उत्तराखण्ड

अन्तर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस, सहनशीलता भारतीय संस्कृति की नींव – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

*ओनली एक्शन - नो रिएक्शन सहनशीलता भारतीय संस्कृति की नींव - स्वामी चिदानन्द सरस्वती


ऋषिकेश, 16 नवंबर। आज परमार्थ निकेतन में भाई दूज के पावन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, साध्वी भगवती सरस्वती जी एवं साध्वी आभा सरस्वती जी के पावन सानिध्य में परमार्थ गुरुकुल के ऋषि कुमारों और परमार्थ परिवार के सदस्यों को बहनों ने तिलक लगाकर भाई दूज का पर्व मनाया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि बहन रक्षाबंधन के अवसर पर भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है, फिर भाई दूज को माथे पर तिलक लगाकर दीर्घायु और दिव्यायु की प्रार्थना करती हैं। नारियां करवा चौथ को पति के लिए व्रत रखती हैं, अहोई अष्टमी को बेटे के लिये, भाई दूज पर भाइयों को तिलक करती है इसलिये 365 दिन में उस मातृशक्ति को अपने हृदय में स्थान दे उनका सम्मान करें।
अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस दुनिया में व्याप्त सभी संस्कृतियों की समृद्धि, विविधता और सम्मान की अभिव्यक्ति हेतु पूरी दुनिया में मनाया जाता है। विभिन्न संस्कृतियों और सम्प्रदायों के बीच सहिष्णुता का निर्माण करना है तथा दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है। सहिष्णुता न केवल एक नैतिक कर्तव्य है, बल्कि आज के युग की सबसे प्रमुख आवश्यकता भी है इसलिये सहिष्णुता और अहिंसा की पहल स्वयं से करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि न्यायोचित तथा सम्मानपूर्ण अभिव्यक्ति तथा किसी भी प्रकार की आक्रामकता से बचना व विरोधी विचारों को सुनने की ताकत रखना ही वास्तव में सहिष्णुता है। दूसरों को धैर्य और शान्ति से सुनने के कारण भी नए तथा मौलिक विचार प्राप्त होते हैं जिससे समाज की दिशा बदली जा सकती है तथा पूरे विश्व में शांतिपूर्ण सहस्तित्व का निर्माण किया जा सकता है।
स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा में ही सहनशीलता की संस्कृति विद्यमान है। हम सभी विविधता और सहनशीलता के साथ आगे बढ़ें यही आज के समय की मांग भी है। एक-दूसरे की संस्कृति और आचार-विचार का सम्मान करें तथा ’’ओनली एक्शन – नो रिएक्शन’’ को जीवन का मंत्र बना लें।
सहिष्णुता से तात्पर्य सहनशीलता व धैर्य से है। सहनशीलता मानव स्वभाव के अमूल्य रत्नों में से एक है। जिसके पास सहनशीलता है वह विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्नता के साथ जीवन यापन कर सकता है। सहिष्णु व्यक्ति के स्वभाव में विरोध जैसा कुछ नहीं होता, वे विरोधी विचारों पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, हर परिस्थिति को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं तथा उनके स्वभाव में क्रोध व ईष्र्या नहीं बल्कि शान्ति और सहजता होती है।
स्वामी जी ने कहा कि सहिष्णुता से युक्त स्वभाव और संस्कार ही आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत प्राचीन काल से ही विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और सम्प्रदायों से युक्त राष्ट्र है और भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा ‘सहिष्णुता’ है, जो कि भारत की माटी के कण-कण में ही मिली हुई है। हमारी संस्कृति, संस्कार और स्वभाव की गहराइयों में ही सहिष्णुता समाहित है। भारत की अपनी दिव्य संस्कृति और सभ्यता के कारण विश्व स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहचान है। अहिंसा, सौहार्द, सहिष्णुता, भाईचारा और एकता आदि प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं परन्तु वर्तमान समय में समाज में आपसी वैमनस्यता बढ़ रही है जिसके कारण समाज में कई बार हिंसा का वातावरण विद्यमान हो जाता है इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि समाज में अहिंसा, सौहार्द और सहिष्णुता का वातावरण बनाये रखने में सहयोग प्रदान करे।
आईये आज अन्तर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस के अवसर पर संकल्प लें कि देश में एकता और शान्ति बनाये रखने में हम सभी अपना योगदान प्रदान करेंगे।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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