साहित्य सृजन।

*कवि रजनीश तिवारी की दो कविताएं*

शीर्षक : हे स्त्री

हे स्त्री, अब तू चूम शिखर,
अभिभूत करे तेरा तेज प्रखर।

नहीं रहना है तुझको बंधकर,
वंचित बनकर बस आंगन में,
खुलकर उड़ना तू सीख ज़रा,
उन्मुक्त गगन के प्रांगण में,
तुझमें तो अपरिमित उर्जा है,
ज्ञान का तुझमें अतुल निकर।

मां,भगिनी,सुता, दारा बनकर,
समर्थ कर दे नर का जीवन,
मत विस्मृत कर यह रूप सभी,
पर अपने लिए भी तू कुछ बन,
सरिता बन जा तू वेगवती,
सिंचित करती जा ग्राम-नगर।

हे स्त्री,अब तू चूम शिखर,
अभिभूत करे तेरा तेज प्रखर।

शीर्षक – जिहाद

खूनी जुनून का मंज़र है,
लगता चमन बर्बाद है,
यह किस मक़सद की ज़िहाद है?
और किस मज़हब की ज़िहाद है?

हर धर्म दुनिया में सिखाता बंदगी का रास्ता,
ज़ुल्म करनेवालों से मज़हब का है क्या वास्ता?
रहमो-करम का फ़लसफ़ा ,
हर मज़हब की बुनियाद है,
यह किस मक़सद की ज़िहाद है?
और किस मज़हब की जिहाद है?

यों खून मासूमों का बहाकर,
सच कहो क्या पाओगे?
इंसानियत को मारकर हैवान ही कहलाओगे।
हर जुबां यही कहेगी- यह मौला नहीं सय्याद है।
यह किस मक़सद की ज़िहाद है?
और किस मज़हब की ज़िहाद है?

पर याद रखो,यह गुलशन तोड़ पाओगे नहीं,
अल्लाह की कुदरत को तुम मोड़ पाओगे नहीं,
तुम जैसे बदकारों के सामने,
नेकी का फौ़लाद है,
यह किस मक़सद की ज़िहाद है?
और किस मज़हब की ज़िहाद है?

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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