धर्म-कर्म

*यात्रा वृत्तांत-मेरी माता वैष्णोदेवी की प्रथम यात्रा की कहानी, मेरी ज़ुबानी*

वैष्णो माता के दर्शन यात्रा वृतांत-
पिछले दिनों माता रानी के बुलावे के बाद माता वैष्णो देवी के दर्शन हेतु हम ऋषिकेश से जम्मू के लिए निकले पढ़ें! गर्मी हो या दोपहर की चिलचिलाती धूप या ठिठुरन भरे जाड़े की रात या भयंकर बारिश, फिर भी आगे बढ़ता हुजूम न तो रुकता है और न ही उसके प्रवाह में कोई कमी आती है। बस एक ही नारा लगता है, ‘‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है, जय माता दी।’’ बस मां की महिमा आगे बढ़ती जाती है एवं सबसे आश्चर्य की बात यह है कि यहां बिना बुलाए न तो कोई आ सकता है और न ही मां के बुलाने पर कोई भी प्राणी रुक सकता है।
बरसों के इंतजार के बाद माता का बुलावा आया और मैं, पत्नी रंजू मेरे समधी- कांशीराम विज्लवाण, समधिन शशी बिज्लवाण माता रानी के दर्शन के लिए निकल पड़े। ऋषिकेश से कटरा जाने वाली ट्रेन में हमने अपना रिजर्वेशन कराया। रिजर्वेशन द्वारा चारों आदमी हम अपने आवंटित सीट पर बैठ गए। इन दिनों कोरोनावायरस के कारण सभी को मां के दरबार में पहुंचने के लिए कोरोनावायरस का टेस्ट लेकर जाना जरूरी है। परंतु जो लोग कोरोनावायरस की जांच नहीं कराते हैं उन्हें वहां पर जांच करा कर ही आगे की यात्रा करने की इजाजत दी जाती है।
सुबह 7:00 बजे कटरा स्टेशन पर पहुंचने के बाद हमारे मित्र अरविंद गुप्ता जी ने हमें होटल में ठहरने की व्यवस्था कर रखी थी। कार से हम होटल पहुंचे नहा धोकर हम यात्रा के लिए चल पड़े। गुप्ता जी द्वारा पहले से ही हेलीकॉप्टर का टिकट बुक करा दिया गया था। परंतु जानकारी के अभाव में हम लोग निहारिका भवन पहुंचे जहां हेलीकॉप्टर की टिकट के लिए श्राइन बोर्ड की पर्ची बनाकर निहारिका भवन जाकर वहां एक फार्म भरना पड़ता है। वहां हेलीकॉप्टर का टिकट हेतु वहां से जो पर्ची दी जाती है जो हेलीपैड पर जाकर दिखाना पड़ता है वहां से 1730 रुपए का टिकट एक व्यक्ति का एक तरफ का है। वह टिकट लेकर हमे एक दूसरे कांउटर पर जाना पड़ता है। जो उड़ान का समय देते हैं। वे ही बताते हैं कि आपको हेलीपैड पर पहुंचकर कब उड़ान भरना है। हमारा नंबर दिन के 1:30 बजे का था। हमने सोचा अभी सुबह के 10:00 बजे है हमारे पास अभी लगभग 3:30 घंटे हैं। क्यों ना कटरा में कोई नजदीक के धार्मिक स्थल अथवा पर्यटन स्थल का दीदार किया जाए। हमने ड्राइवर से अपनी मंशा जाहिर की, उन्होंने बताया कि यहां से करीब 8 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर देवा माता का मंदिर है। चलिए आपको मैं वहां घुमा लाता हूं। हम चारों कार में बैठे और पहाड़ी टेढ़े मेढ़े रास्तों से होते हुए देवा माता के मंदिर में पहुंचे। मंदिर में पुजारी जी जाप करने में लगे हुए थे पहाड़ी के ऊपर बहुत ही शांत वातावरण में देवा माता का मंदिर था। प्रांगण में अन्य देवी-देवताओं की भी मूर्तियां थी जिनका हमने दर्शन किया। पुजारी जी ने हम ने बताया कि जो व्यक्ति माता वैष्णो देवी की कठिन चढ़ाई नहीं चढ़ पाता है वाह यदि देवा माता का दर्शन करता है तो उसे माता वैष्णो देवी के दर्शन करने की जो पुण्य होते हैं उसे प्राप्त होता है। काफी देर तक उस मनोरम परिवेश में घूमते हुए हम लोग वापस कटरा के लिए निकल पड़े। एक होटल में आकर वहां खाना खाकर बाहर निकलें तो उस समय लगभग 12:30 बज गए थे फिर हम हेलीपैड पहुंचे वहां हमारा नंबर 1:00 बजे ही आ गया था। रोमांचक सवारी हेलीकाप्टर में हम लोग बैठ गए।

