धर्म-कर्मशहर में खास

*”अपणि संस्कृति,अपणि पछयाण” के लिए निरन्तर गढ़ भूमि लोक संस्कृति संरक्षण समिति कार्य कर रही है*

हमें अपनी परंपरा, भाषा और मातृभूमि पर गर्व होना चाहिए!

देवभूमि जे के न्यूज़, उत्तराखंड!

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल”
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।
मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।
विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,
सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।
उपरोक्त कवि द्वारा कविता के माध्यम से कहीं बात हमारे ऊपर सटीक बैठती है। हम अपने मूल चेतना को भूलते जा रहे हैं। हम जड़ विहीन होकर रह गए हैं! हमने दौलत- शोहरत खूब कमाया! देश-विदेश में रहकर खूब नाम कमाया! पर हम अपने उत्तराखंड की धरती से विरक्त होते गए, यह सच है कि देश- विदेश में जब भी हमें खाली समय मिलता है ,हमारी सोच हमारा मन अपने गांव अपनी संस्कृति को याद कर भाव विह्वल हो जाता है। इस पीड़ा को समझते हुए ऋषिकेश ढालवाला में अध्यक्ष आसाराम व्यास, वरिष्ठ उपाध्यक्ष गजेंद्र कंडियाल, रामा बल्लभ भट्ट, उपाध्यक्ष भरत मणि कुड़ियाल, महासचिव डॉक्टर सुनील थपलियाल, विशाल मणि पैन्यली, संगठन मंत्री सुरेंद्र भंडारी, घनश्याम नौटियाल, कोषाध्यक्ष धनी राम बिंजोला, एवं सम्मानित सदस्यों में महिपाल सिंह बिष्ट, रवि नौटियाल, भगवती प्रसाद रतूड़ी, रामस्वरूप नौटियाल, सीमा बिजल्वाण, डॉ जनार्दन कैरवाण, निर्मला उनियाल , के डी व्यास, प्रवीण व्यास , अनीता डबराल, दर्शनी भंडारी, निर्मला शर्मा
शशि कंडारी , मीना मेदवाण, शोभा बड़थ्वाल, आरती चौहान , शारदा कुलियाल,इंद्रा आर्य , उमा पोखरियाल, बीना जोशी, सुनीता नेगी, नीमा पँवार ,मनोज मलासी , अशोक शर्मा, कर्ण सिंह बड़थ्वाल, कुसुम भट्ट द्वारा अपनी गढ़वाल की पारंपरिक संस्कृति जो हमारे पुरखों द्वारा बनाए गए हैं जिसे हम लोक संस्कृति के नाम से जानते हैं, उसके संरक्षण के लिए एक टीम बनाकर काम करना शुरू कर दिया और आए दिन गढ़ भूमि लोक संस्कृति संरक्षण समिति का गठन कर समय-समय पर गढ़वाल के संस्कृति को बचाने के लिए अनेकों आयोजन करते हैं। इसके साथ ही समाज में आए दिन होने वाले आपदाओं समाज के दबे कुचले लोगों के उत्थान के लिए समिति द्वारा अनेकों कार्य किए जा रहे हैं।

समिति ने देखा कि हम लोग अपने गांव को छोड़कर कोई देश में, कोई विदेश में, कोई कहीं बस गया! इस पीड़ा को समझते हुए इस समिति का गठन किया! हमारा उत्तराखंड अपने आप में एक विविधता लिए हुए प्रदेश है। यहां पर पहाड़ की हसीन वादियों में अनेकों ऐसी परंपराएं, ऐसी संस्कृति है जो अभाव में भी पत्थरों में भी एक सजीवता लिए हुए विभिन्न प्रकार के रस- रंग -उमंग -तरंग -देवी देवताओं की पूजा- पाठ वेशभूषा- खानपान- चित्रकला सभी में सर्वोच्च स्थान रखते हुए हमारे पुरखों ने किस प्रकार इसकी संरचना की, आइए हम इसे विस्तार से जानते हैं!


लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण (अल्पना) बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है। चावल को भिगोकर उसे पीसा जाता है। उसके लेप से आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं। विभिन्न अवसरों पर नामकरण चौकी, सूर्य चौकी, स्नान चौकी, जन्मदिन चौकी, यज्ञोपवीत चौकी, विवाह चौकी, धूमिलअर्ध्य चौकी, वर चौकी, आचार्य चौकी, अष्टदल कमल, स्वास्तिक पीठ, विष्णु पीठ, शिव पीठ, शिव शक्ति पीठ, सरस्वती पीठ आदि परम्परागत गाँव की महिलाएँ स्वयं बनाती है। इनका कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। हरेले आदि पर्वों पर मिट्टी के डिकारे बनाए जाते है। ये डिकारे भगवान के प्रतीक माने जाते है। इनकी पूजा की जाती है। कुछ लोग मिट्टी की अच्छी-अच्छी मूर्तियाँ (डिकारे) बना लेते हैं। यहाँ के घरों को बनाते समय भी लोक कला प्रदर्षित होती है। पुराने समय के घरों के दरवाजों व खिड़कियों को लकड़ी की सजावट के साथ बनाया जाता रहा है। दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्र नक्काशी करके बनाए जाते है। पुराने समय के बने घरों की छत पर चिड़ियों के घोंसलें बनाने के लिए भी स्थान छोड़ा जाता था। नक्काशी व चित्रकारी पारम्परिक रूप से आज भी होती है। इसमें समय काफी लगता है। वैश्वीकरण के दौर में आधुनिकता ने पुरानी कला को अलविदा कहना प्रारम्भ कर दिया। अल्मोड़ा सहित कई स्थानों में आज भी काष्ठ कला देखने को मिलती है। उत्तराखण्ड के प्राचीन मन्दिरों, नौलों में पत्थरों को तराश कर (काटकर) विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र बनाए गए है। प्राचीन गुफाओं तथा उड्यारों में भी शैल चित्र देखने को मिलते हैं।

उत्तराखण्ड की लोक धुनें भी अन्य प्रदेशों से भिन्न है। यहाँ के बाद्य यन्त्रों में नगाड़ा, ढोल, दमुआ, रणसिंग, भेरी, हुड़का, बीन, डौंरा, कुरूली, अलगाजा प्रमुख है। यहाँ के लोक गीतों में न्योली, जोड़, झोड़ा, छपेली, बैर व फाग प्रमुख होते हैं। इन गीतों की रचना आम जनता द्वारा की जाती है। इसलिए इनका कोई एक लेखक नहीं होता है। यहां प्रचलित लोक कथाएँ भी स्थानीय परिवेश पर आधारित है। लोक कथाओं में लोक विश्वासों का चित्रण, लोक जीवन के दुःख दर्द का समावेश होता है। भारतीय साहित्य में लोक साहित्य सर्वमान्य है। लोक साहित्य मौखिक साहित्य होता है। इस प्रकार का मौखिक साहित्य उत्तराखण्ड में लोक गाथा के रूप में काफी है। प्राचीन समय में मनोरंजन के साधन नहीं थे। लाकगायक रात भर ग्रामवासियों को लोक गाथाएं सुनाते थे। इसमें मालसाई, रमैल, जागर आदि प्रचलित है। अभी गांवों में रात्रि में लगने वाले जागर में लोक गाथाएं सुनने को मिलती है। यहां के लोक साहित्य में लोकोक्तियां, मुहावरे तथा पहेलियां (आंण) आज भी प्रचलन में है। उत्तराखण्ड का छोलिया नृत्य काफी प्रसिद्ध है। इस नृत्य में नृतक लबी-लम्बी तलवारें व गेंडे की खाल से बनी ढाल लिए युद्ध करते है। यह युद्ध नगाड़े की चोट व रणसिंह के साथ होता है। इससे लगता है यह राजाओं के ऐतिहासिक युद्ध का प्रतीक है। कुछ क्षेत्रों में छोलिया नृत्य ढोल के साथ श्रृंगारिक रूप से होता है। छोलिया नृत्य में पुरूष भागीदारी होती है। कुमाऊँ तथा गढ़वाल में झुमैला तथा झोड़ा नृत्य होता है। झौड़ा नृत्य में महिलाएँ व पुरूष बहुत बड़े समूह में गोल घेरे में हाथ पकड़कर गाते हुए नृत्य करते है। विभिन्न अंचलों में झोड़ें में लय व ताल में अन्तर देखने को मिलता है। नृत्यों में सर्प नृत्य, पाण्डव नृत्य, जौनसारी, चांचरी भी प्रमुख है।
[ देवी-देवताओं से लेकर अंछरियों (अप्सराओं) और भूत-पिशाचों तक की पूजा धार्मिक नृत्यों के अभिनय द्वारा सम्पन्न की जाती है। इन नृत्यों में गीतों एवे वाद्य यंत्रों के स्वरों द्वारा देवता विशेष पर अलौकिक कम्पन के रूप में होता है। कम्पन की चरमसीमा पर वह उठकर या बैठकर नृत्य करने लगता है, इसे देवता आना कहते हैं। जिस पर देवता आता है, वह पस्वा कहलाता है। ‘ढोल दभाऊँ’ के स्वरों में भी देवताओं का नृत्य किया जाता है, धार्मिक नृत्य की चार अवस्थाएँ है:

