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*निखण्या बॉटी ( हास्य व्यंग्य )-हरीश कण्डवाल मनखी कलम बिटी*

प्रतिकात्मक तस्वीर।
निखण्या बॉटी ( हास्य व्यंग्य )

केसर : हैलो भैजी नमस्कार।

खड़करामः नमस्कार भुला, आज 05 साल बाद फोन करी, घर मा सब राजी खुशी छन, अर तु भी खूब छेयी, आज कनक्वे याद आयी दादा की ।

केसर : भैजी तुम भी जणदी छ्याव कि यी बार मी भि बेरोजगार व्हे ग्यों, तुमर भी अजों क्वीं ठिकणू नी छ, पैल हम थोकदरू दगड़ मा छ्यायी, पर तुम वे बगत डिंगरे कन अपर दगड़ तुम 09- 10 तै लेकन पधनू ख्वाळ चली गे छ्यायी, मि त बस बड़ू भैजी भरसू मा रै ग्यों। आज उन ही फिर मि तै थोकदरू बिरादरी बिटी भैर करी याल।

खड़करामः भुला यार वे बगत मेरी मत्ति मरायी, जू मि कील तंझला समेत 10 तै लेकन ऐ ग्यों, बकै त अजों सब ठांग्यू ठाग्यूं मा मौज उड़ाणा छन, अर नरसिंह नौं पर धामी न मितै सिरै द्यायी, सरा ज्यू जाळ म्यार मुण्ड मा डाळी द्यायी।

केसर : भैजी स्या बात त छैंछ, पर इन बतौ कि तुम सच मा फिर थोकदरू तरफ जाणा छ्यो।

खड़करामः भुला यार अजों बिटी घर बैठी कन क्या कन, मि चाणा छ्यायी कि म्यार ज्यूंद रांद ब्वारी तै भी कखी द्वी कत्तर पुंगड़ी कखी बिटी यूंक नौ करवे द्यूं।, नौन कुण त रोजगार कर्यूं छ, पर ब्वारी तै भी जरा बयूं पुंगड़ू मिली जांद, परिवार विरासत ऐथर बढाण ही छ, निथर वैक बाद कु पुछणू। इन बता तु क्या सुचणू छेयी।

केसर : भैजी मिभी पधनू तरफा मा तुमर सारू पर आणा छ्यायी पर तुम तै वख बटी निकाळी द्यायी अब कैख भरोस जाण, जू 8-10 पैल जयां भी छन उ मनन भी कत्ती घर बैठ हूंदीन इं बगत। सूण मा आणा कि दिल्ली व्हाळ यी बगत खौंखाट बण्या छन, यीं बार बल बॉटी लगली त मवार दियाल।

खड़करामः यार भुला मि यख इथगा सयणूं व्हे ग्यों, बॉटी लगली मुण्ड अर पठ्ठ मनन एक पर म्यार हक बणदी ही छ। बॉटी पधनू ख्वाळ लगो या थोकदरू म्यार हिस्सा त द्वी तरफ बिटीन बणै करद। लिडक ब्वारी अपर चुल्ल अलग करी याल उंकी बॉटा बॉटी अलग ही त मिलल।

केसर : भैजी मित थोकदरू तरफा छ्यायी, एक दिन ब्यखन बगत बस कळीराम भैजी यख कचमोळी बणी छेयी, वख बस द्वी चार पैग भी लगी गेन अर लुथगी खांद खांद देर व्हे ग्यायी, जनी भैर औं त थोकदरू देख द्यायी कि मि पधनू ख्वाळ जयूं छ्यायी, बस उन दिल्ली फोन करी अर मेरी सरा पुंगड़ी पटळी लूठी कन मितै बेकार करी द्यायी। अब ना पधनू पुछणा छन अर ना थोकदरू।

खड़करामः (रूंद रूंद) भुला यार मेरी भी इनी कुगती हुई च, अत्ती अटकू बल खनू फटकू। क्या कन अजों तकन मि अफू तै सबसे सयणूं समझदू छ्यायी लेकिन अब भल जमन नी रै ग्यायी भुला। मे कुणी नी हूंद अर बस ब्वारी तै मिली जांद एक कतरा बयीं पुंगड़ी। म्यार ब्वारी दगड़ करार करीं च, यीं बगत हळ मी अफीक लगै द्योल।

केसर : भैजी तुम त पैल बिटी चंट चालाक छयाव लेकिन मेरी भी मत्ती मरी राय किलै गे होल मि वी नरभगी कचमोळी खाणा कुणी। अब क्या कोर मी तबरी तकन द्वी चार जूड बौंटी द्यादूं कनी आल क्वी कबरी अलझाण मा।

खड़करामः भुला ई बगत त कुछ नी हूण व्हाळ इन करा कि तुम द्वी चार जौ तै बॉटी नी मिलणा कि उं डिंगरे जाल त उं तै उण्ड भुलै देयी, हम मिली कन दगड़ी खिलला शिकार। अजों बस तुम सब पर नजर रखो। हम अपर नै ख्वाळ बणौला तिलैदारूं।

केसरः दीदा रै मै ती नी भूली व्हां मि तबरी इने उने सूट पंटांग लगांदू कि होर कख लगणी बॉटी। इने सूण थोकदरू बिटी अर पधनू ख्वाळ नजर राखी कि कू कू खल्ली हाथ आणा छन, मि तबरी सौल मरणा कुणी जिबळू लगांद।

खड़करामः ठीक च भुला हमर भी कनी आल दिन, बौ कुणी बोल कि जरा थारम राख हम फिर चायी द्यवता नचला या कुछ भी करला लेकिन बॉटी जरूर हथयौला।

यू नाटक ग्रामीण परिवेश पर छ, येक राजनीति से क्वी संबंध नी च।

-हरीश कण्डवाल “मनखी” कलम बिटी!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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