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*साध्वी स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती (माता संतोष भारती) वेदनिकेतन धाम का महामंडलेश्वर के रूप में पट्टाभिषेक समारोह संपन्न!*

                      

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!

स्वर्गआश्रम । आज गुरुवार 27 अगस्त 2020 भाद्रपद  शुक्ला, नवमी, बृहस्पतिवार, के दिन अपराह्न 01:00 बजे, वेदनिकेतन धाम आश्रम में, साध्वी स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती ( माता संतोष भारती) शिष्या ब्रह्मलीन स्वामी 1008 महामंलेश्वर योगेश्वर विश्वगुरु मुनिशानंद निवास वेदनिकेतन धाम, स्वर्गाश्रम का महामंडलेश्वर के रूप में पट्टाभिषेक पंचपरमेश्वर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी एवं श्री आनंद पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 आचार्य महामंडलेश्वर बालकानंद गिरी  महाराज की अध्यक्षता में चादर विधि पट्टाभिषेक द्वारा सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम का आयोजन वेद निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी विजयानन्द सरस्वती शिष्य स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती  द्वारा किया गया!

इसमें अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी,  स्वामी रविन्द्र पुरी , पंच परमेश्वर श्री निरंजनी अखाड़ा, स्वामी रामेश्वर दास, स्वामी सुरेशदास, स्वामी चिदानन्द मुनि, श्री निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर और साधु-संतों के साथ अन्य 12 अखाड़ों के महामंडलेश्वर एवं संत गणों ने भाग लिया।
इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के  बड़े दिनेश जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से यदुवीर सिंह, दिनेश सेमवाल, पदम सिंह, आदि भी सम्मिलित हुए। 

महामंडलेश्वर की धार्मिक प्रक्रिया के आयोजन में समारोह में साध्वी दिव्यानन्द सरस्वती का ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ पूजन किया गया। इसके बाद श्री आनंद पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 आचार्य महामंडलेश्वर बालकानंद गिरी  महाराज एवं श्री महंत नरेंद्र गिरी उनको आसन पर बैठने के लिए आमंत्रित किया। भगवा चादर आचार्य एवं उपस्थित सभी महामंडलेश्वरों एवं संतों के द्वारा ओढ़ाई गई। इसके उपरांत पंच परमेश्वर, आचार्य एवं महामंडलेश्वरों के सानिध्य एवं अध्यक्षता में साधु भंडारा एवं दक्षिणा वितरण का कार्यक्रम संपन्न हुआ। 


इस अवसर पर वक्ताओं ने साध्वी स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साध्वी ने बाल्यकाल में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था और 1965 में ऋषिकेश आ गई थी, यहाँ उन्होंने अपने गुरु विश्व विख्यात योगी महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 स्वामी विश्वगुरु मुनिशानंद जी के साथ मिलकर 1970 में श्री वेदनिकेतन धाम आश्रम की स्थापना की एवं अपने गुरु के सानिध्य में अष्टांग योग और अध्यात्म में कई उपलब्धियां हासिल की और देश तथा विदेश में योग और अध्यात्म का प्रचार प्रसार किया, आज भी माता जी के शिष्य देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी योग, धर्म और अध्यात्म का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। विश्व गुरु मुनिशानंद के ब्रम्हलीन होने के उपरांत उनकी गद्दी स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती ही संभाल रहीं हैं ।

निरंजनी अखाड़ा की स्थापना सन् 904 में विक्रम संवत 960 कार्तिक कृष्णपक्ष के दिन सोमवार को गुजरात के मांडवी नामक स्थान पर हुई थी।  इस अखाड़े के करीब 70 फीसदी साधु-संतों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है, जिसमें डॉक्टर से लेकर प्रोफेसर, लॉ एक्सपर्ट, संस्कृत के विद्वान और आचार्य शामिल हैं। निरंजनी अखाड़ा इस समय इलाहाबाद और हरिद्वार में पांच स्कूल-कॉलेजों को संचालित कर रहा है। इन स्कूल-कॉलेजों के मैनेजमेंट से लेकर सारी व्यवस्थाएं इस अखाड़े के संत ही संभालते हैं। साथ ही छात्रों को शिक्षा देने का काम भी इसी अखाड़े के संत ही करते हैं। 

सभी अखाड़ों में निरंजनी अखाड़ा सबसे प्रसिद्ध है। इसमें सबसे ज्यादा योग्य एवं सुशिक्षित साधु-संत हैं, जो शैव परंपरा के मानने वाले हैं। जटा रखते हैं। इस अखाड़े के इष्टदेव कार्तिकेय हैं। जो देव सेनापति हैं।

इसका इतिहास डूंगरपुर रियासत के राजगुरु मोहनानंद के समय से मिलता है। शालिग्राम श्रीवास्तव ने अपनी किताब प्रयाग प्रदीप में बताया है इनका स्थान दारागंज है। हरिद्वार, काशी, त्र्यंबक,ओंकार, उज्जैन, उदयपुर, बगलामुखी जैसी जगहों पर इनके आश्रम हैं।

इस अखाड़े में फिलहाल 10 हजार से अधिक नागा संन्यासी हैं, जबकि महामंडलेश्वरों की संख्या 50 है। वहीं, इस अखाड़े में महंत और श्रीमहंतों की संख्या एक हजार से भी अधिक है।

*वेद निकेतन धाम में पट्टाभिषेक कार्यक्रम के अवसर पर परमाध्यक्ष स्वामी विजयानंद सरस्वती का संबोधन*
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इस अवसर पर हनुमान मंदिर मायाकुंड पीठाधीश्वर रामेश्वर दास जी,स्वर्गाश्रम व्यापार मंडल अध्यक्ष इंद्र प्रकाश अग्रवाल,प्रमोददास, नगर अध्यक्ष माधव अग्रवाल, अरविंद पांडेय, नितिन गौतम, भारत गगन, तन्मय वशिष्ट, विक्रम सिंह पंवार,हितेश कुमार आदि के साथ  हरिद्वार एव ऋषिकेश के आश्रमों से आये संत गण तथा अन्य भक्तगण भी उपस्थित थे। 

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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