साधनासाहित्य सृजन।

*साहित्य शिल्पी-कवियत्री अरूणा वशिष्ठ की एक कविता- मैं समय हूं!*

"कवियत्री अरुणा वशिष्ट" किसी परिचय की मोहताज नहीं है! प्रकृति के समीप रहते हुए उन्होंने सभी विषयों पर अपनी काव्य रचना के द्वारा प्रत्येक विषय को छुआ है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी चाहे वह नृत्य कला हो, पेंटिंग हो, काव्य लेखन हो सभी पर उनकी अच्छी पकड़ है। अनेकों मंचों पर काव्य पाठकर अनेकों सम्मान पा चुकी है। उनकी कविता को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो जाते हैं। प्रस्तुत है उनकी एक छोटी सी कविता-

मैं समय हूं!
मैं रुकता नहीं हूं, झुकता नहीं हूं,
गति की चाल चलता हूं मैं।
मैं निडर हूं,
मैं टिकता नहीं हूं,
बिकता नहीं हूं ,
मैं चूकता नहीं हूं,
सब मुझे समय की बात कहते हैं।
मैं अनमोल हूं,
सब मुझ पर निर्भर रहते हैं। मैं बटता नहीं हूं,
मैं बलवान कहलाता हूं, कोई मुझे बुरा कहता है, कोई भला,
मुझे भी खुशी होती है, सबकी खुशी से‌
मुझे भी दर्द होत है सब के दुख से ,
घड़ी में रहता हूं मैं‌

सबकी नजर मुझ पर रहती है
, जब जन्म होता है तो मुझे देखते हैं सब,
जो मरणासन्न पर होता हूं, तो मुझे देखते हैं सब ।
जब मृत्यु होती है मुझे देखते हैं तब ,
मेरी कीमत को कोई नहीं समझता है।

बस मुझे देखते हैं बस मुझे देखते हैं सब,
पकड़ में मैं आता नहीं हूं। निकल जाता हूं निकल जाता हूं
मैं चला जाता हूं चला जाता हूं!

मैं समय हूं, मैं समय हूं!

लेखिका- कवियित्री-अरूणा वशिष्ठ ( सी , एम , डी ) द मिड वे , पाम्स रिजोर्ट , रायवाला ग्राम प्रतित नगर , (देहरादून)

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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