ऋषिकेशधर्म-कर्मशहर में खास

*पितरों की कृपा के बिना कठिन परिश्रम के बाद भी जीवन में अस्थिरता रहती है-स्वामी विजयानंद सरस्वती, अध्यक्ष वेद निकेतन धाम*

*भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर वेद निकेतन धाम ऋषिकेश में विशाल साधु भंडारे का आयोजन किया गया*

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!
आज वेद निकेतन धाम में भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर एक विशाल साधु भंडारे का आयोजन किया गया। कोरोनावायरस के चलते सामाजिक दूरी का पालन करते हुए चेहरे पर मास्क लगाकर इस भंडारे में संतो ने सहभागिता की।
इस अवसर पर संतो को दैनिक जीवन में उपयोग आने वाले सूखा राशन, साबुन, सेनीटाइजर, मास्क, और यूनिटी बढ़ाने वाला आयुर्वेदिक किट का वितरण किया गया।
वेद निकेतन धाम के अध्यक्ष स्वामी विजयानंद सरस्वती ने सभी संतो को जो भंडारे में शामिल हुए थे
दैनिक जीवन में उपयोगी किट देकर उन्हें यह ससम्मान विदा किया।
इस अवसर पर वेद निकेतन धाम के अध्यक्ष स्वामी विजयानंद सरस्वती ने भाद्रपद अमावस्या के विषय में विस्तार से बताते हुए कहा कि हिंदू शास्त्र के अनुसार हर महीने कृष्ण पक्ष के अंत में अमावस्या तिथि आती है. अमावस्या तिथि को रिक्ता तिथि माना जाता है. इस तिथि पर कोई शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं. अमावस्या तिथि पर रात्रि में चांद नहीं दिखाई देता है. अमावस्या तिथि पर सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में गोचर करते हैं, जिसके कारण चंद्रमा कमजोर हो जाता है और मन में कहीं ना कहीं नकारात्मकता का प्रवेश होने लगता है. सूर्य और चंद्रमा के एक राशि में होने पर पितरों को प्रसन्न करने का भी एक अद्भुत दिन होता है, जिससे हमारे कार्यों के अंदर गति आती है और हमें नौकरी व्यापार आदि में सफलता मिलती है. शास्त्रो के अनुसार प्रत्येक अमावस्या को पित्तर अपने घर पर आते है अतः इस दिन हर व्यक्ति को यथाशक्ति उनके नाम से जरूरतमंद लोगों को दवा, वस्त्र, साधुओं को भोजन का दान दिया जाता है और अपने पितरों की प्रसन्नता को प्राप्त किया जाता है. इससे की सूर्य, चंद्र आदि के दोष दूर होते है। भोजन से पूर्व गाय, कुत्ता और पक्षि हेतु भोजन का कुछ अंश निकाल कर इन्हे खिला दें।
चूंकि भाद्रपद माह भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का महीना होता है इसलिए भाद्रपद अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस अमावस्या पर धार्मिक कार्यों के लिये कुशा एकत्रित की जाती है। कहा जाता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाये तो वह पुण्य फलदायी होती है।

भाद्रपद्र अमावस्या व्रत और धार्मिक कर्म –

अमावस्या पर पितरों की तृप्ति के लिए विशेष पूजन करना चाहिए। यदि आपके पितृ देवता प्रसन्न होंगे तभी आपको अन्य देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त हो सकती है। पितरों की कृपा के बिना कठिन परिश्रम के बाद भी जीवन में अस्थिरता रहती है, मेहनत के उचित फल प्राप्त नहीं होती है । स्नान, दान और तर्पण के लिए अमावस्या की तिथि का अधिक महत्व होता है। भाद्रपद अमावस्या के दिन किये जाने वाले धार्मिक कार्य इस प्रकार हैं-
अमावस्या के दिन ब्राह्मण को भोजन अवश्य ही कराएं। इससे आपके पितर सदैव प्रसन्न रहेंगे, आपके कार्यों में अड़चने नहीं आएँगी, घर में धन की कोई भी कमी नहीं रहेंगी और आपका घर – परिवार को टोने-टोटको के अशुभ प्रभाव से भी बचा रहेगा।
शास्त्रो के अनुसार प्रत्येक अमावस्या को पित्तर अपने घर पर आते है अतः इस दिन हर व्यक्ति को यथाशक्ति उनके नाम से दान करना चाहिए।
नदी के तट पर पितरों की आत्म शांति के लिए पिंडदान करें और किसी गरीब व्यक्ति या साधुओं को दान-दक्षिणा दें।

पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि पुण्य की प्राप्ति के लिए जीवन में कम से कम एक बार गो दान करना अत्यधिक आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में गाय को माता का दर्जा दिया जाता है, क्योंकि यह हमारी मॉ की तरह पौष्टिक दूध के माध्यम से हमारा पोषण करती है और बदले में हमसे कुछ नहीं माँगती। गाय को समृद्धि, खुशहाली व उन्नति का प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि गो दान से अनन्त पुण्य का अर्जन होता है और इससे बड़ा दान संसार में कोई भी नहीं है। इसलिए गो दान को महादान की संज्ञा दी जाती है। यह व्यक्ति को पवित्र बनाता है व परम शाश्वत मोक्ष को पाने में सहायक होता है।
इसके पीछे मान्यता यह है कि मृतात्मा जब स्वर्ग या नर्क की यात्रा कर रही होती है तो उसके रास्ते में पड़ने वाली वैतरणी नदी को गाय की पूंछ पकड़कर ही पार करना होता है। जो गौदान करता है उस मृतात्मा को वही गाय वैतरणी पार करवाती है।
इस दिन कालसर्प दोष निवारण के लिए पूजा-अर्चना भी की जा सकती है।अमावस्या के दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसो के तेल का दीपक लगाएं और अपने पितरों को स्मरण करें। पीपल की सात परिक्रमा लगाएं।अमावस्या शनिदेव का दिन भी माना जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करना जरूरी है।

हर माह में आने वाली अमावस्या की तिथि का अपना विशेष महत्व होता है। भाद्रपद अमावस्या के दिन धार्मिक कार्यों के लिये कुशा एकत्रित की जाती है, इसलिए इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। वहीं पौराणिक ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। यदि भाद्रपद अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इस कुशा का उपयोग 12 सालों तक किया जा सकता है।

ऋषिकेश का महत्व –
ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री एवं हिमालय का प्रवेशद्वार माना जाता है। ऋषिकेश में बहुत प्राचीन मंदिर और आश्रम है | इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। ऋषिकेश साधुसंतों की भूमि है यहां पर पवित्र, पतित पावनी मोक्षदायिनी गंगा नदी के तट पर हजारों ऋषि-मुनियों ने तपस्या कर मोक्ष प्राप्त किया है। इस भूमि पर साधुओं को दिया गया दान पुण्य हजारों गुना अधिक फलदायी होता है। साधु संतों के आशीर्वाद से समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और समस्त विघ्न एवं दुःख दूर होते हैं।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से ऋषि विद्याधर जी, हितेश शर्मा, रवि प्रभाकर, अंकित, गोपाल और समस्त भक्त गण उपस्थित थे!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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