विशुद्ध देवी देवताओं के नृत्य: ऐसे नृत्यों में ‘जागर’ लगते हैं उनमें प्रत्येक देवता का आह्‌वान, पूजन एवं नृत्य होता है। ऐसे नृत्य यहां 40 से ऊपर है, यथा निरंकार (विष्णु), नरसिंह (हौड्या), नागर्जा (नागराजा-कृष्ण), बिनसर (शिव) आदि।
देवता के रूप में पाण्डवों का पण्डौं नृत्य: पाण्डवों की सम्पूर्ण कथा को वातारूप में गाकर विभिन्न शैलियों में नृत्य होता है। सम्पूर्ण उत्तरी पर्वतीय शैलियों में पाण्डव नृत्य किया जाता है। कुछ शैलियां इस प्रकार है – (क) कुन्ती बाजा नृत्य, (ख) युधिष्ठिर बाजा नृत्य, (ग) भीम बाजा नृत्य, (घ) अर्जुन बाजा नृत्य, (ड़.) द्रौपदी बाजा नृत्य (च) सहदेव बाजा नृत्य, (छ) नकुल बाजा नृत्य।
मृत अशान्त आत्मा नृत्य: मृतक की आत्मा को शान्त करने के लिए अत्यन्त कारूणिक गीत ‘रांसो’ का गायन होता है और डमरू तथा थाली के स्वरों में नृत्य का बाजा बजाया जाता है। इस प्रकार के छ’ नृत्य है – चर्याभूत नृत्य, हन्त्या भूत नृत्य, व्यराल नृत्य, सैद नृत्य, घात नृत्य और दल्या भूत नृत्य।
रणभूत देवता: युद्ध में मरे वीर योद्धा भी देव रूप में पूजे तथा नचाए जाते है। बहुत पहले कैत्यूरों और राणा वीरों का घमासान युद्ध हुआ था। आज भी उन वीरों की अशान्त आत्मा उनके वंशजों के सिर पर आ जाती है। भंडारी जाति पर कैंत्यूर वीर और रावत जाति पर राणारौत वीर आता है। आज भी दोनों जातियों के नृत्य में रणकौशल देखने योग्य होता है। रौतेली, भंजी, पोखिरिगाल, कुमयां भूत और सुरजू कुंवर ऐसे वीर नृत्य धार्मिक नृत्यों में आते हैं।
उत्तराखण्डी खानपान का अर्थ राज्य के दोनों मण्डलों, कुमाऊँ और गढ़वाल, के खानपान से है। पारम्परिक उत्तराखण्डी खानपान बहुत पौष्टिक और बनाने में सरल होता है। प्रयुक्त होने वाली सामग्री सुगमता से किसी भी स्थानीय भारतीय किराना दुकान में मिल जाती है।