हम हेलीकॉप्टर से माता रानी के दरबार के लिए चल पड़े 4 मिनट में हम माता रानी के भवन से 3 किलोमीटर पहले हेलीपैड पर उतर गए।

जहां से हमने खड़ी चढ़ाई करना शुरू किया परंतु थकान के कारण एक किलोमीटर ही यात्रा कर पाए कि चारों में से एक थक गया। फिर हमने दो घोड़े लेने पड़े। भवन पहुंचे तो देखा वहां भीड़भाड़ कम होने के कारण ज्यादा लंबी लाइन नहीं थी। प्रसाद लेकर हम भवन तक पहुंचे वहां जाकर माता रानी के दर्शन किए।

दर्शन के पश्चात कहा जाता है कि बिना भैरव मंदिर भैरव बाबा के दर्शन किए यात्रा अधूरी रहती है हम उड़न खटोले से भैरव बाबा के दर्शन करने के लिए चल पड़े उड़न खटोले मिनटों में भैरो बाबा के मंदिर में पहुंचाया।

वहां पूजा-अर्चना कर हम कटरा के लिए चल पड़े काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।पर मां सब दुःख हर लेती है। जय माता दी, जय माता दी
कहते हुए किसी प्रकार अर्द्ध कुमारी तक आए वहां पर्ची लेकरलगभग 2 घंटे लाइन में लगने के बाद हमारा नंबर आया।

हम पवित्र गुफा की अब बड़ी मुश्किल से बड़ी मुश्किल से हम गुफा से निकल पाए माता रानी की कृपा थी कि हम गुफा से सही सलामत दर्शन कर निकल पाए क्योंकि गुफा बहुत संकरा है और कमजोर बीमार वृद्ध व्यक्ति का उसमें से निकलना लगभग बहुत ही कठिन है।

वहां से हम चारों घोड़ा लेकर सीधे अपने होटल पहुंचे विश्राम के बाद कार द्वारा कटरा से 40 किलोमीटर जम्मू लेकर आए हालांकि हमारा टिकट कटरा से था परंतु जम्मू के प्रमुख तीर्थ स्थलों को हमारी देखने की जिज्ञासा थी।


जम्मू स्थित तवी नदी को पार कर हम किले में बनी प्राचीन काली मंदिर के दर्शन किए उसके बाद ताप्ती नदी के किनारे बने विशाल पार्क में भ्रमण की। पाक दो भागों में बटा हुआ है एक भाग में मछली की आकृति का पार्क बना हुआ है। एक में चीड़ के पेड़ पानी के फुहारे का लगभग सैकड़ों एकड़ में विशाल पार्क है घंटों आप उस में घूमते रहिए आपका मन नहीं भरेगा।

काफी देर तक घूमने फिरने के बाद हम लोग पार्क से बाहर निकले उस समय लगभग दोपहर के 2:00 बज गए थे।कुछ ही दूरी पर ब्रह्मपुरी का मंदिर है, वहां दर्शन किए।

एक मंदिर जम्मू शहर के बीचो बीच विशाल प्रांगण में बना रघुनाथ मंदिर जो कि महाराजा गुलाब सिंह जी के द्वारा बनाया गया था उसका दर्शन किए फिर होटल में अपना भोजन कर ऋषिकेश के लिए प्रस्थान किए आइए आपको माता वैष्णो देवी के दर्शन के प्रमुख विषयों से अवगत कराते हैं।

जम्मू के सभी प्रमुख मंदिरों पर्यटन स्थलों के दर्शन के बाद हम एक होटल में गए वहां हमने भोजन किया तत्पश्चात हम जम्मू रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े।

