धर्म-कर्म

*“यदि मूड बना तो सोचूँगा”*

शानदार फैसला...!!!

देवभूमि जेके न्यूज!

“पिताजी जी ! पंचायत इकठ्ठी हो गई , अब बँटवारा कर दो।” कृपाशंकर जी के बड़े लड़के गिरीश ने रूखे लहजे में कहा।

“हाँ पिताजी जी ! कर दो बँटवारा , अब इकठ्ठे नहीं रहा जाता” छोटे लड़के कुणाल ने भी उसी लहजे में कहा।

पंचायत बैठ चुकी थी, सब इकट्ठा थे।

कृपाशंकर जी भी पहुँचे।

“जब साथ में निर्वाह न हो तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है , अब यह बताओ तुम किस बेटे के साथ रहोगे ?” सरपंच ने कृपाशंकर जी के कन्धे पर हाथ रखकर पूछा।

कृपाशंकर जी सोच में थे। शायद सुनने की बजाय कुछ सोच रहे थे। सोचने लगे वो दिन जब इन्ही गिरीश और कुणाल की किलकारियों के बगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे। वे बच्चे अब बहुत बड़े हो गये थे और अलग रहने की बात कर रहे थे।

अचानक गिरीश की बात पर ध्यान भंग हुआ,

“अरे इसमें क्या पूछना, छ: महीने पिताजी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास रहेंगे।”

“चलो, तुम्हारा तो फैसला हो गया, अब करें जायदाद का बँटवारा ???” सरपंच बोला।

कृपाशंकर जी जो काफी देर से सिर झुकाए सोच में बैठे थे, एकदम उठकर खड़े हो गये और क्रोध से आंखें तरेर कर बोले-

“अबे ओए सरपंच, कैसा फैसला हो गया? अब मैं करूंगा फैसला, इन दोनों लड़कों को घर से बाहर निकाल कर।”

सुनो बे सरपंच…!!! इनसे कहो चुपचाप निकल लें घर से, और जमीन जायदाद या सपंत्ति में हिस्सा चाहिए तो छः महीने बारी-बारी से आकर मेरे पास रहें, और छः महीने कहीं और इंतजाम करें अपना। फिर यदि मूड बना तो सोचूँगा।

“जायदाद का मालिक मैं हूँ, ये दोनों नहीं।”

दोनों लड़कों और पंचायत का मुँह खुला का खुला रह गया। और, मानों सबको सांप सूंघ गया। जैसे आज की पंचायत में कोई नयी बात हो गई हो।

मित्रों…, आज इसी नयी सोच और नयी पहल की जरूरत है। आज के बुज़ुर्ग (यदि बच्चे ऐसी स्थिति पैदा करें तो) अपनी सन्तानों के साथ यूँ ही पेश आएँ।

“यदि मूड बना तो सोचूँगा”
सौजन्य से-राम महेश मिश्रा जी!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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