हमरे कुछ विशिष्ट खानपान है-आलू टमाटर का झोल
चैंसू
झोई
कापिलू
मंडुए की रोटी
पीनालू की सब्जी
बथुए का परांठा
बाल मिठाई
सिसौंण का साग
गौहोत की दाल
पारम्परिक रूप से उत्तराखण्ड की महिलाएं घाघरा तथा आंगड़ी, तथा पूरूष चूड़ीदार पजामा व कुर्ता पहनते थे। अब इनका स्थान पेटीकोट, ब्लाउज व साड़ी ने ले लिया है। जाड़ों (सर्दियों) में ऊनी कपड़ों का उपयोग होता है। विवाह आदि शुभ कार्यो के अवसर पर कई क्षेत्रों में अभी भी सनील का घाघरा पहनने की परम्परा है। गले में गलोबन्द, चर्‌यो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफूल, कुण्डल पहनने की परम्परा है। सिर में शीषफूल, हाथों में सोने या चाँदी के पौंजी तथा पैरों में बिछुए, पायजब, पौंटा पहने जाते हैं। घर परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परम्परा है। विवाहित औरत की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का भी यहाँ चलन आम है।

लोक कला की दृष्टि से- उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण (अल्पना) बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है। चावल को भिगोकर उसे पीसा जाता है। उसके लेप से आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं। विभिन्न अवसरों पर नामकरण चौकी, सूर्य चौकी, स्नान चौकी, जन्मदिन चौकी, यज्ञोपवीत चौकी, विवाह चौकी, धूमिलअर्ध्य चौकी, वर चौकी, आचार्य चौकी, अष्टदल कमल, स्वास्तिक पीठ, विष्णु पीठ, शिव पीठ, शिव शक्ति पीठ, सरस्वती पीठ आदि परम्परागत गाँव की महिलाएँ स्वयं बनाती है। इनका कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। हरेले आदि पर्वों पर मिट्टी के डिकारे बनाए जाते है। ये डिकारे भगवान के प्रतीक माने जाते है। इनकी पूजा की जाती है। कुछ लोग मिट्टी की अच्छी-अच्छी मूर्तियाँ (डिकारे) बना लेते हैं। यहाँ के घरों को बनाते समय भी लोक कला प्रदर्षित होती है। पुराने समय के घरों के दरवाजों व खिड़कियों को लकड़ी की सजावट के साथ बनाया जाता रहा है। दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्र नक्काशी करके बनाए जाते है। पुराने समय के बने घरों की छत पर चिड़ियों के घोंसलें बनाने के लिए भी स्थान छोड़ा जाता था। नक्काशी व चित्रकारी पारम्परिक रूप से आज भी होती है। इसमें समय काफी लगता है। वैश्वीकरण के दौर में आधुनिकता ने पुरानी कला को अलविदा कहना प्रारम्भ कर दिया। अल्मोड़ा सहित कई स्थानों में आज भी काष्ठ कला देखने को मिलती है। उत्तराखण्ड के प्राचीन मन्दिरों, नौलों में पत्थरों को तराश कर (काटकर) विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र बनाए गए है। प्राचीन गुफाओं तथा उड्यारों में भी शैल चित्र देखने को मिलते हैं।

उपरोक्त बातों से हमें पता चलता है कि हमारे उत्तराखण्ड की पावनता पवित्रता कण -कण मे भगवान की है, यहां के लोग इस प्रकृति की तरह ही पावन पवित्र व देवतुल्य हैं ।
अपणि संस्कृति, अपणि पछयाण के लिए निरन्तर गढ़ भूमि लोक संस्कृति संरक्षण समिति कार्य कर रही है. अतुलनीय प्रयास शिखर पर ले जाएंगे इस पावन धरोहर को यही उम्मीद है समिति से! आइये जुड़े समिति की भावनाओं से बचाएं अपणि संस्कृति अपणि पछयाण को ।
-*जयकुमार तिवारी*,*डॉ. सुनीलदत्त थपलियाल*!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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32 Comments

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