आइए हम आपको माता वैष्णो रानी के दर्शन के विषय में संपूर्ण यात्रा वृतांत विस्तार से बताते हैं-
मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों का साल के तीन सौ पैंसठ दिन तांता लगा ही रहता है जो न कभी दिन में रुकता है और न ही रात में। मां का दरबार 24 घंटे सभी प्राणियों के लिए खुला रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मां के दरबार पर न कोई व्यक्ति का भेद, न कोई समाज का और न ही धन का भेद-भाव है। यहां तक कि मां लोगों से चढ़ावा तक नहीं लेती है बल्कि आने वाले भक्तों को अपना ही प्रसाद सिक्के के रूप में प्रदान करती है।

मां के प्रति आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि वैष्णो देवी के द्वार में वही लोग पहुंच पाते हैं जिन्हें मां स्वयं बुलाती हैं। वैष्णो देवी मां के दरबार जाने के लिए कटरा से यात्रा पर्ची प्राप्त करना अनिवार्य है। यात्रा पर्ची के बिना आप यात्रा नहीं कर सकते। यह यात्रा पर्ची बस स्टैंड पर उपस्थित टूरिस्ट रिसैप्शन सेंटर, कटरा में मुफ्त एवं काफी सुविधा से मिलती है। यात्रा पर्ची के बिना यात्रियों को बाण-गंगा से वापस आना पड़ सकता है। यात्रा पर्ची सुबह 6 बजे से रात्रि के 10 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं। भवन पर पहुंच कर यही पर्ची दिखाकर आप पवित्र गुफा के दर्शन कर सकते हैं।
पैदल अथवा जो भी सुविधा चाहिए ले सकते हैं।
यहां विश्राम करने की व्यवस्था के साथ-साथ कम्बल, दरी, स्टोव तथा खाना बनाने के बर्तन आदि मूल्य जमा करने पर नि:शुल्क उपयोग के लिए मिल जाते हैं। इन वस्तुओं को लौटा देने पर आपका जमा किया गया रुपया पुन: वापस मिल जाता है। यह प्रबंध श्री माता वैष्णव देवी बोर्ड की ओर से किया गया है।
इस यात्रा में विशिष्ट स्थल-

बस स्टैंड कटरा-
बस स्टैंड कटरा से ही यात्रा की शुरूआत होती है। इस स्थान पर काफी संख्या में होटल एवं धर्मशालाएं हैं जहां यात्री आने के बाद विश्राम करने के बाद बस स्टैंड पर स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड 1986 से यात्रा पर्ची प्राप्त कर आगे की यात्रा की शुरूआत करते हैं। यह यात्रा पर्ची नि:शुल्क दी जाती है एवं इसमें यात्रियों का विवरण तथा संख्या का उल्लेख किया जाता है।

बाण गंगा कन्या रूपी शक्ति मां जब उक्त स्थान से होकर आगे बढ़ीं तो उनके साथ-साथ वीर लंगूर भी चल रहे थे। चलते-चलते वीर लंगूर को जब प्यास लगी तो देवी ने पत्थरों में बाण मारकर गंगाजी को प्रवाहित कर दिया और प्रहरी की प्यास को तृप्त किया। इसी गंगा में ही देवी मां ने अपने केश भी धोकर संवारे इसलिए इसे बाण गंगा कहा जाता है।

चरण पादुका मंदिर-
इसी स्थान पर मां ने रुक कर पीछे की ओर देखा था कि भैरवयोगी आ रहे हैं। इसी कारण इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बन गए, इसलिए इस स्थान को चरण पादुका के नाम से जाना जाता है। बाण गंगा से इसकी दूरी 1.5 किलोमीटर है।

अद्धकुंआरी
अद्धकुआरी इस स्थान पर दिव्य कन्या ने एक छोटी गुफा के समीप एक तपस्वी साधु को दर्शन दिए और उसी गुफा में नौ महीने तक इस प्रकार रहीं जैसे कोई शिशु अपनी माता के गर्भ में नौ माह तक रहता है। तपस्वी साधु ने भैरव को बताया था कि वह कोई साधारण कन्या नहीं अपितु महाशक्ति है और अद्धकुआरी है। भैरव ने जैसे ही गुफा में प्रवेश किया, माता ने त्रिशूल का प्रहार करके गुफा के पीछे दूसरा मार्ग बनाया और निकल गई। इस गुफा को गर्भजून एवं अद्धकुआरी कहा जाता है। यह चरण पादुका से 4.5 किमी. दूरी पर स्थित है।

