ऋषिकेशधर्म-कर्म

*ईश्वर प्राप्ति के आसान उपाय*

धर्म-कर्म में पढ़िए आज देवभूमि जेके न्यूज़ पर परमात्मा किस प्रकार के प्रार्थना से मिलते हैं उसके क्या नियम है?

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!
एक संत जंगल से गुजरते हैं और एक आदमी को प्रार्थना करते देखते हैं, गड़रिया, गरीब आदमी, फटे चीथड़े पहने हुए, भगवान से प्रार्थना कर रहा है. महीनों से नहाया नहीं होगा, ऐसी दुर्गन्ध आ रही है ! और वो बैठा वहीं प्रार्थना कर रहा है। वो क्या कह रहा है? संत ने खड़े होके सुना, वो बहुत हैरान हुए, उन्होंने बहुत प्रार्थना करने वाले देखे थे, ऐसा आदमी नहीं देखा।

वो भगवान से कह रहा है – हे भगवान ! तू एक दफ़े मुझे बुला ले, ऐसी तेरी सेवा करूँगा कि तू भी खुश हो जाएगा, पाँव दबाने में मेरा कोई सानी नहीं, पैर तो मैं ऐसे दबाता हूँ, तेरा भी दिल बाग-बाग हो जाए। तुझे घिस-घिस के नहलाऊँगा और तेरे सिर में जुएँ पड़ गए होंगे तो उनको भी सफाई कर दूँगा, अब उसके बेचारे के सिर में पड़े होंगे, तो स्वभावत: आदमी अपनी ही धारणा तो भगवान से सोचेगा !

संत तो बर्दाश्त के बाहर हो गये कि, “ये आदमी क्या कह रहा है ? मैं रोटी भी अच्छी बनाता हूँ, शाक-सब्जी भी अच्छी बनाता हूँ, रोज भोजन भी बना दूँगा. आप थका-माँदा आएगें तो पैर भी दाब दूँगा, नहला भी दूँगा. तू एक दफ़े मुझे मौका तो दे भगवन !संत ने कहा, “चुप ! चुप अज्ञानी ! तू क्या बातें कर रहा है ? तू किससे बातें कर रहा है भगवान से ?” उस आदमी की आँख से आँसू बह रहे थे, वो आदमी तो डर गया. उससे कहा — “मुझे क्षमा करें, कोई गलत बात कही ?” संत ने कहा –गलत बात ! और क्या गलती हो सकती है भगवान को जुएँ पड़ गए ! पिस्सू हो गए ! क्या भगवान कोई गड़रिया है ?

वो गड़रिया रोने लगा, उसने संत के पैर पकड़ लिए. उसने कहा –मुझे क्षमा करो ! मुझे क्या पता, मैं तो बेपढ़ा-लिखा गँवार हूँ. शास्‍त्र का कोई ज्ञान नहीं, अक्षर सीखा नहीं कभी, यहीं पहाड़ पर इसी जंगल में भेड़ों के साथ ही रहा हूँ, भेड़िया हूँ, मुझे क्षमा कर दो ! अब कभी ऐसी भूल न करूँगा. मगर मुझे ठीक-ठीक प्रार्थना समझा दो ! संत ने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझाई। वो आदमी कहने लगा — ये तो बहुत कठिन है. ये तो मैं भूल ही जाऊँगा। ये तो मैं याद ही न रख सकूँगा। फिर से दोहरा दो ! फिर से संत ने दोहरा दी। वो बड़े प्रसन्न हो रहे थे मन में कि एक भटके हुए आदमी को राह पर ले आए !

और जब संत जंगल की तरफ़ अपने रास्ते पे जाने लगे, बड़े प्रसन्न भाव से, तो उन्होंने बड़े जोर की आवाज में गर्जना सुनी आकाश में और भगवान की आवाज आई — महात्मन ! मैंने तुझे दुनिया में भेजा था कि तू मुझे लोगों से जोड़ना, तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया ! संत घबड़ा के बैठ गए, हाथ-पैर कँपने लगे. उन्होंने कहा — क्या कह रहे हैं आप?, मैंने तोड़ दिया ! मैंने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझाई !

परमात्मा ने कहा — ठीक-ठीक प्रार्थना का क्या अर्थ होता है ? ठीक शब्द ? ठीक उच्चारण ? ठीक भाषा ? ठीक प्रार्थना का अर्थ होता है *हार्दिक भाव !*

वो आदमी अब कभी भाव से प्रार्थना न कर पाएगा. तूने उसके भाव सदा के लिए तोड़ दिया, उसकी प्रार्थना से मैं बड़ा खुश था । वह बड़ा सच्चा था. वो हृदय से ये बातें कहता था, रोज कहता था. मैं उसकी प्रतीक्षा करता था रोज कि कब गड़रिया प्रार्थना करेगा ? वह ह्रदय से ऐसे कहता था जैसा कोई प्रेमी कहता है और फिर बेचारा गड़रिया है, तो गड़रिए की भाषा बोलता है !

इससे फर्क नहीं पड़ता कि भगवान् को पुकारने में शब्द क्या हैं ? इससे ही फर्क पड़ता है कि हम क्या है. हमारे अंदर विरह होनी चाहिए, आँसू होने चाहिए हमारे शब्दों में ! जब हमारे शब्द हमारे आँसूओं से गीले होते हैं, तब उनमें हजार-हजार प्रार्थना निकलते हैं, जो सच्चे होते हैं।

*” मौन ” भगवान की भाषा है , बाकी सबकुछ बेकार अनुवाद है। और आंखें अगर दीये बन जाएं तो और क्या चाहिए! बस ये दो आंखें प्रतीक्षा में, प्रार्थना में डूब जाएं तो दीये बन जाती है। बात भाव की है, भाषा की नहीं है। अंतर्तम की है कि क्या कहते हो? कैसे कहते हो व्याकरण सही है कि गलत!इस चिंता में या सुधार में मत पड़ना।*

*परमात्मा कोई स्कूल का शिक्षक नहीं है कि पहले व्याकरण की शुद्धियां करेगा, पहले भाषा ठीक करने को कहेगा। परमात्मा हमारा भाव समझ लेता है। कुछ न कहो तो भी चल जाएगा। चुपचाप भाव में मौन खड़े हो जाओ तो भी चल जाएगा।*

*बीज बिना आवाज़ के पौधे के रूप में धीरे धीरे बढ़ता है, क्योकि निर्माण मौन में है।वही पौधा एक दिन वृक्ष बन कर गिरता है उस समय जोरदार आवाज़ करता है। विनाश/विध्वंश में आवाज़ होती है… और निर्माण ….हमेशा मौन रूप में चलता रहता है। मौन… एक शक्ति है।*

।।ॐ।।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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