अजब-गजब!ऋषिकेशमनोरंजन

*😀*मेरी एक हास्य कविता*. 🌷🚩*ब्रह्मचर्य का व्रत* 🍀🍀*

शंका चिंता को जन्म देती है!और चिंता का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। महिलाएं अक्सर कोरी कल्पना करके वर्तमान और भविष्य की बे सिर-पैर कि चिंता में घुलती रहती है, कैसे?... पढ़िए इस कविता को-

देवभूमि जे के न्यूज़।
तीन सहेलियाँ एकान्त में आपस में बातियां रही थी.
अकेले में अपना – अपना दुखड़ा सुना रहीं थीं.
पहली बोली – – देखो ना मेरा पति बड़ा वो है…..
तो बाकी दोनों सहेली बोली क्या वो यानि कि – – – – – –
नाहीं रेअ्
वो अलमस्त, मदमस्त, जबरदस्त छैल – छबिला बॉका मर्द है.
मेरे लिए हमेशा ही उसके सीने मे बड़ा ही दर्द है
सदा ही कहता है-जानेमन, तुमपर जाननिसार तुम हो जॉनसीन.
दुनिया 🌏 भर की हसीनों में हो तुम सबसे हसीन.
धन्य हूँ पाकर तुम्हारा अनुपम प्यार.
यह हमारा रिश्ता कभी भी न हो तार – तार.
एक दिन वो ईश्वर से प्रार्थना 🙏 कर रहा था – – –
मेरे ही नाम का वो माला जप रहा था.
“कह रहा था – भगवन मेरी जैसी जीवनसंगिनी सबको मिले
सातों जन्मो तक हम दोनों का ये साथ चलें.
तभी बीच मे तीसरी कुँवारी सहेली बोली – हे भगवान् ऐसा ही पति मुझे भी देना जैसे मेरी सहेली का पति है महान.
” पर इतना अच्छा पति पाकर तु क्यों है परेशान?
पहली सहेली बोली – सात जन्मों तक तो वो मुवा मेरा साथ निभायेगा.
अभी से ख्वाब देख रहा है आठवें जन्म मे वह मेरी सौतन लायेगा.
कितना वेवफा है जानकर घुट – घुटकर जीते जी मर रहीं हूँ.
उसदिन से मुझे पता चला कि दिखावा करता है प्रेम 😘 का मै तुम्हें कह रही हूँ.
मर्द जात कभी दे नहीं 👎 सकता सच्चे प्यार की परीक्षा.
ये तो बता तेरा पति कैसा है, और क्या है उसकी इच्छा.
दुसरी बोली –
मेरा पति सुन्दर, सुशील बहुते ही सुन्दर है.
उसकी बाहों में लगता है प्यार का समंदर हैं.
घर के सारे काम चूल्हा – चौका झाडू – पोछा, भोजन पानी बर्तन धोना सब कुछ करता है.
सॉची कहूँ वो मुझे पे दिलोजान से मरता है.
फुर्सत के क्षणों में टीवी समाचार, जी लगाकर पढ़ता है अखबार.
आजकल उसके सिर एक नया शौक का छाया है खुमार.
जनानी पहनावे से उसे हो गया है प्यार.
कहता है मुझे सूट सलवार, लहंगा – चोली साड़ी पहनना सीखा दो.
महिलाये जींस – पैंट पहनती हैं मुझे उनके कपड़े दिला दो.
समानता का श्रीगणेश मेरे द्वारा की जायेंगी.
गॉव – शहर – समाज मे मेरी धाक जम जायेगी.
जब नारियां, छोडकर साडि़यां, पहन रहीं है पुरूष का पहनावा.
हम पुरूष क्यूँ करे भेदभाव सच्चा है मेरा दावा.
क्रीम काजल होठलाली लगा, करके सोलह सिंगाार.
जाऊँगा जब ऑफिस मे बॉस कहेंगे तुम पर जॉनिसार.
सरकार की आरक्षण नीति, नारी के लिए अलग बज़ट का जंजाल.
विपक्षियों का महिला 👱 विधेयक के लिए अलग ही सुरताल.
हम दोनों अदल बदल कर पहनेगें कपड़े नर – नारी मे आयेगी समानता.
आनेवाली पीढ़ी मुझपर नाज करेगी, याद रखेगी मेरी महानता.
लिंगवाद का हो जायेगा अपने आप ही बंटाधार.
यदि अमल नहीं 👎 करोगी तो मै हूं मरने को तैयार.
तभी तीसरी सहेली बोली – अपना मौन व्रत तोड़ते मुंह खोली.
सचमुच ये मरदुद मर्द लोग होते हैं बड़ा ही पेचीदा.
शुक्र है भगवन का जो मै किसी नर पे नही हुईं फिदा़.
मायावती, ममता, जयललिता, लता मंगेशकर के विचारों को मै दाद देती हूँ.
आज से अभी से आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेती हूँ.
😊लेखक – जय कुमार तिवारी ऋषिकेश.
कविता कैसी लगी कृपया अपनी राय से अवश्य ही अवगत करायें.

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