हाथी मत्था अद्धकुआरी से आगे क्रमश: पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढ़ाई के रूप में प्रारंभ हो जाती है। इसी कारण इसे हाथी मत्था के समान माना जाता है परंतु सीढिय़ों वाले रास्ते की अपेक्षा घुमावदार पहाड़ी पगडंडी से जाने से चढ़ाई कम मालूम होती है।

सांझी छत हाथी मत्था की चढ़ाई के बाद यात्री सांझी छत पहुंचते हैं। इस छत को दिल्ली वाली छबील भी कहा जाता है। इस स्थान पर पहुंचने के बाद माता के दरबार तक केवल सीधे एवं नीचे की ओर जाने का मार्ग है। हर पल रास्ते की सफाई की जाती है। भिखारियों के भीख मांगने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।

माता का भवन-
माता के भवन जाने के पूर्व सबसे पहले दिखाकर क्यू (लाइन) का नम्बर लेना अति जरूरी हो जाता है। इसके बाद आप क्रम से पंक्तिबद्ध होकर मां के दर्शन हेतु जा सकते हैं।ज्ञात रहे मां के पास जाने के पूर्व आप कैमरा, चमड़े का सामान, कंघी, जूता-चप्पल, बैग आदि को भवन के क्लाक रूम में जमा करा दें। इसके बाद ही आप जा सकते हैं। मां के पास जाने के बाद आपको वहां एकाग्र मन से मां का स्मरण करना पड़ेगा। यहां किसी प्रकार का फोटो एवं मिट्टी की तस्वीर नहीं है। वहां मात्र मां की पिंडी है जिसके दर्शन कर यात्रियों की थकान अपने आप दूर हो जाती हैं। मां के पीछे से शुद्ध एवं शीतल जल प्रवाहित होता रहता है जिसे चरण गंगा कहते हैं।

मां के भवन के पास ठहरने की भी अच्छी व्यवस्था के साथ ही साथ मुफ्त में कम्बल भी मिलता है जिसे प्रयोग करने के बाद लौटाना अनिवार्य है। खाने-पीने की दुकानों के अलावा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, पोस्ट ऑफिस, बैंक एवं पुलिस सहायता भी यहां उपलब्ध है।

भैरों मंदिर-
मां के दर्शन के पश्चात् आपका भैरों मंदिर जाना अनिवार्य है क्योंकि मां ने भैरों को मारने के बाद आशीर्वाद दिया था कि मेरे दर्शनों के पश्चात् भक्त तेरे भी दर्शन करेंगे, तभी उनकी मनोकानाएं पूर्ण होंगी। भैरों मंदिर का इतिहास मां आगे बढ़ती रही-भैरव पीछा करता रहा। गुफा के द्वार पर मां ने वीर लंगूर को प्रहरी बनाकर खड़ा कर दिया ताकि भैरव अंदर न आ सके। मां गुफा में प्रवेश कर गई तो पीछे-पीछे भैरव भी घुसने लगा। लंगूर ने भैरव को अंदर जाने से रोका जिसके लिए भैरव के साथ लंगूर का भयंकर युद्ध हुआ। फिर मां ने शक्ति यानी चंडी का रूप धारण कर भैरव का वध कर दिया। धड़ वहीं गुफा के पास तथा सिर भैरव घाटी में जा गिरा। जिस स्थान पर भैरों का सिर गिरा था, इसी जगह भैरों मंदिर का निर्माण हुआ है।

मां के भवन से भैरों मंदिर की दूरी लगभग 4 कि.मी. है जो काफी ऊंचाई पर है। यहां आप घोड़ा-खच्चरों से भी जा सकते हैं। मां के आशीर्वाद के कारण ही लोग वापसी में भैरों मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं।

।।जय मां वैष्णो माता दी।।

-जय कुमार तिवारी।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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