साहित्य सृजन।

*साहित्य शिल्पी -सौम्या त्यागी की एक कविता – “माँ की कोख़”*

-सौम्या त्यागी की कलम से।
माँ की कोख़

जब तक मैं माँ की कोख़ में थी ,
तब तक सबकी आंखों का तारा थी मैं ।

पर 9 महीने बाद जब पता चला कि लड़की हूं मैं,
तब सबकी नजरों में अचानक चुभने लगी मैं ।

सिर्फ माँ ही थी जिसने नाज़ों से पाला है मुझे,
बाकी किसी ने एक बार भी दुलारा नहीं मुझे।

सब को लड़के की चाहत थी घर में ,
जो ना होने पर सुनना माँ को पड़ा।

तेरी गलती थी जो लड़की पैदा हुई,
यह सब ताने सुनकर माँ ने खूब सहा।

पापा ,दादी ,दादा इन सबके हिस्से ,
का प्यार मेरी माँ ने मुझे दिया ।

बोझ समझते हैं सब मुझे घर मे,
यह एहसास उन्होंने मुझे कभी होने नहीं दिया।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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