहा है तथा एक भयंकर राक्षसी मरी हुई पड़ी है। उन्होंने बालक को तत्काल उठा लिया और पुचकार कर छाती से लगा लिया। वे कहने लगीं- “भगवान चक्रधर ने तेरी रक्षा की। भगवान गदाधर तेरी आगे भी रक्षा करें।” इसके पश्चात् गोप ग्वालों ने पूतना के अंगों को काट-काट कर गोकुल से बाहर ला कर लकड़ियों में रख कर जला दिया,
श्रीमद् देवी भागवत पुराण कथा व्यास श्री आचार्य सचिदानंद डंगवाल जी ने मां भगवती जगदम्बा दुर्गा शक्ति के रूपों का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि मां सदैव भक्त को वात्सल्य भाव से विभिन्न संकटों से बचाती हे मधु कैटभ वध पर
, कथावाचक सचिदानंद डंगवाल जी ने कहा कि प्रलय काल के समय जब पूरा संसार एकार्णव में निमग्न हो रहा था, उस समय भगवान विष्णु शेषनाग शैय्या पर लेटे निंद्रा कर रहे थे। तभी उनके कानों के मैल से दो भयंकर राक्षस प्रकट हुए। जिनके नाम मधु और कैटभ थे। उन दोनों राक्षसों ने भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल में बैठे में ब्रह्मा को खाने का प्रयास कर रहे थे।

तभी ब्रम्हा जी डर गए और उन्होंने निंद्रा देवी की स्तुति की और कहा कि हे देवी भगवान विष्णु की आंखों से बाहर हो जाइए और प्रभु के मन में इन दोनो राक्षसों के वध करने का उत्साह भर दो। इससे पूर्व भक्तों की भीड़ में परिसर में चल रहे यज्ञ मंडप की परिक्रमा की। तदोपरांत कथा का आनंद उठाया।
गली नंबर6 पर चल रहे अनुष्ठान में प्रवचन कर रहे कथा वाचको ने कहा कि ईश्वर की शक्ति से कोई भी शक्ति पार नहीं पा सकती। उन्होने कहा कि बलशाली दोनों ही राक्षस मधु और कैटभ ने भगवान विष्णु के साथ लगातार पांच हजार वर्षो तक युद्ध किया। तत्पश्चात भगवान विष्णु क्रोधित हो गए और उन्होंने राक्षस का सर अपनी जंघा पर रखकर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन केटभ वहां से भाग निकला। धीरे धीरे केटभ का अत्याचार बढ़ता चला गया और तीनों लोकों मे त्राहि त्राहि मच गई। केटभ के अत्याचारों से परेशान देवताओं ने अपनी शक्तियों से एक आकृति उत्पन्न की जो कि मां दुर्गा के रूप में प्रकट हुई और उनके द्वारा राक्षस केटभ का वध किया गया। मधु केंटभ का वध तथा मां दुर्गा की महिमा सुनकर सभी श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए और मां दुर्गा के जयजय कारों से पंडाल परिसर गूंज उठा
कथा में अपने भजनों के द्वारा व्यास पीठ ने समस्त श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।
कथा के मुख्य यजमान पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ इंद्रमणी सेमवाल जी ने बताया कि अपने पुरखों की स्मृति में कथा के छठे दिवस पर उत्तराखंड की प्रमुख संस्था आवाज़ साहित्यिक संस्था के कवियों द्वारा काव्य पुष्पांजलि एवं भजन संध्या के साथ प्रतिभा सम्मान किया जाएगा ।
कथा के पंचम दिवस के अवसर पर सैकड़ों श्रोताओं के साथ डा इन्द्रमणी सेमवाल, डा अमित सेमवाल, सुमित सेमवाल, ।हर्षमणि भटट,राकेश लसियाल, पीताम्बर लसियाल, डा वी.डी सेमवाल, रूपराम भट्ट , भानु प्रसाद जयाड़ा, सुरेश चंद्र, जमुना प्रसाद बडोनी, नागेंद्र व्यास, वी आर सेमवाल, अंजली सेमवाल , आचार्य सच्चिदानंद डंगवाल व्यास, डा.सतीश कृष्ण वतशल व्यास, आचार्य दिलमणि पैनयुली, सत्य प्रसाद ममगाई, सुरेन्द्र दत्त बडोनी आदि ।उपस्थित रहे ।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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